पुराणों मे क्षत्रियों के दो प्रतापी कुल (वंश) मिलते हैं, पहला सूर्यवंशी क्षत्रिय और दूसरा चन्द्रवंशी क्षत्रिय।
सूर्यवंशी क्षत्रियों मे हरिश्चन्द्र, सगर, भागीरथी, मान्धाता, इक्ष्वाकु, रघु और दशरथ वगैरह आते हैं! आगे इसी वंश मे रामजी का भी जन्म हुआ था....
चन्द्रवंशी क्षत्रिय कुल मे पुराणों के अनुसार श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था, वैसे तो श्रीकृष्ण के कुल को लेकर अक्सर कई भ्रांतियाँ हैं, कोई कहता है कि कृष्ण ग्वाल (अहिर) थे तो कोई उन्हे क्षत्रिय मानता है। आज मै इस बात को स्पष्ट करने के लिये चंद्रवंशी क्षत्रियों का इतिहास शुरू से बताता हूँ ----
ब्रह्मा के पुत्र अत्रिऋषि थे, अत्रि और अनुसूइया के पुत्र चन्द्र थे और इन्ही चन्द्र से चंद्रवंशीय क्षत्रियकुल का प्रारम्भ हुआ।
चन्द्र के पुत्र बुध थे, बुध के पुरूरवा, पुरूरवा के नहुष, नहुष के ययाति और ययाति के पुत्र यदु थे! इन्ही यदु के कुल मे श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था।
यदु चार भाई थे, इनके दूसरे भाई पुरू के वंश मे जनमेजय, दुष्यन्त, भरत, भीष्म, धृतराष्ट्र, पाण्डु और दुर्योधन वगैरह पैदा हुये, जो बाद मे कौरव और पाण्डव कहलाये! ये सभी चन्द्रवंशीय क्षत्रिय ही थे....
अब यदु के वंश पर भी नजर डालते हैं! यदु के पुत्र थे सहस्त्रजित, सहस्त्रजित के शतजित, शतजित के हैहय, हैहय के धर्म, धर्म के नेत्र, नेत्र के कुन्ति, कुन्ति के छः पीढ़ी बाद इसी कुल मे सहस्त्रबाहु अर्जुन पैदा हुआ! इसी अर्जुन से नफरत के कारण परशुराम ने 21 बार क्षत्रियों का विनाश किया था।
अब यहाँ विचार करने की बात है कि कहते हैं विष्णु ने परशुराम का अवतार लेकर यदुवंशी (हैहयवंशी) क्षत्रियों का विनाश किया और फिर बाद मे विष्णु ने इसी यदुवंश मे कृष्ण के रूप मे फिर अवतार लिया।
दूसरी बात यदि यदुवंश मे ही पैदा होकर सहस्त्रार्जुन क्षत्रिय था तो इस यदुवंश मे पैदा होकर कृष्ण ग्वाल (अहिर) कैसे हो गये?
खैर.. अब आगे इसी यदुवंश मे दर्जनों पीढ़ियों बाद वृष्णि और मधु नामक दो और प्रतापी राजा हुये! कृष्ण भी वृष्णिवंश मे ही पैदा हुये और और मधु उनके पूर्वज थे, अतः कृष्ण को "माधव" भी कहा जाता था। राजा वृष्णि के दो पुत्र थे, श्वफल्क और चित्ररथ!
श्वफल्क के वंश मे आगे चलकर आहुक हुये और आहुक के दो पुत्र थे, देवक और उग्रसेन।
देवक की पुत्री देवकी थी, जो बाद मे कृष्ण की माँ हुई और उग्रसेन का पुत्र कंस था, जिसका वध कृष्ण ने ही किया था।
वृष्णि के दूसरे पुत्र चित्ररथ के वंश मे आगे चलकर सूरसेन पैदा हुये और सूरसेन के पुत्र थे वासुदेव, जो श्रीकृष्ण के पिता थे।
अब इससे यह तो स्पष्ट है कि देवकी और वासुदेव दोनो ही चंद्रवंशीय क्षत्रिय थे, न कि गोप और ग्वाल।
पाण्डवों की माँ कुन्ती (पृथा) भी सूरसेन की पुत्री और वासुदेव की सगी बहन थी, जिनका विवाह चंद्रवंशीय पुरू के वंशज पाण्डु से हुआ था।
कृष्ण के पिता वासुदेव की कुल 24 पत्नियाँ थी, जिनमे से एक पत्नि रोहिणी से बलराम का जन्म हुआ था।
अब इस पूरे यदुकुल मे मुझे तो कहीं भी नंद ग्वाल के पूर्वज नही मिले, फिर वर्तमान के ग्वाल (अहिर) खुद को कैसे कृष्ण का वंशज मान लेते हैं?
