Friday, 26 March 2021

बौद्धधर्मी।

बुद्ध पूर्णिमा के दिन मेरे एक मित्र की पोस्ट पर एक भीमटा बुद्ध का गुणगान किये जा रहा था। मैने भी अपनी आदतानुसार उस भीमटे से बस यह कह दिया कि बुद्ध और अंगुलीमाल वाली कहानी मुझे फर्जी लगती है। भला कोई व्यक्ति अंगुलियों की माला कैसे पहन सकता है?
कुछ ही दिनों मे अंगुलियाँ सड़ने लगेगी, और इंसान अंगुलियों की बदबू तथा बैक्टीरिया से बीमार पड़ जायेगा। अतः मनुष्य की अंगुली काटकर अपने गले मे उसकी माला पहनना सम्भव नही है।

                 फिर क्या था... भीमटा भड़क गया। मुझे अनाप-शनाप और जातिसूचक बातें भी बोलने लगा।
आज मै उन तमाम भीमटों से कहता हूँ जो खुद बड़े तार्किक बनते हैं! वे भी दस दिनों तक अपने गले मे मनुष्य की अंगुली की माला पहनकर दिखायें, फिर अंगुलीमाल वाली कथा मै सच मान सकता हूँ।

          भीमटों की एक आदत है, ये खुद को बहुत तार्किक और ज्ञानी समझते हैं! पर इनका सारा तर्क और ज्ञान हिन्दू और इस्लाम जैसे धर्मों पर ही निकलता है! जैसे ही बौद्धधर्म पर तर्क करो तो इनके तोते उड़ जाते हैं।

जो भीमटे हिन्दुओं से पूँछते हैं कि फल खाने और खीर पीने से बच्चा कैसे पैदा हो सकता है! यदि उन्ही भीमटों से यह पूँछों कि महामाया के गर्भ मे हाथी घुसने से बुद्ध कैसे पैदा हो गये तो इनकी असलियत सामने आ जाती है। कोई भीमटा बतायेगा कि ये हाथी से गर्भ धारण करने वाली प्रकृया कब शुरू हुई?

दूसरी बात, भीमटे ब्राह्मणों का गोरा रंग देखकर चिल्लाते हैं कि ब्राह्मण विदेशी है। फिर तो बुद्ध के बाल देखकर लगता है कि वे भी नाईजीरिया (अफ्रीका) के निवासी होंगे, क्योंकि अफ्रीकी लोगों के ही बाल मे वैसी लट होती है, जैसे बुद्ध की है।
इसका कुछ जवाब है भीमटों के पास।

तीसरी बात, भीमटे "बुद्धम् शरणम् गच्छामि" कहते हैं। जबकि मैने भी बुद्ध को पढ़ा है। उन्होने तो कभी नही कहा कि मेरी शरण मे आओ। उल्टे वे तो कहते थे कि "स्वयं की शरण मे जाओ" (अप्प दीपो भवः) 
जरा भीमटों बताओ कि ये "बुद्धम् शरणम् गच्छामि" क्या है? 
आखिर क्या मिलेगा बुद्ध की शरण मे, जो मनुष्य ऐसे नही प्राप्त कर सकता?
तुम्ही लोग कहते हो कि मन्दिर की घंटी बजाने से ज्ञान नही आता, तो बौद्धविहार मे लोटने से ज्ञान आ जायेगा क्या?

        सच तो यह है कि इन मक्कार भीमटों ने एक वर्ग पर अपनी भड़ास निकालने के लिये बुद्ध का भी इस्तेमाल किया है। इन धूर्तों ने अपने कुकर्मों से बुद्ध को गाली दिलवाते हैं और उनका भी अपमान करवाते है।
इसी भारतदेश मे आज कम से कम तीन राज्य ईसाई बाहुल्य हैं, और मुसलमानों की भी आबादी निरन्तर बढ़ रही है! पर इन मूर्ख भीमटों की वजह से भारत मे बौद्धधर्म फल-फूल नही सका।

          भीमटों को लगता होगा कि अम्बेडकर ने बौद्धधर्म अपनाकर बौद्धधर्म पर उपकार कर दिया होगा! पर सच यह है कि अम्बेडकर के बौद्ध बनने की वजह से बौद्धधर्म का सत्यानाश हो गया। अम्बेडकर के पीछे-पीछे जाहिल भीमटे भी आ गये और इनकी वजह से सभ्य इंसान बौद्धधर्म से दूर भागने लगे! आज भी जब कोई धर्मपरिवर्तन करता है तो उसकी प्राथमिकता ईसाइयत या इस्लाम होती है, पर बौद्ध नही।
इसका मूलकारण ये भीमटे ही हैं। लोग डरते हैं कि यदि हम बौद्ध बनेंगे तो हमे भी भीमटा ही समझा जायेगा! इतने तार्किक और मानवतावादी बुद्ध के विचारों की भीमटो ने हत्या कर दी है, और आज भारत मे बौद्धधर्म चमारों का धर्म बनकर रह गया है।


