समुद्र पी जाने वाले ऋषि अगस्त्य का नाम तो लगभग सभी ने सुना है, पर शायद कम ही लोग जानते हैं कि ऋषि अगस्त्य पैदा कैसे हुये?
चलिये हम बता रहे हैं-
एक बार राजा निमि और ऋषि वशिष्ठ मे किसी बात को लेकर विवाद हो गया, फिर दोनो ने एक-दूसरे को शरीर-हीन होने का श्राप दे दिया और श्रापवश दोनो ही शरीर-विहीन हो गये....
तत्पश्चात वशिष्ठ अपने पिता ब्रह्माजी के पास गये और उनसे पुनः शरीर प्राप्ति का उपाय पूँछने लगे! ब्रह्मा ने कहा कि आप वरूणदेव के वीर्य मे प्रवेश कर जाओ, फिर तुम अयोनिज रूप से पुनः शरीर पा जाओगे और जो वायुरूप मे विचरण कर रहे हो उससे मुक्ति मिल जायेगी!
ब्रह्मा की आज्ञा से वशिष्ठ वरुण के वीर्य मे प्रविष्ठ कर गये!
एक दिन की बात है, उर्वशी बड़े सुन्दर वस्त्र पहनकर वरुण के निकट से गुजर रही थी! उर्वशी के रूप-रंग को देखकर वरुण काम पीड़ित हो गये और उसके पास जाकर समागम करने की विनती करने लगे!
उर्वशी ने कहा कि हें वरुणदेव! आज तो यह सम्भव नही हैं... आज मैने आपसे पहले मित्रदेव को समागम करने के लिये हाँ कर दिया है! अभी मै उन्ही के पास जा रही हूँ, आज मेरा शरीर उनके लिये है, आप किसी और दिन अपनी इच्छापूर्ति कर लेना!
वरुण ने कहा कि मै आज तड़प रहा हूँ, और तुम किसी और दिन की बात कर रही हो! मुझसे कामाग्नि सही नही जा रही है.....हे उर्वशी! मेरी विनती स्वीकार कर लो।
पर उर्वशी न मानी और बोली कि मैने आज मित्रदेव को वचन दे दिया है, वो आपसे पहले ही मेरे पास आये थे!
तब वरुण देव ने कहा कि उर्वशी तुम मेरी मदद करो, मै किसी घड़े मे अपना वीर्य-त्याग करना चाहता हूँ!
उर्वशी ने कहा कि हाँ, आज यही ठीक रहेगा!
फिर उर्वशी एक घड़ा लायी, और वरुण देव ने उसी घड़े मे अपना वीर्यपात करके अपनी हवस शान्त की!
इसके बाद जब उर्वशी मित्रदेव के पास पहुँची तो मित्रदेव क्रोध से लाल हो गये, और बोले, रे दुराचारिणी! तू अभी तक किससे नैना-चार कर रही थी?
मै कब से तेरी प्रतिक्षा कर रहा हूँ, और तू किसी और से व्यभिचार कर रही थी, जबकि तूने मुझे आज अपने आप को समर्पित करने का वचन दिया था!
उर्वशी ने मित्रदेव को बहुत समझाया, पर मित्रदेव न माने, और वो भी उसी मटके मे वीर्यपात करके चले गये!
थोड़े दिन बाद वरुण के वीर्य से वशिष्ठ और मित्रदेव के वीर्य से अगस्त्य ऋषि का जन्म हुआ!
अगस्त्य ऋषि कुम्भ (मटके) से पैदा हुये थे इसलिये इनका एक नाम 'कुम्भज' भी है!
अब जरा सोचो कि मटके मे ऐसा कौन सा पदार्थ होता था कि जिसमे वीर्य गिराने से बच्चे का जन्म हो जाता था!
महाभारत के अनुसार गांधारी के सौ पुत्र भी मटके से ही पैदा हुये थे!
