श्रवणकुमार एक अंधे ऋषि के पुत्र थे! उनके माता-पिता वन मे कुटिया बनकर तप करते थे और श्रवणकुमार उनकी सेवा।
अब एक सवाल उठता है कि यदि श्रवणकुमार के माँ-बाप ऋषि थे तो श्रवणकुमार को मारने के लिये दशरथ को "ब्रह्महत्या" का पाप क्यों नही लगा?
मेरे कई सनातनी मित्र (खासकर आर्यसमाजी) कहतें हैं कि वैदिककाल मे ब्राह्मण कोई जन्म से नही, बल्कि कर्म से होता था, तो भइया... श्रवणकुमार और उनके माँ-बाप के सारे कर्म तो ब्राह्मणों वाले ही थे, फिर आखिर उन्हे उस दौर मे ब्राह्मण क्यों नही माना गया?
आज मै आप मित्रों को श्रवणकुमार के जीवन से जुड़ी कुछ वह बातें बताऊँगा जिसे शायद आप नही जानते होंगे।
मैने भीमवादियों को कई बार यह सवाल करते देखा हैं कि जब चारों धाम शंकराचार्य ने आठवीं सदी मे बनवाये तो श्रवणकुमार किन चारों धामों की यात्रा करने द्वापरयुग मे निकले थे?
असल मे यह सब झूठ है, वाल्मीकि रामायण अयोध्याकाण्ड सर्ग-63,64 (चित्र-1) मे श्रवणकुमार की कथा लिखी है। रामायण मे साफ लिखा है कि श्रवणकुमार के माता-पिता अंधे थे और जंगल मे कुटी बनाकर तप करते थे! मतलब श्रवणकुमार से जुड़ी वह सारी कथा गप्प है जिसमे कहा जाता है कि श्रवणकुमार एक कांवड़ बनाकर अपने माता-पिता को चारधाम की यात्रा कराने जा रहे थे!
अब दूसरा सवाल यह है कि एक ऋषि के पुत्र को मारने पर भी राजा दशरथ ब्रह्महत्या के दोषी क्यों नही हुये?
इसका जवाब भी रामायण मे ही है! अयोध्याकाण्ड सर्ग-63 श्लोक-51 (चित्र-2) मे लिखा है कि श्रवणकुमार खुद दशरथ से कहते हैं कि "हे राजन! मै वैश्यपिता और शूद्रमाता के गर्भ से पैदा हुआ हूँ, अतः आपको ब्रह्महत्या का पाप नही लगेगा"
अगले सर्ग (64) के श्लोक-55-56 (चित्र-3) मे श्रवणकुमार के पिता ने दशरथ से कहा है- "क्षत्रिय होकर तुमने एक वैश्यजातीय मुनि की हत्या की है, अतः तुम ब्रह्महत्या के पाप से तो बच जाओगे पर मै तुम्हे कठोर श्राप दूँगा"
उक्त श्लोकों से यह स्पष्ट है कि इतने तपी और माता-पिता की इतनी सेवा करने बाद भी न तो श्रवणकुमार ब्राह्मण बन पाये और न ही उनके माता-पिता।
अब सवाल यह है कि आखिर कैसे मान लिया जाये कि किसी युग मे लोग अपने अच्छे कर्मों से ब्राह्मण बन जाते थे?
