अब्राहम लिंकन ने कहा था "You can fool all the people some of the time, and some of the people all the time, but you can not fool all the people all the time"
अर्थात- आप सारे लोगों को कुछ देर के लिये बेवकूफ बना सकते हो, और कुछ लोगों को हमेशा के लिये बेवकूफ बना सकते हो, पर आप सारे लोगों को हमेशा के लिये बेवकूफ नही बना सकते।
लिंकन जी की कही यह बात मेरे मन मे आज इसलिये आयी क्योंकि मै तुलसीबाबा कृत रामचरित मानस पढ़ रहा था। मेरा अपना मानना है कि हिन्दुओं के तमाम धर्मग्रंथों मे यह किताब सबसे अधिक जातीय-विद्वेष और घृणा फैलाने वाली है। हिन्दूसमाज मे सर्वाधिक पाखण्ड भी इसी किताब ने परोसा है, और इसी किताब ने कामगार हिन्दू जातियों के मन मे ब्राह्मणी-वर्चस्व की भावना भी पैदा की है।
अब चूःकि यह किताब पड़े-पुरोहितों अपनी श्रेष्ठता बनाने और अपना धंधा चलाने के लिये बड़ी कारगार थी, अतः धूर्त पड़ों ने इसका प्रचार-प्रसार करने के लिये भी तरह-तरह के हथकंडे अपनाये।
इसी कड़ी मे गीताप्रेस ने रामचरित मानस के अन्त मे तुलसीदास की जीवनी लिखी है! गीताप्रेस ने जहाँ तुलसीदास का महत्व बढ़ाने के लिये यह लिखा है कि राम, लक्ष्मण और हनुमान तुलसीदास से मिलने आते थे, वही रामचरित मानस की वरीयता कायम करने के लिये यहाँ तक लिख दिया है कि स्वयं शिवजी ने रामचरित मानस को सत्यापित किया है कि यह किताब समस्त सनातनी धर्मग्रंथों मे सबसे उच्च है।
अच्छा एक और बात यहाँ पर विचार करने वाली यह है कि यदि तुलसीदास से राम, लक्ष्मण और हनुमान रूबरू मिलते थे तो उन्होने रामचरित मानस को बचाने के लिये उन्ही से आग्रह क्यों नही किया? क्यों इसे ले जाकर टोडरमल के घर छुपाकर रख दिया था?
अब इससे पहले कि मै तुलसीदास समर्थक गीताप्रेस की होशियारी का बयान करूँ, उससे पहले यह जान लेना जरूरी है कि तुलसीदास और काशी के पंडों के बीच विवाद क्या था?
दरअसल तुलसीदास एक वैष्णव ब्राह्मण थे, और जब उन्होने रामचरित मानस लिखा तो वे उसका प्रचार-प्रसार काशी मे भी करना चाहते थे। उन दिनों काशी शैव-ब्राह्मणों का गढ़ था, और शैवों को यह स्वीकार नही था कि कोई वैष्णव आकर यहाँ किसी भी उपास्य को शिव के बराबर या उनसे श्रेष्ठ बताये। जबकि तुलसीदास ने तो मानस मे बड़ी चालाकी से शिव को राम भक्त तक लिख दिया था।
एक जगह तुलसीदास लिखते है-
"राम नाम सिव सुमिरन लागे।
जानेहु सती जगतपति जागे।।"
अर्थात- जब शिवजी ने राम-राम कहना शुरू कर दिया, तब सती ने जान लिया कि अब भगवान जाग गये हैं।
यहाँ तुलसीदास बताना चाहते थे कि शिव भी राम नाम का जाप करते थे! तुलसीदास यहीं नही रुके, वे तो कहते थे कि-
"चतुराई चूल्हे गयी, घूरे पड्यो आचार।
तुलसी बिन राम भजन के चारो वरण चमार।।"
अर्थात- जो मानव राम का भजन नही करता, वह चमार के जैसा है, चाहे वह चारों वर्णों मे से जिस भी वर्ण का हो।
बस, तुलसीदास की इन्ही हरकतों से काशी के पंडे नाराज थे, और वे रामचरित मानस को जला देना चाहते थे, तथा तुलसीदास की पिटाई भी करना चाहते थे।
तुलसीदास भी इस बात को अच्छी तरह समझ गये थे... अतः उन्होने पहले मानस को टोडरमल के पास छुपाकर रख दिया, और फिर काशी से अपनी जान बचाकर भाग लिये।
तुलसीदास ने जो मानस पहले लिखी थी, वह टोडरमल के पास ही थी, बाद मे उसी आधार पर दूसरी प्रतिलिपियाँ तैयार की गयी! सम्भवतः बाद मे उसमे मिलावट भी हुई होगी और शिव से सम्बन्धित कुछ अच्छी चौपाइयाँ भी लिखी गयी होंगी, ताकि नाराज शैवों को मनाया जा सके।
जब इससे भी काम न बना तो तुलसीदासियों ने एक और दांव चला, उन्होने शिव के माध्यम से ही मानस को चमत्कारिक ग्रंथ साबित करने की चेष्टा की।
उन्होने इसके लिये एक कहानी बनायी कि एक बार तुलसीदास ने रामचरित मानस को विश्वनाथ मन्दिर मे रख दिया था, और सुबह जब मन्दिर के पट खोलकर देखा गया तो किताब के ऊपर स्वयं शिवजी ने "सत्यम् शिवम् सुन्दरम्" लिखकर नीचे अपने हस्ताक्षर कर दिये थे।
अब मुझे तो यह पढ़कर बड़ी जिज्ञासा हो रही है कि पंडों को शिव के लिखे गये उस वाक्य को और उनके हस्ताक्षर को दुनिया को दिखाना चाहिये।
आखिर हम भी तो देखें कि भगवान शिव की हैंड-राइटिंग कैसी थी?