आखिर कुम्हार मटका पानी रखने के लिये बनाते थे, या उसमे वीर्यपात करके अयोनिज संतान पैदा करने के लिये।
प्रमाण मांगने वालों के लिये मै बता दूँ कि यह पूरी कथा वाल्मीकि रामायण उत्तरकाण्ड सर्ग-56-57 से ली गयी है।
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वैदिककाल मे ऋषि-मुनि चाहे जितना ही तपस्वी क्यों न थे, पर वे महिलाओं के जाल मे जरूर फंस जाते थे। यानि भले ही वे दावा करते थे कि हमने काम, क्रोध, मोह और लोभ, सब पर विजय पा ली है, पर सुन्दर महिला देखते ही उनका भी लंगोट गीला होने लगता था।
एक ऐसी ही कथा रामायण-काल मे घटित हुई है। त्रेतायुग मे एक महाऋषि थे जिनका नाम ऋंग था। ये ऋंग रामजी के बहनोई और दशरथ के जमाता थे। (वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड, सर्ग-9, श्लोक-11, चित्र-1)
जैसा कि सबको पता ही है कि राजा दशरथ के चार पुत्रों के अलावा एक पुत्री शांता भी थी। (वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड, सर्ग-11/3-5, चित्र-2)
दशरथ ने अपनी पुत्री शांता को अपने निःसंतान मित्र रोमपाद को दे दिया था! एक बार रोमपाद से कोई पापकर्म हो गया और उनके राज्य मे अकाल पड़ गया।
राजा रोमपाद ने अपने तमाम ऋषियों और पुरोहितों को बुलाकर अकाल से निवारण का उपाय पूँछा! तब पुरोहितों ने बताया कि यदि ऋषि ऋंग को आप अपने महल मे बुलाकर उनका सत्कार करें और अपनी पुत्री शांता का वैदिकरीति से उनसे विवाह कर दें, तो आपके राज्य मे वर्षा जरूर होगी।
राजा पुरोहितों की बात मानकर तैयार हो गये, पर अब समस्या यह थी कि ऋंगऋषि सदैव वन मे ही रहते थे, और कभी नगर मे आते ही नही थे। फिर भला राजा उन्हे नगर मे कैसे लेकर आते?
तब पुरोहितों ने कहा कि यदि राज्य की सुन्दर वैश्याओं को ऋंगऋषि के आश्रम के आसपास भेजा जाये तो उनके सम्मोहन से ऋषि ऋंग जरूर पीछे-पीछे नगर तक आ जायेगें।
राजा रोमपाद को यह योजना उचित लगी, और उन्होने इसी योजना पर वैश्याओं को अमल करने का निर्देश दे दिया।
अब मै यहाँ जरा आपको बता दूँ कि ऋंग इतने तपस्वी और प्रतापी ऋषि थे कि उनके कहीं आगमन मात्र से वर्षा हो सकती थी।
राजा दशरथ के राज्य मे वशिष्ठ, वामदेव और जाबाल जैसे विद्वान के होते हुये भी यही ऋंग ऋषि ने दशरथ का पुत्र-कामेष्टि यज्ञ करवाया था! मतलब ऋंग वामदेव, जाबाल और वशिष्ठ से भी अधिक विद्वान और तपस्वी थे।
अब इतने विद्वान और तपस्वी ऋषि को फांसने के लिये राजा रोमपाद ने वैश्याओं का सहारा लिया, और आश्चर्य की बात है कि अपनी समस्त इन्द्रियों पर अंकुश रखने का दम्भ भरने वाले ये ऋषि भी वैश्याओं के लटके-झटके मे फंस गये!
