ऐसा लगता है कि रामायण-काल मे महिलाओं को दण्डित करने के लिये उनके नाक, कान और स्तन काटना साधारण सी बात थी...
कम से कम रामायण मे ही ऐसे तीन प्रकरण मिलते हैं जब राम और लक्ष्मण ने महिलाओं को दण्ड देने के लिये उनका अंग-विच्छेदन किया और नाक, कान अथवा स्तन काट दिये।
....... इसका पहला प्रमाण वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड, सर्ग-26/11(चित्र-1) मे मिलता है-
राम और लक्ष्मण जब विश्वामित्र के साथ वन मे जा रहे थे, तब रास्ते मे उन्हे ताड़का नामक राक्षसी मिली। विश्वामित्र ने लक्ष्मण को बताया कि यह राक्षसी बहुत ही क्रूर है! तब लक्ष्मण ने विश्वामित्र से कहा कि "मै अभी इसके नाक, कान काटकर पीछे लौटने को विवश करता हूँ"
यही नही.. जब राम ने अपने तीरों से ताड़का की दोनो भुजाऐं काट दी, तब भी लक्ष्मण से न रहा गया और उन्होने मर रही ताड़का के नाक, कान काट लिये। (इसी सर्ग का श्लोक-18, चित्र-2)
वैसे राम और लक्ष्मण को स्त्री-हत्या के लिये उकसाने वाले भी विश्वामित्र ही थे! बालकाण्ड-25/18 (चित्र-3) मे विश्वामित्र ने राम से कहा था कि "हे राम! तुम स्त्री-हत्या का विचार करके इस (ताड़का) के प्रति दया न दिखाना"
....... नाक, कान काटने वाला दूसरा मामला सूर्पणखा का है, जो लगभग सर्वविदित है।
वाल्मीकि रामायण, अरण्यकाण्ड सर्ग-18/22 (चित्र-4) मे यह प्रकरण है कि लक्ष्मण ने राम के आदेश पर सूर्पणखा के नाक और कान काट लिये थे।
....... रामायण मे महिला के अंग-विच्छेदन का तीसरा मामला अरण्यकाण्ड के ही सर्ग-76/17 (चित्र-5) मे मिलता है! वैसे, इस बार मामला जरा अधिक ही गम्भीर है, क्योंकि इस बार लक्ष्मण ने केवल एक स्त्री के नाक और कान ही नही काटे, बल्कि उसके स्तन भी काट डाले।
असल मे सीता को खोजते हुये राम और लक्ष्मण जब वन मे विचरण कर रहे थे, तभी उन्हे वन मे ही अयोमुखी नामकी एक राक्षसी मिली थी। अयोमुखी ने लक्ष्मण के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा और लक्ष्मण को अपनी बाहों मे भर लिया...
लेकिन क्रोध मे आकर आर्यपुत्र लक्ष्मण ने राक्षसी के नाक, कान और स्तन भी काट दिये।
इन तीनों मामले मे ही महिलाओं को अंग-विहीन किया गया है। मै ये भी नही कह रहा हूँ कि वे तीनों महिलाऐं बहुत साध्वी थी!
हाँ.. वे राक्षसकुल से थी और स्वभाव की उग्र भी थी, पर क्या दण्ड देने के लिये कान, नाक और स्तन काटना जरूरी था?
इससे तो अच्छा होता कि उन्हे मार ही डालते...
आखिर ऐसा दण्डविधान किस वैदिक-ग्रंथ मे लिखा है, जिसका अनुशरण राम और लक्ष्मण कर रहे थे?
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रामायण की एक पात्र कैकेयी का नाम तो सभी ने सुना ही है! कैकेयी को लोग आमतौर पर एक खलनायिका ही समझते हैं, क्योंकि इन्ही की वजह से राम को चौदह वर्ष के लिये वन मे जाना पड़ा था!
पर इसके पीछे एक दूसरी कहानी भी है, जिसे कम ही लोग जानते हैं!
हमारे पंडे-पुरोहित बहुत चालाक थे, वो किसी सच्ची बात को दबाने के लिये एक झूठी कहानी गढ़ देते थे! ऐसी ही एक कहानी कैकेयी के साथ भी बनायी गयी।
रामायण के अनुसार एक बार राजा दशरथ देवताओं की सहायता के लिये असुरों से युद्ध करने देवलोक गये तथा उनकी प्रिय रानी कैकेयी भी उनके साथ गयी।
युद्ध के दौरान दशरथ के रथ का धुरा टूट गया, तब समझदार कैकेयी ने धुरे मे अपना हाथ लगाकर रथ को टूटने से बचाया!
युद्ध समाप्त होने के बाद जब दशरथ को यह बात पता चली तो वे कैकेयी की समझदारी से खुश होकर उससे दो वर मांगने को कहने लगे, जिसे कैकेयी ने उचित अवसर पर मांगने को कह दिया था।
रामायण के अनुसार कैकेयी ने यही दो वर मांगकर राम को वनवास भेज दिया, और भरत को राजा बनाने की कुचेष्टा की।
......वैसे सम्भवतः यह एक झूठी कहानी है, वास्तव मे रणक्षेत्र मे महिलाऐं जाती ही नही थी! अगर कैकेयी गयी भी थी तो रथ आसमान मे उड़ रहा था, भला पहिऐ के भीतर अपना हाथ डालने के बाद कैकेयी कहाँ खड़ी थी?
