Saturday, 27 March 2021

कालेखां।

मेरी पिछली पोस्ट पर काफी हो-हल्ला मचा, क्योंकि लोगो को लगता था कि मै जातीय विद्वेष फैला रहा हूँ, और ब्राह्मणों को बदनाम कर रहा हूँ!
हाँलाकि मेरा ऐसा कोई इरादा नही था, पर अब मै एक ऐसी कहानी बताने जा रहा हूँ, जिसके पूरे प्रमाण भी है...

संतराम बी.ए. एक आर्यसमाजी विद्वान थे, उन्होने एक पुस्तक लिखी है- "हिन्दुत्व जो हिन्दुओं को ही ले डूबा"
यह पुस्तक 'सम्यक प्रकाशन' मे छपी है और इसी मे ढ़ाका (वर्तमान बांग्लादेश) की एक सच्ची घटना लिखी गयी है!

            बंगाल (ढ़ाका) मे एक नवाब की कोठी थी, और उस कोठी के बगल से सकरा सा रास्ता ब्रह्मपुत्र नदी की तरफ जाता था!
उसी रास्ते से एक ब्राह्मण का किशोर पुत्र (कालचन्द्र राय) जो गोरा और लम्बा था, तथा देखने मे अत्यन्त सुन्दर लगता था, वह रोज सुबह नहाने जाता था, तथा पुनः उसी रास्ते से नहाकर वापस लौटता था!
उस नवाब की एक नवयुवती बेटी थी, जो उस ब्राह्मणपुत्र को प्रतिदिन अपनी खिड़की मे खड़ी होकर आते-जाते देखती थी, उस लड़की को ब्राह्मणपुत्र से प्रेम हो गया!
लड़की ने यह बात अपनी माँ को बतायी, और उसकी माँ ने नवाब को बताया! नवाब अपनी पुत्री को बहुत प्रेम करता था, अतः उसकी खुशी के लिये वह ब्राह्मणपुत्र से अपनी बेटी की शादी के लिये मान गया!

अगले दिन नवाब ने ब्राह्मणपुत्र को बुलाकर कहा कि तुम मेरी पुत्री से विवाह कर लो!
ब्राह्मणपुत्र ने कहा कि मै ऐसा नही कर सकता, क्योंकि आपकी पुत्री ब्राह्मण नही है!
नवाब ने कहा कोई बात नही, तुम इसका धर्म-परिवर्तन करवा देना!
लेकिन ब्राह्मणपुत्र ने कहा कि यह भी सम्भव नही है, हमारा समाज नही मानेगा! दूसरी बात उस समय के पुरोहितों ने भी किसी मुसलमान का सनातनधर्म मे प्रवेश शास्त्र-विरुद्ध बताकर मना कर दिया।
फिर नवाब ने कहा कि दूसरा रास्ता यही है कि तुम इस्लाम अपना लो!
इस बार भी ब्राह्मणपुत्र ने झट से इनकार कर दिया!

नवाब कई दिन तक ब्राह्मणपुत्र और उसके परिवार वालों को समझाता रहा, पर बात बनी नही!
इधर नवाब की बेटी पूरा दिन रोती रहती, और खाना भी खाने से मना करती थी!
अन्त मे नवाब के कुछ मंत्रियों ने उसे सलाह दिया कि उस लड़के को मरवा दो, क्योंकि जब तक वह जीवित रहेगा, शहजादी उसे देखकर रोती ही रहेंगी!

नवाब मान गया, और सैनिकों को भेजकर उस लड़के को पकड़वाकर लाया, तथा उसका गला काट देने का आदेश दिया! 
ब्राह्मणपुत्र वध-स्थल पर सिर झुकाये खड़ा था और जल्लाद उसका गला काटने की तैयारी कर रहा था! पर किसी तरह यह खबर नवाब की पुत्री को पता चल गयी थी, और वह भागी-भागी उस जगह आ पहुँची जहाँ ब्राह्मणपुत्र का गला काटने की तैयारी हो रही थी!
लड़की रोती-बिलखती जल्लाद के कदमों मे गिर गयी और बोली कि मेरे महबूब को छोड़ दो, इनसे मोहब्बत करने का गुनाह मैने किया है, ये तो बेगुनाह है... आप मेरा ही गला काट दो, मै इनके कदमों मे अपने प्राणों की बलि दूँगी। अगर इन्हे कुछ हो गया तो मै वैसे भी मर जाऊँगी, अतः मेरे लिये यही अच्छा होगा कि मै अपने महबूब के सामने ही मर जाऊँ।

जल्लाद हक्का-बक्का खड़ा था, पर ब्राह्मणपुत्र का दिल पिघल गया!
उसने देखा कि इस लड़की और एक सनातनी लड़की के संस्कारों मे कोई अन्तर नही है!
ब्राह्मणपुत्र ने उठकर नवाब की बेटी को गले से लगा लिया, और कहा कि मै तुमसे ही शादी करूँगा!