रोमपाद की योजनानुसार जब वैश्याऐं ऋंग के आश्रम के पास गयी तो उन्हे देखते ही ऋंग के मुँह मे पानी आ गया। और जब वैश्याऐं आश्रम से वापस नगर लौटने लगी तो ऋषिऋंग भी उनके पीछे-पीछे नगर तक चले आये। (चित्र-3,4 पढ़े)
इसके बाद की कथानुसार फिर रोमपाद के राज्य मे बारिश हुई और ऋंग का विवाह शांता से हो गया। बाद मे इन्ही ऋंग के सामर्थ्य से दशरथ ने राम तथा तीन अन्य प्रतापी पुत्रों को प्राप्त किया।
मेरा पोस्ट मे कहने का यह तात्पर्य है कि सनातनी लोग पहले के ऋषियों को चाहे जितना ज्ञानी और महान बताये, पर ये सारे लोग लंगोट के ढ़ीले थे।
विभण्डक, विश्वामित्र, पराशर और ऋंग जैसे कई ऋषि आपको मिल जायेंगे जो सुन्दर नारी देखते ही लार टपकाने लगते थे।
दूसरी बात इस कथा से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि पौराणिक-काल के आर्य राजा अपने दुश्मनों या किसी अन्य को फांसने के लिये वैश्याओं का सहारा लेते थे।
मतलब महिलाओं के माध्यम से किसी को फंसाने वाली यह तरकीब भी हमे विरासत मे ही मिली है।
वैसे मुझे तो ऐसा लगता है कि ये प्राचीन ऋषि भी आज के रामरहीम और आसाराम जैसे ही थे, लेकिन बाद मे इनके चेले-चपाटों ने इनका कुछ अधिक ही गुणगान कर दिया। इसमे कोई शक नही है कि जब कुछ दशकों बाद आसाराम के भक्त भी आसाराम की जीवनी लिखेंगे तो इन्हे भी दिव्यऋषि बतायेंगे, और इनके कुकर्मों पर भी बड़ी चालाकी से पर्दापोशी कर दी जायेगी।
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पहली बात तो ये जिस मनुस्मृति का सबसे अधिक सहारा लेते है, उसमे भी मुझे कहीं ऐसा लिखा नही मिला कि शूद्र राजा नही होगा। हाँ.. मनु ने अध्याय-4/61 मे यह जरूर लिखा है कि जिस राज्य का राजा शूद्र हो, वहाँ ब्राह्मण को निवास नही करना चाहिये। इससे भी यह तो पता चल ही जाता है कि पूर्वकाल मे शूद्र राजा होते थे, इसीलिये मनु ब्राह्मणों को शूद्रों के राज्य से चले जाने की सलाह दे रहे हैं।
दूसरी बात अम्बेडकर से पहले भारत मे शूद्र ही नही अतिशूद्र भी राजा हुये है। बिजली पासी और लाखन पासी क्या राजा नही थे? लाखन पासी के नाम पर तो लखनऊ शहर भी है, फिर इन्हे कैसे भुलाया जा सकता है? इसके अलावा राजा सुहेलदेव भी थे, और उनके ही आगे-पीछे कई जाट राजा भी थे, जो वर्तमान समय मे तथाकथित शूद्र ही है।
वैसे खुद डा० अम्बेडकर भी मानते थे कि शूद्रों को पहले वह तमाम अधिकार थे, जो ब्राह्मणो और क्षत्रियों को मिले थे। अम्बेडकर ने अपनी किताब "Who were shudra" मे पंडों से यही सवाल पूँछा था कि आपने किस आधार पर शूद्रों को निचले पायदान पर धकेला, जबकि वह वैदिककाल मे पहले तीनों वर्णों जैसे सम्मानित और सम्पन्न थे।
डा० अम्बेडकर ने पंडों से जो सवाल किया है, उसमे उन्होने तर्क और प्रमाण भी दिये हैं, पर शायद अम्बेडकर यह नही जानते थे कि आगे चलकर उनके नाम का प्रयोग करने वाले उनके ही चेले-चपाटे भी वही सब करेंगे, जो पंडों ने किया। इसलिये जो सवाल अम्बेडकर ने पंडों से किया था, वही मै आज भीमटों से कर रहा हूँ! दम है तो भीमटे जवाब दें, क्योंकि सवाल मेरे नही, उनके अपने ही आदर्श अम्बेडकर के हैं-
1- जब शूद्रों को अनार्य और आर्यों का शत्रु कहा जाता है और यह भी कहा जाता है कि आर्यों ने शूद्रों पर विजय प्राप्त करके उन्हे गुलाम बना लिया था! तो फिर ऐसा क्यों हैं कि यजुर्वेद और अथर्ववेद के ऋषियों ने शूद्रों के गौरव की कामना की है?
2- कहा जाता है कि शूद्रों को वेद पढ़ने का अधिकार नही था तो फिर ऐसा क्यों हुआ कि सुदास नामक शूद्र ने ऋग्वेद के मंत्रों की रचना की?
