॥ सूर्य और कुंती ॥
कुंती और सूर्य के सम्बन्धो को लेकर बहुत सारे कायास लगाये जाते है.... पर आज मै एकदम प्रमाणिक सच आपको बता रहा हूँ!
महाभारत/वनपर्व के अनुसार कुंती ने अपने बचपन मे किसी ऋषि की सेवा की थी.. और ऋषि ने खुश होकर उसे वर दिया था कि वो जब चाहे पाँच देवताओं को बुला सकती है!
एक दिन कुंती एकांत मे बैठी थी, और उसने कौतुहलवश सूर्य वाला मंत्र पढ़ दिया..... फिर क्या था, अचानक सूर्यदेव आ टपके! कुंती घबरा गयी और बोली कि "हे देव आप जहाँ से आये हो, वही लौट जाओ"
कुंती उस समय नवयुवती थी और बेहद खूबसूरत भी....... कुंती को देखकर सूर्य की लार टपकने लगी! सूर्य बोले कि हम देवता एक बार आने के बाद बिना कुछ दिये वापस नही जाते।
कुंती ने कहा कि मुझे आपसे कुछ नही चाहिऐ......
अब जरा देखो कि सूर्य किस तरह कुंती को सहवास करने के लिऐ फुसला रहे है!
सूर्य बोले "हे देवी मै अखण्ड तेजस्वी हूँ, मै तुम्हे अपने जैसा ही उत्तम पुत्र दूँगा.....बस तुम अपना शरीर मुझे सौंप दो"
कुंती ने कहा कि मै अविवाहित हूँ, मेरे शरीर पर अभी मेरे माता-पिता का अधिकार है, आप अनुचित बात मत करो और वापस चले जाओ!
सूर्य को लगा कि सुन्दरी हाथ से निकल जायेगी... फिर से सूर्य ने आखिरी प्रयास किया!
सूर्य ने कहा- "हे देवी मुझसे जन्मा पुत्र अतिबलशाली और सुन्दर होगा, मेरी माँ अदिति ने मुझे अमोघ कवच और कुंडल दिया है जो मै उस पुत्र को दे दूँगा, तुम लोक-लज्जा की चिन्ता त्यागकर मेरे साथ समागम करो"
आखिरकार कुंती झांसे मे आ ही गयी और बोली कि अगर आप कवच-कुंडल मेरे पुत्र को देने का वचन देते हो तो मै आपके साथ प्रेमपूर्वक सहवास करूँगी!
इस वृत्तांत को पढ़ने के बाद कहीं से भी सूर्य पूज्यनीय या देवतुल्य लग रहे है, जो काम पिपाशा को शान्त करने के लिऐ एक कुवाँरी और नासमझ लड़की को सम्भोग करने के लिऐ बरगला रहे है! इन्होने उसे कुवाँरी माँ बनाकर छोड़ दिया, और बेचारा कर्ण पूरी जिन्दगी इन्ही की वजह से अपमानित होता रहा!
आज भी बहुत सारी औरते सूर्य को जल चढ़ाती है और अर्ध्य देती हैं, अगर ये फिर किसी के ऊपर खुश होकर प्रकट हुऐ तो बिना कुछ दिऐ वापस नही जाते!
हाँ मै सूर्यनमस्कार भी नही करता..............
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