तुलसीदासिया पंडे केवल इस एक कथा से ही संतुष्ट नही हुये, उन्होने एक दूसरी कथा भी रच डाली।
अबकी बार उन्होने लिखा कि एक बार सब ब्राह्मणों ने रामचरित मानस को अजमाने के लिये विश्वनाथ मन्दिर मे सबसे ऊपर वेद, उसके नीचे शास्त्र, उसके नीचे तमाम पुराण और सबसे नीचे रामचरित मानस को रखकर मन्दिर बन्द कर दिया! जब सुबह मन्दिर खोलकर देखा तो रामचरित मानस सबसे ऊपर था।
पंडों के कहने का मतलब था कि शिवजी ने स्वयं मानस को सबसे ऊपर रख दिया, और उसे सबसे उच्च सनातनी ग्रंथ का सर्टिफिकेट दे दिया।
इस कहानी से पड़ों ने यह भी साबित किया कि मानस वेदों से भी महान है! शायद यही वजह थी कि वेदों के सबसे बड़े प्रचारक स्वामी दयानन्द ने रामचरित मानस की प्रतियाँ जलायी थी और तुलसीदास को सबसे बड़ा मूर्ख भी बताया था।
खैर.. जो भी हो, पर तुलसीदासिया पंडों ने इस तरह झूठी कहांनियाँ गढ़कर न केवल भोलेभाले हिन्दुओं को बेवकूफ बनाया, अपितु शैव-ब्राह्मणों को भी साध लिया।
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#पहले_राम_आये_या_बुद्ध......
अगर आप किसी भी सनातनी से पूँछो कि धरती पर पहले राम का युग था या बुद्ध का? तो वह झट से जवाब देगा कि राम का.....
यूँ तो हिन्दू राम और बुद्ध दोनो को विष्णु का अवतार मानते है, पर उनका कहना है कि पहले रामावतार हुआ, फिर कृष्णावतार और तत्पश्चात बुद्ध का आगमन हुआ! लेकिन आप कुछ श्रोतो और पौराणिक ग्रंथो का अध्ययन करे तो मामला जरा पेचीदा लगता है!
गौतम बुद्ध ने अपने जीवनकाल मे कभी भी शायद राम का उल्लेख नही किया, या उनके दौर मे राम का अस्तित्व ही नही रहा होगा! पर राम ने अपने मुँह से बुद्ध का नाम लिया है, मतलब राम के समय मे बुद्ध का अस्तित्व था!
हिन्दू बड़ी चालाकी से हमेशा एक साजिश करते हैं, हिन्दुओं को यह पता है कि भारत मे नई चीजों की अपेक्षा प्राचीन चीजों का अधिक महत्व है, इसीलिये जब कभी भी कोई बड़ा मन्दिर बनता है तो पंडे-पुरोहित यह कहकर प्रचारित करते हैं कि यह मन्दिर बहुत पुराना है..द्वापरयुग मे यहाँ पाण्डवों ने पूजा की थी!
हर मन्दिर से इसी तरह की झूठी कहानियाँ जोड़ दी जाती है, ताकि उस मन्दिर का महत्व बढ़ जाये और वहाँ चढ़ावे मे कमी ना आये!
बस ऐसे ही हिन्दूधर्म भी है, पंडे-पुरोहित हिन्दूधर्म को अतिप्राचीन बताते हैं, पर कई बार ऐसा लगता है कि हिन्दूधर्म बौद्धधर्म के बाद खड़ा किया गया! ऐसे ही यह भी प्रतीत होता है कि राम भी बुद्ध के बाद के हैं!
इसका एक उदाहरण बाल्मीकि रामायण मे भी मिलता है।
बाल्मीकि रामायण (गीताप्रेस) अयोध्याकाण्ड सर्ग-109 पृष्ठ-359 पर श्रीराम अपने ही एक हितैषी 'जाबालि' से कहते है कि -"जैसे चोर दण्डनीय होता है, उसी प्रकार वेदविरोधी बुद्ध (बौद्धधर्म को मानने वाला) भी दण्डनीय है!"
यहाँ रामजी ने बौद्धो को दण्ड देने की बात की है! अर्थात राम के समय मे बौद्ध थे, तो यह स्पष्ट है कि राम का अस्तित्व बुद्ध के बाद खड़ा किया गया!
इसी श्लोक मे राम नास्तिकों को भी दण्ड देने की बात करते है और कहते है -"नास्तिकों (चार्वाकी) को भी इसी प्रकार दण्ड देना चाहिये, इसलिये राजा को चाहिये कि नास्तिक को भी चोर की भाति दण्ड दें"
रामायण का यह प्रसंग एक और सवाल खड़ा करता है कि राम क्या वाकई अयोध्या मे ही पैदा हुये, या राम का चरित्र कहीं बाहर (विदेश) से आयात किया गया!
क्योकि बुद्ध के बाद कोई भी इतिहासकार अयोध्या मे राम के जन्म की बात स्वीकार नही करेगा!
दूसरी बात राम को नास्तिकों से भी घृणा थी, अर्थात राम के समय मे नास्तिक थे!
इसमे जरा भी संदेह नही है कि तथागत बुद्ध एक आध्यात्मिक गुरू थे, और भारतीयों पर उनका गहरा प्रभाव था! कहीं ऐसा तो नही कि उनके प्रभाव को कम करने के लिये राम नाम का एक फर्जी पात्र पंडो द्वारा खड़ा किया गया।
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