3- जब शूद्रों को यज्ञ करने का अधिकार नही था तो सुदास ने अश्वमेध-यज्ञ कैसे किया, और शतपथ ब्राह्मण मे शूद्रों को याजक क्यों माना गया?
4- जब शूद्रों को सम्पत्ति रखने का अधिकार नही था, तो मैत्रायणी और काठक संहिता मे शूद्रों को धनी और सम्पन्न कैसे बताया गया?
5- जब शूद्रों का कर्तव्य तीन उच्च-वर्णों की सेवा ही करना था, तो सुदास और पैजवन नामक शूद्र महाभारत काल मे राजा कैसे हुये?
इन पाँच सवालों के अतिरिक्त अम्बेडकर ने और भी तार्किक सवाल किये हैं, जैसे कि "यदि ब्राह्मण शूद्रों को उपनयन संस्कार करवाते, उन्हे वेद पढ़ाते और उनके घर यज्ञ करते तो उन्हे ही फायदा होता! शूद्रों को उपनयन, वेदाध्यन और यज्ञ का अधिकार देने से ब्राह्मणों को मोटी दक्षिणा मिलती।"
जब भीमटे कहते ही हैं कि ब्राह्मण लालची होते हैं तो शूद्रों को यह अधिकार देने से ब्राह्मणों की कोई क्षति न होती और उनकी कमाई ही बढ़ती तो ब्राह्मण अपना नुकसान क्यों करते?
आखिर जितने अधिक ग्राहक, उतना अधिक फायदा।
अब मै भीमटों से यही कहूँगा कि आओ और इस पोस्ट पर अपना ज्ञान दो! या तो खुद झूठे साबित होकर भ्रामक-प्रचार बन्द करो, या अपने बाप अम्बेडकर को झूठा साबित करो।
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कल मैने एक पोस्ट लिखकर यह समझाने का प्रयास किया था कि पूर्वकाल मे ऋषि-मुनि भी काम (Sex) मे विरक्त नही थे!
इसके बदले मे कई लोग मेरे विरोध मे उतर आये, कुछ लोगो ने मुझे मूर्ख,मुल्ला और ना जाने क्या-क्या उपाधियाँ दे दी!
अब मै जरा उसी पर फिर से आता हूँ, सामान्यतः यह अवधारणा है कि ऋषि लोग काम को जीत लेते थे, पर जरा गौर करना कि पूर्वकाल मे लगभग पुरुष बहुपत्निक होते थे!
ऋषि कश्यप की तेरह पत्नियाँ थी, जिनसे उन्होने करोड़ संतान पैदा की!
मनु के पुत्र उत्तानुपात की दो पत्नियां थी, सुरूचि और सुनीति!
कृष्ण के पिता वासुदेव की दो पत्नियां थी, रोहिणी और देवकी!
राम के पिता दशरथ को तीन पत्नियाँ थी, कौशिल्या, कैकेयी और सुमित्रा!
अरे मनुष्य तो क्या तथाकथित देवता थी बहुपत्निक ही थे!
चन्द्रमा को 27 पत्नियां थी, जिनके नाम से 27 नक्षत्रों के नाम है! इसके बाद भी इन्होने अपने गुरू वृहस्पति की पत्नि तारा से मुँह काला किया!
इन्द्र के बारें मे कुछ कहना ही सूर्य को दीपक दिखाने के बराबर होगा!
अग्निदेव की भी दो पत्नियां थी, स्वाहा और स्वधा!
आखिर जब ये महामानव काम को जीत चुके थे तो एक पत्नि से संतोष क्यो नही होता था!
बहुत सारे लोग मुझे कहते हैं कि तुम पुराणों के संदर्भ से बात करते हो।
अरे भाई! तो इसमे मै क्या करूँ?
क्या पुराणों को मेरे दादा-परदादा ने लिखा था!
चलो अगर पुराणों की बात को ही पूर्णतः सच मान लिया जाये कि ऋषि-मुनियों के पास अप्सराओं को इन्द्र भेजता था, वो तो वैराग्य मे खुश थे!
तब भी यहाँ यह सवाल उठेगा कि ऋषियों की तपस्या भंग करने के लिये इन्द्र अप्सराऐं ही क्यो भेजता था?