ब्राह्मणपुत्र नवाब की बेटी को लेकर अपने घर आया, और सारी बात बताकर अपने पिता से बोला कि हे पिताजी! आप हमारा विवाह करवा दो।
लेकिन उसके घरवालों ने उसकी एक न सुनी और उसे धक्के मारकर घर से बाहर निकाल दिया!

इसके बाद वह नवाबपुत्री से शादी करने के लिये उसे लेकर पुरी गया!
वहाँ के पुजारी ने ब्राह्मणपुत्र और उस लड़की का गोत्र पूँछा!
ब्राह्मणपुत्र ने अपना गोत्र तो बता दिया, पर जैसे ही पुजारी को बताया कि यह लड़की मुसलमान है, पुजारी भड़क गया और बोला कि तू एक म्लेच्छ-कन्या को मन्दिर तक कैसे ले आया?
पुरी के पुजारियों ने भी उसे धक्के मारकर भगा दिया! अब ब्राह्मणपुत्र के भीतर प्रतिशोध की आग भड़क गयी और अन्ततः उस ब्राह्मणपुत्र ने इस्लाम कबूल करके उस लड़की से ब्याह किया और कालेखाँ के नाम से प्रसिद्ध हुआ!

ब्राह्मणपुत्र के अन्दर हिन्दुत्व के लिये घोर घृणा थी, और कुछ वर्षों बाद जब वह बंगाल का नवाब बना तो उसने पूरे बंगाल के इस्लामीकरण का बीड़ा उठा लिया! और जिसके परिणाम-स्वरूप उसने बंगाल मे हिन्दुओं का धर्मपरिवर्तन करवाना शुरू कर दिया! 
कालेखाँ की निशानियाँ आज भी बांग्लादेश मे है!

यह कोई काल्पनिक कहानी नही बल्कि सत्य घटना है, जिसे यकीन न हो पुस्तक मंगवाकर पढ़ सकता है, अन्यथा गूगल पर भी सर्च करके पता कर सकता है।

दूसरी बात जरा मुझे कोई बताये कि दयानन्द सरस्वती से पहले क्या यह सुविधा थी कि कोई दूसरे धर्म का व्यक्ति हिन्दूधर्म अपना सके?
बिल्कुल नही! पौराणिक पंडों ने न तो किसी अन्य धर्मवालों के लिये दरवाजे खोले थे, और न ही अपने धर्म के अछूतों से मानवीय व्यवहार किया!
अगर किसी अछूत की परछाई भी पंडों को छू जाती थी, तो वह जाकर स्नान करते थे, और उस अछूत का जीना दूभर कर देते थे!
अरे साधारण मानव तो दूर, इनके ताण्डव से छत्रपति शिवाजी के वंशज छत्रपति शाहूजी महाराज भी नही बचे!

पेशवा बाजीराव की दूसरी पत्नि मस्तानी मुसलमान थी, पर मस्तानी ने अपने बेटे का नाम कृष्णा रखा था, और वह हिन्दू बनना चाहता था! लेकिन पंडों ने उसे हिन्दू नही बनने दिया, और उसे विवश किया गया कि वह मुसलमान बन जाये।
आज ब्राह्मण चाहे जितना छाती पीटें कि मुसलमानों की जनसंख्या बढ़ रही है, पर भारत मे अधिकांश दलित-अछूतों ने इनके शोषण की वजह से ही इस्लाम कबूला था!

स्वामी दयानन्द सरस्वती एक मात्र ऐसे महापुरुष थे जिन्होने इस्लाम कबूल लिये लोगों का भी शुद्धिकरण करके उन्हे पुनः सनातन धर्म मे वापसी करायी, अन्यथा उनसे पहले यह सुविधा भी नही थी!
सच तो यह है कि जब दयानन्द सरस्वती मुसलमानों को हिन्दूधर्म मे वापसी करवा रहे थे तब भी ये पौराणिक ब्राह्मण उनका विरोध करते थे!

हाँ मै इन कुकृत्यों को करने वाले लोगों को ब्राह्मण नही कहूँगा! वो ब्राह्मण नही, पंडे-पुरोहित थे!
अगर वो ब्राह्मण होते और उनके अन्दर ब्राह्मणत्व होता, तो वो ऐसा कभी न करते!
ब्राह्मण एक योग्यता का शब्द है, जिसे प्राप्त करने के लिये कठिन परिश्रम करना पड़ता है, पर जो लोग ब्राह्मण के घर मे पैदा होकर उस समय ये घिनौने कृत्य कर रहे थे वो पंडे-पुरोहित ही थे, ब्राह्मण तो बिल्कुल नही!

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