महाभारत के युद्ध मे एक बात सोचने वाली है कि अगर दुर्योधन के कहने पर सात महारथियों ने अभिमन्यु को घेर कर मार डाला था, तो वह बड़ा अधर्म था! फिर जब घायल कर्ण, जिसके रथ का पहिया जमीन मे धंस गया था, और वह धनुष उठाने के स्थिति मे नही था, फिर भी अर्जुन ने उसका वध किया.. क्या यह धर्म था?
चोरी का बदला चोरी कभी धर्म हो सकता है?
कपट का बदला कपट कभी धर्म हो सकता है?
अगर कौरव अधर्मी थे, तो पाण्डव कैसे धर्मी हो गये यह बात सोचने वाली है!
हद तो तब है कि ये सारे अधर्म श्रीकृष्ण के ईशारे पर किये गये!
महाभारत के कर्णपर्व मे लिखा है कि कर्ण ने अर्जुन से निवेदन किया था कि ' हे अर्जुन! जो युद्ध से भागा हो, जिसके अस्त्र-शस्त्र गिर गये हो और जो घायल हो क्षत्रिय उस पर बाण नही चलाते, अतः तुम रूको... मै रथ का पहिया निकालकर तुमसे युद्ध करता हूँ '
ऐसी स्थित मे अर्जुन तो मान गया, पर कृष्ण ने उसे उकसाकर कर्ण का वध करवाया!
कोई बतायेगा कि कृष्ण कौन से धर्म का पालन कर रहे थे?
जब स्वयं इतने बड़े महापुरुष अधर्म करने के लिये अर्जुन से कह रहें थे, तो फिर कृष्ण धर्मनिष्ठ कैसे हुये!
कृष्ण तो वेदों, उपनिषदों और शास्त्रों के ज्ञाता थे! मनुस्मृति-7/93 मे मनु ने लिखा है-
"नायुधव्यसनप्राप्तं नार्तं नातिपरिक्षतम् ।
न भीतं न परावृत्तं सतां धर्ममनुस्मरन् ।।"
अर्थात- जिसका आयुध टूट गया हो, शोकाकुल हो, अत्यन्त घायल हो, जो भयभीत हो, युद्ध से भागा हो, ऐसे शत्रु को शिष्ट क्षत्रिय का धर्म स्मरण कर न मारें।
क्या मनु का विधान भी कृष्ण भूल गये थे! मै सदैव कहता हूँ कि महाभारत कृष्ण की स्तुति और पाण्डवों के साथ सहानुभूति रखकर लिखी गयी पुस्तक है, अन्यथा पाण्डव तो कौरवों से भी अधिक अधर्मी थे!
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महाभारत को यदि आप सूक्ष्मतापूर्वक पढ़ो तो उसमे कई जगह औरतों पर या तो सवाल दागे गये हैं, या उन्हे अकारण ही कठघरे मे खड़ा किया गया है।
आमतौर पर लोगों मे एक धारणा है कि महिलाऐं कोई भी बात छुपाकर नही रख पाती। मतलब यदि आप उन्हे कोई गोपनीय बात बता दो तो वे उसका ढ़िंढ़ोरा पीट देती हैं। कई पुरुष तो इसी धारणावश अपनी पत्नि से भी कई बातें नही बताते।
क्या आप सबको पता है कि ऐसी धारणा समाज मे कहाँ से आयी?
जी हाँ.., इसके लिये भी महाभारत ही जिम्मेदार है। यह वही महाभारत है जिसमे औरतों के लिये "त्रिया चरित्र" नामक अपमानजनक श्लोक भी लिखा गया है।
खैर, आज मै बताता हूँ कि महिलाओं को चुगलखोर वाली यह धारणा महाभारत से कैसे आयी।
दरअसल जब अर्जुन ने कर्ण का वध किया तो थोड़े ही दिन बाद पाण्डवों को पता चल गया कि कर्ण उनका ही बड़ा भाई था।
युधिष्ठिर को यह जानकर बहुत दुःख हुआ, और क्रोध मे आकर उन्होने अपनी माता कुन्ती को श्राप दिया कि "तुमने इतनी बड़ी बात हमसे छुपायी, जिसकी वजह से हमारे ही हाथों हमारे अग्रज मारे गये। इसलिये आज मै समस्त स्त्रियों को यह श्राप दे रहा हूँ कि आज के बाद से वे कोई भी बात गोपनीय नही रख पायेंगी"
महाभारत मे यह कथा शान्तिपर्व अध्याय-92 मे लिखी है।
इसके बाद एक धारणा सी बन गयी कि महिलाऐं कोई भी बात अपने पेट मे पचा नही पाती! और इसी धारणा ने महिलाओं को अविश्वसनीय बना दिया।
वैसे यहाँ पर तथाकथित धर्मराज युधिष्ठिर पर एक सवाल और उठता है कि वे किस तरह के धर्मराज थे जो अपनी माँ की गलती के लिये समस्त नारियों को श्राप दे बैठे?
क्या यही धर्म का मानक है कि एक की गलती की वजह से सभी को दण्डित करो। हांलाकि यह काम उनसे पहले परशुराम भी कर चुके थे, जो सहस्त्रार्जुन की गलती की वजह से सारे क्षत्रियों को मार रहे थे।
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