क्या इन्द्र जानता था कि ऋषियों के मन मे अप्सराओं की इच्छा है!
आखिर वह अप्सराओं के बदले हीरे-मोती के ढ़ेरों आभूषण और स्वादिष्ठ पकवान भी तो भेज सकता था, जिसकी लालच मे ऋषि-मुनि अपनी साधना तोड़ देते! पर वह हर बार अप्सरा ही भेजता था, इसका कोई तो कारण होगा!
रामायण मे कुम्भकर्ण को नींद से जगाने के लिये रावण ने सुन्दर स्त्री नही भेजी थी, बल्कि स्वादिष्ठ भोजन भेजा था! क्योकि रावण जानता था कि कुम्भकर्ण को स्वादिष्ठ भोजन पसन्द है, और उसकी महक से कुम्भकर्ण जाग जायेगा!
क्या इसी प्रकार इन्द्र जानता था कि ऋषियों को अप्सराऐं पसन्द है, और उनकी पायल की खनक सुनते ही इनकी साधना टूट जायेगी!
उसका यह प्रयोग सच भी होता था, अप्सराओं को देखते ही ऋषि-मुनि लार टपकाने लगते थे, और अपनी वर्षो की कठोर साधना तोड़ देते थे!
आश्चर्य की बात तो यह है कि इन्ही पुराणों मे यह भी लिखा है कि जब कोई असुर तपस्या करता था, तब भी इन्द्र उनके तप को भंग करने के लिये इन्ही अप्सराओं को भेजता था!
तब भी अप्सराऐं आकर अपने लटके-झटके दिखाती थी, पर कोई भी असुर इनके झांसे मे नही आता था!
तो क्या यह मान लेना चाहिये कि ऋषि-मुनि असुरों से भी अधिक लंगोट के ढ़ीले थे!
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अगर यह कहा जाये कि पौराणिक-काल के ऋषि-मुनि समाज के "छुट्टा सांड़" होते थे, तो इससे किसी को आपत्ति नही होनी चाहिये।
पुराणों और दूसरें ग्रंथों को पढ़ने से कम से कम दिमाग मे यही बात आती है कि पुरातन-काल मे जो ऋषि थे, उसमे से अधिकांश मैथुन के मामले मे पशुवत-वृत्ति वाले थे।
पुराणों के अध्ययन से ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीन आर्य-राजाओं की ऐसी लालसा होती थी कि उनकी संतति अच्छी उत्पन्न हो, अतः वे खुशी-खुशी अपनी रानियों को गर्भवती करने के लिये ऋषियों की शरण मे जाया करते थे। उनकी दृष्टि मे ये ऋषि "कुलीन सांड़" होते थे, और मै यह बात ऐसे ही नही कह रहा हूँ, नीचे कुछ प्रमाण भी देता हूँ-
........ सत्यकाम जबाल की कथा लगभग सभी को मालुम है! कई लोग इस कथा को उदाहरण-स्वरूप भी बताते हैं कि किस तरह एक गणिका-पुत्र जबाल ऋषि बन गये थे।
वैसे यह कथा छान्दोग्योपनिषद चतुर्थखण्ड (चित्र-1-3) मे लिखी है! इस कथा को एक झूठ के साथ बताया जाता है कि सत्यकाम की माँ जबाला गणिका (वैश्या) थी। वास्तव मे जबाला गणिका नही थी, वह शादीशुदा थी और बहुत सारे अथितियों की सेवा-टहल करती थी।
जब सत्यकाम अपनी माँ से पूँछते हैं कि माँ मेरा गोत्र क्या है?
तब जबाला कहती है कि हे पुत्र! मै अपने पति के घर आये बहुत सारे अतिथियों की सेवा करने वाली परिचायिका थी, और उन्ही जवानी के दिनों मे मैने तुम्हे जन्म दिया था! अतः मुझे नही मालुम कि तुम्हारा गोत्र क्या है?
