हाल ही मे मैने डा० अम्बेडकर लिखित एक किताब "हिन्दू नारी का उत्थान और पतन" पढ़ा। (चित्र-1)इस किताब के माध्यम से अम्बेडकर ने यह कहा है कि भारत मे हिन्दू-नारियों पर जितने भी अनाचार हुये उस सबके जिम्मेदार मनु और उनकी रचित मनुस्मृति ही थी।
मनु के साथ-साथ अम्बेडकर ने तुलसीदास पर भी नारी विरोधी होने का आरोप लगाया है। वैसे इसमे कोई शक नही है कि तुलसीदास महामूर्ख थे, और उन्होने मानस मे ऐसी बातें लिखी है जो किसी भी समाज को स्वीकार्य नही होगी। पर यह भी सोचना है कि तुलसीदास कोई समाज के विधायक तो थे नही कि उन्होने जो कहा वह विधान हो गया।
अब यदि मनुस्मृति की बात करें तो उसमे दोनो तरह की बातें लिखी है, जैसे कि मनु ने एक जगह स्त्रियों को पूज्यनीय बताया है, (मनु०-3/56) तो एक जगह कहा है कि स्त्रियाँ सन्तान उत्पन्न करने के कारण उपकार करने वाली और पूज्यनीय होती है, स्त्रियों और गृहलक्ष्मी मे कोई अन्तर नही होता (मनु०-9/26, चित्र-2)
इस सबके बावजूद भी यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि मनु ने कई स्त्री-विरोधी बातें लिखी हैं, लेकिन यह भी सत्य है कि मनुस्मृति कोई व्यापक ग्रंथ नही थी! सच कहूँ तो न उसे हिन्दू समाज के 99% लोग जानते थे और न ही मानते थे।
वैसे न जाने क्यों महान जर्मन विचारक नीत्शे मनुस्मृति के बहुत बड़े प्रशंसक थे! नीत्शे का कहना था कि मनुस्मृति और बाइबल की कोई तुलना नही हो सकती। नीत्शे ने मनुस्मृति के बारे मे जो कुछ भी कहा है उसे खुद अम्बेडकर ने अपनी किताब "हिन्दुइज्म का दर्शन" मे लिखा है। (चित्र- 3,4 और 5 पढ़कर नीत्शे के विचार समझ सकते हैं)
खैर, अब हम नारी की दुर्दशा की बात करते हैं, क्योंकि अम्बेडकर के बाद उनके चेले-चपाटे भी मनुस्मृति का ही सदैव जाप करते रहते हैं।
....... सोचना यह है कि भारत मे तो मनुस्मृति की वजह से नारियों की दुर्दशा हुई, पर दुनिया के दूसरे देशों मे नारियों की दुर्दशा का कारण क्या था?
यूरोप से लेकर अरब तक, आखिर किस देश और किस सभ्यता मे नारियाँ बहुत सुरक्षित रही हैं?
दुनिया के किस धर्म मे नारियों का शोषण नही हुआ है? खुद अम्बेडकर जिस बौद्धधर्म के अनुयायी थे, क्या उसमे औरतों का शोषण नही हुआ?
एक बार आनन्द ने गौतम बुद्ध से पूँछा-
आनन्द- भगवन! स्त्रियों से हमे कैसा व्यवहार करना चाहिये?
बुद्ध- उन्हे देखो मत।
आनन्द- यदि मजबूरन उन्हे देखना पड़े तो?
बुद्ध- उनसे बात मत करो।
आनन्द- यदि वे ही हमसे बोलने लगे तो?