...... भला एक महिला का कोमल हाथ कब तक रथ का धुरा बन सकता था?
--- केवल इस दृष्य की कल्पना ही करो तो अपने आप हंसी छूटने लगती है!
सच्चाई यह है कि कैकेयी कैकेय देश के राजा अश्वपति की पुत्री थी... कैकेयी बहुत सुन्दर थी, और राजा दशरथ उस पर मोहित थे! पर दशरथ पहले से ही विवाहित थे, अतः अश्वपति कैकेयी की शादी दशरथ से करने को तैयार नही थे।
अन्ततः कैकेयी को पाने के लिये दशरथ ने अश्वपति को वचन दिया था कि कैकेयी से जो पुत्र पैदा होगा, मै उसी को राजा बनाऊँगा...
दशरथ के इस वचन से अश्वपति मान गये, और उन्होने कैकेयी की शादी दशरथ से कर दी!
यह कथा पुराणों (खासकर पद्मपुराण) मे मिलती भी है कि किस तरह दशरथ ने भीष्म पितामह के पिता शान्तनु जैसा वर देकर कैकेयी को प्राप्त किया था।
कहते हैं कि "रघुकुल रीति सदा चली आयी, प्राण जाये पर वचन न जायी"
लेकिन यह भी सरासर झूठ ही है! अपने वचनानुसार दशरथ कैकेयी के पुत्र (भरत) को राजा बनाते, पर दशरथ को राम अधिक प्रिय थे, अतः मन ही मन उन्होने राम को राजा बनाने का संकल्प किया!
दशरथ अपना वचन तोड़ रहे थे, इसलिये राम के राज्याभिषेक के समय उन्होने भरत को ननिहाल भेज दिया था, पर कैकेयी ने उनकी एक भी न चलने दी!
जब राम वन मे चले गये, और भरत ननिहाल से वापस आये तो उन्हे पूरे घटनाक्रम को सुनकर बहुत दुःख हुआ, और वो राम को मनाने के लिये सारे मंत्रियों को लेकर वन मे गये। वन मे वशिष्ठ ने राम से कहा कि श्रृष्टि की परम्परा अनुसार ज्येष्ठ-पुत्र ही राजा बनता है, अतः हे राम, आप भी अयोध्या का राज्य ग्रहण करो!
भरत ने भी राम से कहा कि आप वापस लौट चलो, तब जवाब मे राम ने भरत को वह सच बताया, और कहा-
"पुरा भ्रातः पिता नः स मातरं ते समुद्धहन् ।
मातामहे समाश्रौषीद्राज्यशुल्कमनुत्मम् ।।"
(अयोध्याकाण्ड-107/3, चित्र-1)
अर्थात- "हे भरत! पिताजी ने तुम्हारी माता (कैकेयी) से विवाह करते समय ही तुम्हारे नाना को वचन दिया था कि कैकेयी से जन्मा पुत्र ही मेरे बाद राजा बनेगा।"
अब सवाल यह होता है कि जब राम यह सब जानते थे तो फिर वे दशरथ की बात मानकर राजा बनने को तैयार क्यों हुये?
दूसरी बात अगर रघुकुल मे वचन का इतना महत्व था, तो दशरथ ने अपना वचन क्यों तोड़ा?
इन दोनो महापुरुषों (राम और दशरथ) की लाज बचाने के लिये रामकथा के लेखकों ने बेचारी कैकेयी को ही अपराधी बना डाला, जबकि वास्तव मे असली अपराधी तो दशरथ थे!
यहाँ एक बात और ध्यान देने वाली है कि दशरथ के वचनानुसार अयोध्या के राजा केवल भरत बन सकते थे, या फिर भरत स्वतः राज्य त्याग देते, तभी कोई दूसरा राजा बन सकता था।
राम को यह बात भलीभांति मालुम थी, यही वजह है कि जब राम चौदह साल बाद वन से वापस लौटकर अयोध्या आ रहे थे तो उन्होने पहले हनुमान को भरत से मिलने भेजा था। राम ने हनुमान से कहा था कि "हे हनुमते! तुम जाकर भरत से कहना कि मै (राम) वानरराज सुग्रीव तथा अन्य महाबलि मित्रों के साथ वन से वापस आ रहा हूँ। मेरे वापस आने की बात सुनकर भरत की जैसी मुख-मुद्रा हो, उसका अवलोकन करना। भरत के मनोभाव को समझना की मेरे वापस आने से वह खुश है या दुःखी?
इतने दिनों तक समस्त ऐश्वर्य से भरपूर राज्य भोगने से यदि भरत के अन्दर राज्य के लिये जरा भी लालच आया हो तो तुरन्त वापस आकर मुझे बताना, मै फिर राजधानी मे न जाकर कहीं अन्यत्र चला जाऊँगा और तपस्वी जीवन व्यतीत करूँगा।"
(युद्धकाण्ड, सर्ग-125, श्लोक-12-17, चित्र-2)
उपरोक्त उदाहरणों से साफ पता चलता है कि अयोध्या के राज्य पर भरत का ही अधिकार था! कैकेयी ने कुछ भी गलत नही किया था और भरत महान थे जिन्होने स्वयं राज्य त्यागकर राम को राजा बना दिया था।
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