अब इस कथा का गीताप्रेम वाले चाहे जितना लीपापोती करके भाष्य करें, पर सच यही था कि जबाला को यह पता ही नही था कि उसने किस पुरुष के संसर्ग से सत्यकाम को पैदा किया था। और तो और जबाला यह सारे कर्म तब से करती थी, जब उसके पति जीवित भी थे।
........ ऋषियों के रंगीन-मिजाजी वाली कहांनियों से पुराण भरे पड़े हैं, पर यहाँ मै उन कथाओं का उल्लेख करना चाहता हूँ, जिसे कम लोग जानते हैं।
ऐसी ही एक कथा महाभारत के उधोगपर्व (अध्याय-103 से 123 तक) मे माद्री की आती है!
माद्री राजा ययाति के कुल से थी, फिर भी उसे एक के बाद एक कई ऋषियों के साथ सहवास करना पड़ता है, और जब सारे ऋषियों का मन माद्री से भर जाता है तो वे उसे पुनः राजा ययाति को वापस लौटा देते हैं।
एक अन्य कथा महाभारत के "आदिपर्व" मे महर्षि उतथ्य की आती है, जो ऋषि अंगिरस के कुल के थे।
महर्षि उतथ्य की पत्नि ममता बहुत सुन्दर थी, और उतथ्य का छोटा भाई वृहस्पति (जो देवऋषि माने गये हैं) ममता पर आसक्त था। एक दिन जब ममता घर मे अकेली थी तो वृहस्पति ने मौका देखकर ममता से सम्भोग करना चाहा, जिस पर ममता ने यह कहकर मना कर दिया कि " अभी मै गर्भवती हूँ, अतः आप प्रतिक्षा करो"
सोचने वाली बात यह है कि यहाँ ममता ने वृहस्पति को फटकारा नही, और न ही यह कहा कि यह अनैतिक है। केवल इंतजार करने के लिये कहा! इससे ऐसा लगता है कि ममता और वृहस्पति के बीच अनुचित सम्बन्ध रहे होंगे! हालांकि वृहस्पति ममता के इस अर्ध-इनकार से भी इतने नाखुश हुये कि उन्होने ममता को श्राप दे दिया कि तेरा पुत्र अंधा पैदा होगा। हुआ भी वही, ममता के पुत्र ऋषि दीर्घतमा अंधे ही पैदा हुये।
वैसे, यहाँ यह भी जान लेना चाहिये कि खुद वृहस्पति की पत्नि तारा को इनके ही शिष्य चन्द्र उठा ले गये थे, और उससे सहवास करके "बुध" नामक पुत्र को पैदा किया था। आगे चलकर इसी गुरूपत्नि-पुत्र बुध से चंद्रवंशीय क्षत्रियों की उत्पत्ति हुई।
........ पूर्वकाल मे ऋषि किस कदर कामान्ध होते थे, इसका एक उदाहरण डा० अम्बेडकर ने अपनी बहुचर्चित किताब "रिडल इन हिन्दुइज्स" के पृष्ठ-298 (चित्र-4-5) पर उल्लेख किया है!
अम्बेडकर ने लिखा है कि पूर्वकाल मे यदि कोई ऋषि यज्ञ कर रहा होता था, और यदि उसी समय वह किसी स्त्री से संभोग करना चाहता था तो ऋषि यज्ञ को अधूरा छोड़कर एकांत मे जाने के बजाए यज्ञ-मण्डप मे ही खुलेआम उस स्त्री से मैथुन कर सकता था। बाद मे इस घृणित-कृत्य को भी "वामदेव व्रत" नामक धार्मिक विधान बना दिया गया, और कालान्तर मे यही 'वाममार्ग' कहलाया।
........ रंगीन-ऋषियों की सूची और भी लम्बी है, जिसमे पराशर, कर्दम, विभण्डक और दीर्घतमा के नाम मुख्य हैं, पर इसी पोस्ट मे सारी कथाऐं लिखना सम्भव नही है।
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पुराणों मे कई जगह ऐसा लिखा है कि पौराणिक-काल मे ऋषि-मुनि इतने सामर्थ्यवान होते थे कि अपने तपोबल से कोई भी असाध्य-कार्य क्षणमात्र मे कर डालते थे।
पुराण कहते हैं कि प्राचीन ऋषियों ने संकल्पमात्र से ऐसे-ऐसे कार्य कर दिये जो सम्भव ही नही थे। जैसे कि माण्डव ऋषि का सशरीर यमलोक जाना और अगस्त्य ऋषि पूरा समुद्र पी जाना, इत्यादि!