बुद्ध- शीलपालन मे सतर्कता से बात करो।
(महापरिनिर्वाण सूक्त, अध्याय-5, चित्र-6)
जरा सोचो, यह महिलाओं के बारे मे बुद्ध के यह विचार थे! वे चाहते थे कि पुरुष महिलाओं से बात ही न करे और भीमवादी बुद्ध को महिलाओं का तारणहार कहते हैं।
इस्लामधर्म मे महिलाओं की क्या हालत है, यह तो किसी से छुपी ही नही है! मै उस पर अधिक न लिखकर बस इतना बता दूँ कि पैगम्बर मोहम्मद ने अपने एक साथी अल हसन अल बसरी से कहा है कि "इस दुनिया की जिंदगी के बारे मे मै केवल दो चीजों से मतलब रखता हूँ और वह है औरत तथा इत्र"
(तबाकत वोल्यूम-1 पेज-380)
मोहम्मद के इन शब्दों से ही औरतों के बारे मे उनकी क्या धारणा थी वह समझ मे आ जाती है।
आज के दौर मे सबसे अधिक प्रगतिशील ईसाइयों की महिलाऐं मानी जाती है, लेकिन यूरोप मे महिलाओं को कम प्रताड़ित नही किया गया है! यूरोप मे "विच हंटिंग" नामक खेल मे न जाने कितनी महिलाओं को मार दिया जाता था।
वैसे भी ईसाई मानते हैं कि महिला पुरुष की पसली से पैदा हुई है, और उसकी बेवकूफी की वजह से परमेश्वर ने नाराज होकर पुरुषों को भी पृथ्वी पर भेज दिया था।
एक फ्रांसीसी ईसाई पादरी से किसी ने "धार्मिक मार्गदर्शिता" मे एक सवाल पूँछा कि "स्त्री क्या हैं?"
पादरी जोरोम ने लिखा-
---- वह शैतान का प्रवेश द्वार हैं!
---- वह पाप की ओर ले जाने वाली सड़क हैं!
---- वह बिच्छू का डंक हैं!
---- स्त्री आग है, पुरुष रस्सी है और शैतान फूंकनी है!
एक दूसरे पादरी मैक्सिमस ने कहा कि-
---- वह आदमियों को उजाड़ देती है!
---- वह एक हत्यारिन है जो आदमियों को गुलाम बना लेती है!
---- वह एक शेरनी है जो मर्दों को सीने से चिपटा लेती है!
---- वह एक दुष्ट विकृत पशु है!
एक अन्य पादरी अनस्तैसियस ने कहा-
---- वह शर्पिनी है जो चमकदार चमड़ी से ढ़की है!
---- वह शैतानों की प्रयोगशाला है!
---- वह जलता हुआ अग्निकुण्ड है!
---- वह एक तूफान है जो घर को उजाड़ देती है!
मै उक्त उदाहरणों से मनु का बचाव नही कर रहा हूँ, बस अम्बेडकर के पूर्वाग्रह पर रोशनी डाल रहा हूँ। वास्तव से महिलाओं को सभी ध्रर्मग्रंथों ने हीन समझा है, पर जिस धर्म के अनुयायी कम रूढ़िवादी हैं, उसमे औरते अधिक सबल हो गयी, जैसे कि ईसाईधर्म, और जिस धर्म मे रूढ़िवादी अधिक है वहाँ औरतें अभी भी दयनीय दशा मे हैं, जैसे कि इस्लामधर्म!
अम्बेडकर और उनकी बनायी गयी फालतू की बकवास थ्योरी का अगर विरोध न किया गया तो जिस तरह ब्लैक होल तमाम ग्रहोँ को निगलने को आतुर है, वैसे ही अम्बेडकरवाद पूरे भारतीय समाज को निगल जायेगा।
ये जो मनुवाद-मनुवाद का रोना रोया जा रहा है, इसका भण्डाफोड़ करना बहुत जरूरी है।
आज के भीमटे खुद को अम्बेडकर से कम बुद्धिमान नही समझते, और उनसे बात करने पर पता चलता है कि अम्बेडकर का पागलपन आज करोड़ो भीमटों का जुनून बन गया है। यदि इसका अभी विरोध न हुआ तो आगे सांप निकल जाये और लकीर पीटने वाली स्थिति हो जायेगी।
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