वास्तव मे अच्छे-बुरे कर्मों से कोई ब्राह्मण या शूद्र नही होता था! यदि ऐसा होता तो परशुराम कभी ब्राह्मण न होते और राजा सुदास कभी शूद्र न होते।
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पुराणों मे एक बड़े प्रतापी राजा हुये थे, जिन्हे राजा सुदास कहा जाता है। राजा सुदास का वर्णन ऋग्वेद मे भी आया है, और अम्बेडकर ने भी अपनी किताब "शूद्र कौन थे" मे इनका जिक्र किया है। अम्बेडकर ने यहाँ तक लिखा है कि सुदास और पैजवन शूद्र राजा थे और सुदास ने तो ऋग्वेद के कुछ मंत्रों की रचना भी की थी।
सुदास राजा के पुत्र का नाम था सौदास! राजा सौदास की कथा विष्णुपुराण के खण्ड-4, अध्याय-4 मे लिखी है।
एक बार वशिष्ठ जी ने किसी कारण से राजा सौदास को बारह वर्ष के लिये नरभक्षी राक्षस हो जाने का श्राप दे दिया। उनका श्राप तीन दिन मे फलीभूत हुआ और राजा सौदास तीसरे दिन राक्षस हो गये।
राक्षस होने के बाद वे वन मे चले गये और वहाँ विचरण करने वाले मानवों को मारकर खाने लगे। एक दिन उसी वन मे एक ऋषि अपनी पत्नि के साथ सम्भोग कर रहे थे, तभी राक्षसरूपी राजा वही आ धमके। राजा को देखते ही ऋषि और ऋषि-पत्नि अपना कार्यक्रम आधे-अधूरे मे ही छोड़कर जान बचाने के लिये भागे। राजा ने भी उनका पीछा किया और तेजी से झपटकर ऋषि को पकड़ लिया।
अपने पति को राक्षस के हाथों पकड़े जाने पर ऋषि-पत्नि बहुत दुःखी हुई और वह राक्षस बने राजा के पास आकर उनसे अपने पति के छोड़ देने की प्रार्थना करने लगी।
ऋषि पत्नि ने राजा सौदास से कहा कि- हे राजन! आप मूलतः राक्षस नही है, बल्कि आप तो इक्ष्वाकु-वंशी धर्म-धुरंधर राजा हैं। हे महाराज... आप तो स्त्री-संयोग के सुख से भलीभाँति परिचित ही है! राजन मै अभी तक अतृप्त हूँ, अतः मेरे पति को छोड़ दो।
ऋषि-पत्नि ने राक्षसरूपी राजा सौदास से बहुत विनय किया... लेकिन राजा ने एक न मानी और ऋषि को मारकर खा लिया। फिर क्रोध मे आकर ऋषि-पत्नि ने राजा को श्राप दिया कि जिस प्रकार मै अतृप्त थी और तुमने मेरे पति को मार दिया, उसी प्रकार जब तुम भी कामवासना मे लिप्त होगे, तभी तुम्हारी भी मृत्यु हो जायेगी।
बारह वर्ष बाद जब राजा पुनः मनुष्य बनकर अपने महल वापस आये तो उन्होने अपनी पत्नि से सारी बात बतायी। उनकी पत्नि मदयंती बहुत कामाशक्त थी, पर राजा ने उसे अपनी विवशता बतायी कि मै सम्भोग नही कर सकता! राजा की दूसरी समस्या यह थी कि वे उस समय निःसन्तान थे, और उनके बाद उनके राज्य का उत्तराधिकारी नही था।
अन्त मे राजा ने विवश होकर अपनी पत्नि मदयंती को वशिष्ठ से गर्भाधान करने की अनुमति दी। विष्णुपुराण मे यह बहुत स्पष्ट लिखा है कि वशिष्ठ ने मदयंती से गर्भाधान किया, जिससे राजा का वंश आगे बढ़ा।
विष्णुपुराण के अनुसार इसी कुल मे आगे चलकर रघु, अज, दशरथ और स्वयं श्रीराम भी पैदा हुये।
इस पोस्ट को लिखने का मेरा केवल इतना ही आशय था कि जो लोग गला फाड़कर चिल्लाते हैं कि ऋषि-मुनि चमत्कारों से बच्चे पैदा कर देते थे, वे बता सकतें हैं कि वशिष्ठ जैसे दिव्यऋषि ने गर्भाधान (ऋतुकाल मे सम्भोग) क्यों किया?
अच्छा है कि इस पुराण ने "गर्भाधान" शब्द लिख दिया! यदि इसने भी जरा छुपाकर यह लिखा होता कि ऋषि की कृपा से मदयंती गर्भवती हुई तो ये यहाँ भी कहते कि कोई चमत्कार किया होगा।
तो मेरे भइया लोग! यह बात जान लो कि सेक्स के बिना संतान नही पैदा होती थी, चाहे पाण्डव हो या जीसस, सब सेक्स से ही पैदा हुये हैं। आगे शायद विज्ञान बिना सम्भोग के संतान पैदा करना सम्भव कर दे, पर हजारों साल पहले ऐसी कोई विधि नही थी।
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