वैसे इन कथाओं को सुनने के बाद साधारण-बुद्धि से भी यही लगता है कि ये बातें झूठी हैं। अब मै आपको मनुस्मृति से कुछ ऐसे श्लोक दे रहा हूँ जो यह प्रमाणित कर देंगी कि ऋषि-मुनि कोई भी चमत्कार करने मे समर्थ नही थे।
मनुस्मृति काफी प्राचीन ग्रंथ है इसमे कोई शक नही है। मनुस्मृति मे कहीं भी शिव और विष्णु तक का उल्लेख नही है। मतलब यह ग्रंथ इतना तो प्राचीन है ही कि शिव और विष्णु वाली कथाऐं इस ग्रंथ के बाद हिन्दू समाज आयी। इसी मनुस्मृति के दसवें अध्याय मे मनु ने यह बताने का प्रयास किया है कि मांस खाना विषम परिस्थिति मे पापाचार नही है।
मनु ने लिखा है कि यदि आप भूख से व्याकुल हो, और आपके पास खाने की कोई दूसरी सामाग्री नही है तो आप मांस खा सकते हो, इससे तनिक भी पाप नही लगेगा! अपनी इसी बात को प्रमाणित करने के लिये मनु ने कुछ उदाहरण भी दिये हैं, जिसमे उन्होने बताया है कि प्राचीनकाल मे किस तरह बड़े-बड़े ऋषि भी भूख से व्याकुल होने के बाद कुत्ते तक का मांस खाने के लिये विवश हो गये थे, लेकिन फिर भी उन्हे पाप नही लगा।
इसी कड़ी मे मनु ने मनुस्मृति-10/105-108 (चित्र देखें) मे लिखा है कि पूर्वकाल मे ऋषि विश्वामित्र और वामदेव ने भूख से अपने प्राणों की रक्षा करने के लिये कुत्ते के भांस का भक्षण किया, फिर भी वे पापरहित बने रहे।
अब मेरा सवाल यह है कि यदि ऋषि-मुनि अपने तपोबल से कुछ भी करने मे समर्थ थे तो क्या इसी तपोबल से वे अपने लिये स्वादिष्ट भोजन या फल की व्यवस्था नही कर पाये? तब उनका तपोबल कहाँ चला गया था जब वे प्राणरक्षा हेतु कुत्ते जैसे जीव का मांसाहार करने को विवश हुये?
वामदेव के चमत्कारों को तो सभी जानते हैं, ये दशरथ के पूज्य भी थे। विश्वामित्र के बारे मे जितना कहा जाये कम ही होगा, इन्होने तो अपने पतोबल से राजा त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया था। ऐसे महातपस्वी भी अपने लिये न तो भोजन एकत्र कर पाये और न ही अपने तप से अपनी भूख को नियंत्रित कर पाये।
बात स्पष्ट है, ये तपोबल वाली सारी कहाँनिया भोले-भाले लोगों को बेवकूफ बनाने के लिये गढ़ी गयी हैं, अन्यथा वेद-वेदान्त के ज्ञाता और इतने बड़े तपस्वी ऋषियों ने कुत्ते का मांस खाना क्यों स्वीकार किया?
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पुराणों मे ऐसे कई प्रकरण मिल जायेंगे जब किसी राजा या अन्य को संतान न होने पर ऋषियों से यज्ञ-हवन करवाने या आशिर्वाद प्राप्त करने से संतानोत्पत्ति हो जाती थी।
रामायण काल मे देखा जाये तो राम और उनके चारों भाइयों का जन्म भी ऐसी ही पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाने से हुआ था।
महाभारत काल मे तो कर्ण, पाँचों पाण्डव, पाण्डु, धृतराष्ट्र और विदुर समेत कई महापुरुष देवताओं या ऋषियों के आशिर्वाद से ही पैदा हुये हैं।
अब हम संतानोत्पत्ति के दूसरे पहलु पर आते हैं। प्राचीनकाल मे सनातनियों मे नियोग प्रथा आम बात थी। पूर्वकाल मे जब किसी महिला को अपने पति से संतान नही पैदा होता था तो वह किसी ऋषि या देवता से नियोग करके संतान पैदा करती थी। आगे चलकर इसी प्रथा को मनु ने धार्मिक नियम बना दिया था। मनु ने मनुस्मृति-9/59 (चित्र-1) मे लिखा है-
"देवराद्वा सपिण्डाद्वा स्त्रिया सम्यङ् नियुक्तया।
प्रजेप्सिताधिगन्तव्या सन्तानस्य परिक्षये।।"
अर्थात- अपने पति और गुरूजनों की आज्ञा से संतान न होने पर स्त्री देवर या सपिण्ड से अभीष्ट (नियोग करके) संतान पैदा करे!