और यदि वास्तव मे आज के यादव (अहिर) कृष्ण के वंशज हैं तो ग्वाल कैसे हुये, उन्हे तो चंद्रवंशीय क्षत्रिय होना चाहिये?
नंद ग्वाल की कथा शिवपुराण मे एक जगह मिलती है, जहाँ कहा गया है कि शिव ने नंद को पूर्वजन्म मे वर दिया था कि तुम्हे अगले जन्म मे विष्णु के अवतार कृष्ण के पालन-पोषण का सौभाग्य प्राप्त होगा।
अब सवाल यह है कि यदि इसी यदुकुल मे पैदा होने वाले सहस्त्रार्जुन, भीष्म और कौरव-पाण्डव क्षत्रिय थे, तो पता नही कैसे कृष्ण को ग्वाल बना दिया गया।
सच तो यही है कि कृष्ण भी चंद्रवंशीय क्षत्रिय थे, न कि आज के अहीर।
चंद्रवंश मे यदु, मधु और वृष्णि जैसे प्रतापी राजा हुये थे, जिनके वंशज होने के नाते कृष्ण को यादव, माधव और वार्ष्णेय भी कहा जाता था, और इन उपनामों का 'जाति' से कोई लेना-देना नही था।
-------- यह लेख मत्स्यपुराण अध्याय-43 से 46 तक (पहले छः चित्र), और भागवतपुराण, नवम स्कन्ध, अध्याय-18 से 23 तक (दूसरे छः चित्र) से लिया गया है।
इसके अलावा महाभारत और हरिवंशपुराण मे भी यही प्रमाण मिलते हैं।
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महाभारत ने यादवों के अस्तित्व पर कई सवाल दागे हैं, जिनका शायद ठीक-ठाक जवाब खोजना आज भी बड़ी चुनौती साबित हो रहा है!
पूरे महाभारत मे कृष्ण को यदुवंशी (वृष्णिवंशी) बताया गया है, और वर्तमान के यादव (अहिर) श्रीकृष्ण को अपना पूर्वज मानते है!
लेकिन महाभारत और भागवतपुराण के अनुसार श्रीकृष्ण का कोई भी वंशज जीवित ही नही बचा था, फिर सवाल यह है कि किस आधार पर यादव खुद को कृष्ण का वंशज कहते हैं!
अगर महाभारत मे ये बात झूठी लिखी है तो पूर्ण महाभारत को झूठ और कृष्ण को एक कल्पना ही मानना चाहिये, और यदि महाभारत और कृष्ण को सच माना जाये तो इस घटना को भी सच ही मानना चाहिये! ऐसा तो सम्भव नही कि आधी बात सच और आधी झूठ मान लो!
महाभारत के 'स्त्रीपर्व' मे लिखा है कि अपने सौ पुत्रों के मृत्यु के बाद शोकग्रस्त होकर गांधारी ने कृष्ण को श्राप देते हुये कहा था कि- "जिस तरह तुमने कौरवों और पाण्डवों, दोनो भाइयों को आपस मे लड़वाकर उनका विनाश करवा दिया, तुम भी उसी तरह अपने सभी बन्धु-बान्धवों वध करोगे! आज जैसे भरतवंशी स्त्रियां विलाप कर रही है, वैसे ही यादवों की स्त्रियां भी विलाप करेंगी! मैने पतिसेवा से जो तप संचय किया है, उसी के प्रभाव से मै तुम्हे श्राप देती हूँ"
दूसरी घटना महाभारत के "मौसलपर्व'' की है, जब कृष्ण और जामवंती के 'साम्ब' ने स्त्री के कपड़े पहनकर और घूंघट निकालकर विश्वामित्र और कण्व जैसे ऋषियों से विनोदवश यह पूँछा कि मै गर्भवती हूँ, और हे ऋषिवर! बताओ मेरे गर्भ मे पुत्र है या पुत्री?