अब यह सोचकर ही घृणा होती है कि पूर्वकाल मे संतान के लिये बड़े-बड़े राजा भी अपनी पत्नियों को किसी दूसरे पुरुष को सौंप देते थे।
वास्तव मे नियोग प्रथा एक घृणित व्यवस्था थी.. नियोग प्रथा का वर्णन मनुस्मृति मे ही मिलता है, पर मनु भी इसे "पशु-धर्म" ही मानते थे।
मनु ने मनुस्मृति-9/65-66 (चित्र-2/3) मे लिखा है-
"विवाह के वेदोक्त मंत्रों मे नियोग और विधवा विवाह का कही वर्णन नही है। यह पशुधर्म है और विद्वान ब्राह्मणों ने इसकी निन्दा की है। मानव समाज मे बेन राजा के समय मे यह पशु-धर्म प्रचलित हुआ।"
मतलब साफ है कि मनु भी इसे पशुवत्-कृत्य ही मानते थे, और उन्होने यह भी साफ कर दिया कि इसे मैने नही बनाया, बल्कि यह प्रथा तो मुझसे पहले (बेन राजा के समय) से चली आ रही है।
खैर.. अब मै मुख्य-विषय पर आता हूँ। यहाँ सवाल यह उठता है कि जब पूर्वकाल मे ब्राह्मण इतने तपस्वी होते थे कि यज्ञ करने से या आर्शिवाद देने से पुत्र पैदा करने मे सक्षम थे तो मनु ने नियोग जैसी बकवास प्रथा को क्यों आगे बढ़ाया?
मनु के मनुस्मृति मे लिखना चाहिये था कि- "जब किसी स्त्री को संतान न हो तो वह ऋषियों से पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाये अथवा मंत्रोच्चारित फल या खीर खाकर पुत्र पैदा करे। लेकिन इसके बदले मे मनु से किसी पर-पुरुष से सम्भोग करने की सलाह क्यों दी?
बात साफ है कि युग कोई भी रहा हो, बिना स्त्री-पुरुष के समागम से संतान कभी भी पैदा नही होती थी। यह बात मनु भी जानते थे, इसलिये उन्होने न चाहते हुये भी इस निन्दनीय-कृत्य को करने की विधि बनायी, ताकि आगे वंशवृद्धि हो सके। मनु जानते थे कि यदि कोई महिला अपने पति से गर्भवती न होने पर किसी अन्य पुरुष से गर्भधारण करेगी तो समाज उसे कलंकित मानेगा। इसीलिये उन्होने नियोग को धार्मिक प्रावधान बना दिया, ताकि न तो समाज महिला की निन्दा कर सके, और महिला भी आत्मग्लानि से बची रहे।
वास्तव मे सच्चाई यही है कि पुराणों और रामायण/महाभारत मे जितने भी महापुरुष मंत्रोच्चारित फल अथवा खीर पीने से, या देवताओं अथवा ऋषियों (ब्राह्मणों) के आशिर्वाद से पैदा हुये हैं, वे सब नियोग द्वारा ही जन्मे हैं। लेकिन ग्रंथों को लिखने वालों ने इस बात को छुपा दिया है। यदि पूर्वकाल मे सचमुच ऐसे चमत्कृत ढ़ंग से संतान पैदा करने की कोई भी विधि होती तो मनु कभी भी "नियोग-प्रथा" को धार्मिक प्रावधान न बनाते।
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