ऋषियों ने तपोवल से सारी बातें जान ली, और साम्ब को श्राप दिया कि 'तू राज-वैभव के नशे मे चूर है, अतः हम तुझे श्राप देते हैं कि तू ऐसा मूसल जनेगी जिससे सम्पूर्ण यदुकुल का विनाश हो जायेगा'
ऋषियों का श्राप सच हुआ, और प्रभासक्षेत्र मे सारे यदुवंशी आपस मे लड़कर मर गये! आम्ब, साम्ब, बलराम, प्रधुम्न, चारुदेष्ण, अनिरुद्ध, सात्यकि, कृतवर्मा और कृष्ण के सारे पुत्र-पौत्र समेत तमाम यदुवंशी नशे मे धुत होकर खुद का विनाश कर बैठे !
अन्त मे जरा नामक बहेलिये के हाथो श्रीकृष्ण भी मृत्यु को प्राप्त हो गयी!
यह समाचार सुनकर शोकसंतिप्त होकर वासुदेव ने भी अपने प्राण त्याग दिये तथा उनकी चारों रानियाँ देवकी, भद्रा, रोहिणी और मदिरा भी उन्ही के साथ चिता पर बैठकर सति हो गयी!
श्रीकृष्ण की भी पत्नियां रुक्मिणी, शैब्या, और जामवन्ती वगैरह ने भी पति-वियोग आत्मदाह कर लिया!
द्वारिका मे अब केवल कृष्ण की सोलह हजार विधवा पत्नियाँ और अन्य यदुवंशियों की लाखों विधवाऐं ही बची थी!
इन विधवा नारियों को अर्जुन कहीं सुरक्षित जगह पर पहुचाना चाहते थे, क्योंकि अब द्धारिका भी समुद्र मे डूबने वाली थी, जिसका अर्जुन को पहले से ही ज्ञान था!
अर्जुन ने जैसे ही लाखों विधवाओं को द्वारिका से बाहर निकाला, वैसे ही पूरी द्वारिका नगरी समुद्र मे डूब गयी!
अब जरा यह सोचो कि यदि यदुवंश मे कोई पुरुष जीवित नही बचा तो वर्तमान मे जो खुद को कृष्ण का वंशज कहते हैं, उनकी बात सच कैसे मान ली जाये!
दूसरी बात महाभारत मे एक और ऐसी घटना है जिसे लिखते हुये भी मुझे शर्मिंदगी हो रही है!
असल मे इसी 'मौसलपर्व' मे लिखा है कि जब अर्जुन श्रीकृष्ण की सोलह हजार रानियां और अन्य यदुवंशियों की रानियों को लेकर कुरुक्षेत्र जा रहे थे तभी अचानक रास्ते मे कुछ क्रूर डाकुओं ने उन सुन्दर स्त्रियों को देखकर उन पर हमला कर दिया!
बेचारे अर्जुन लड़ते रहे, पर उन डाकुओं ने अर्जुन को हराकर कृष्ण की सुन्दर पत्नियों को उठाकर अपने साथ लेकर भाग गये!
कृष्ण और अन्य यदुवंशियों की पत्नियां चिल्ला रही थी, पर वो निर्दयी डाकू उन्हे घसीट-घसीटकर जंगलों मे लेकर चले गये!
जरा सोचो कि जो कृष्ण द्रोपदी की लाज बचाने खुद आये थे, वही अपनी पत्नियों की इज्जत नही बचा पाये, और उन डाकुओं को मै क्या कहूँ जो स्वयं भगवान की बीवियों को उठा ले गये।
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