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आज से करीब दो हजार साल पहले भारत बौद्धमय हुआ करता था! भारत के अधिकांश प्रतापी राजा (जैसे- अशोक, हर्षवर्धन और कनिष्क) जिनका इतिहास हमे पढ़ाया जाता है, वे बौद्धधर्मी हुआ करते थे। फिर आखिर हमारे देश मे ऐसा क्या हुआ कि अचानक ही बौद्धधर्म विलुप्त सा हो गया।

आप अक्सर भीमपंथियों को पढ़ो तो वे ले-देकर इसका कारण ब्राह्मणों को बता देते हैं। बामसेफी इतिहासकार कहते हैं कि जैसे ही पुष्यमित्र शुंग ने मौर्यवंश के अन्तिम राजा वृहद्रथ की हत्या की, तभी से बौद्धधर्म का विनाश होना शुरू हो गया और बाद मे पुष्यमित्र शुंग ने जबरन बौद्धों को हिन्दू बना दिया।

वैसे मै शुंगकालीन इतिहास का अधिक जानकार तो नही हूँ, पर मैने इतना पढ़ा है कि पुष्यमित्र शुंग और उनके बेटे अग्निमित्र शुंग का बौद्धों से निरन्तर संघर्ष होता था।
दरअसल इतिहासकारों का मानना है कि शुंगकाल के दौरान भारत पर लगातार यवनों का आक्रमण होता था, और बौद्ध शुंग के खिलाफ यवनों का साथ देते थे, जिससे चिढ़कर शुंग राजाओं ने बौद्धों को त्रास दिया था।

एक किताब मे मैने यह भी पढ़ा था कि पुष्यमित्र शुंग ने वृहद्रथ की हत्या ही इसीलिये की थी क्योंकि वह यवनों से लड़ने के बजाय बौद्धवादी अहिंसा की बात करता था! यही कारण था कि वृहद्रथ की हत्या करने के बाद वृहद्रथ के सैनिकों ने पुष्यमित्र शुंग का विद्रोह न करके उसका समर्थन ही किया।

एक बात और मै कहना चाहूँगा कि पुष्यमित्र शुंग द्वारा की गयी वृहद्रथ की हत्या का उद्देश्य कोई धर्म-प्रसार नही था, बल्कि राजत्व का सिद्धान्त ही ऐसा होता है कि एक राजा दूसरे को मारकर ही अपने वंश की नीव रखता था। उदाहरण के लिये जैसे औरंगजेब द्वारा की गयी अपने भाइयों की हत्या सबको पता ही है।
दूसरी बात जिस तरह शुंग ने वृहद्रथ की हत्या करके मौर्यवंश को उखाड़कर शुंगवंश की नींव रखी थी, कुछ उसी अंदाज मे शुंगवंश के अन्तिम राजा देवभूति की उनके ही मंत्री वसुदेव ने हत्या करके शुंगवंश की जगह कण्ववंश की नींव रखी थी। शुंगवंश और कण्ववंश, दोनो ही ब्राह्मणों के थे, पर राजसत्ता के लिये एक ब्राह्मण (वसुदेव) ने दूसरे ब्राह्मण (देवभूति) की हत्या कर दी थी।

खैर.. अब मै भीमटों की बात पर आता हूँ। सबको पता है कि पुष्यमित्र शुंग वैदिकधर्मी थे, वे कहते थे कि मै जन्म से ब्राह्मण और कर्म से क्षत्रिय हूँ। शुंगकाल को भारत मे वैदिकधर्म का स्वर्णकाल कहा जाये तो गलत नही होगा, क्योंकि इसी काल मे पुनः वैदिकधर्म का प्रचार-प्रसार हुआ था।
अब सवाल यह है कि भीमटे कहते हैं कि वेद तो सात सौ-आठ सौ साल पुराने हैं, उससे पहले वेद नही थे! फिर आज से 2200 साल पहले पुष्यमित्र शुंग किस वैदिकधर्म के अनुयायी थे?
मतलब यह तो स्पष्ट है कि वेद कम से कम 2200 साल प्राचीन तो हैं ही, जिसकी पुष्टि खुद बामसेफी भी करते हैं।

दूसरी बात भीमटे सबसे बड़ा झूठ यह बोलते हैं कि शुंगकाल के बाद बोद्धधर्म भारत मे खत्म हो गया तो मै बताना चाहूँगा कि शुंगकाल के लगभग 300 साल बाद कनिष्क राजा बने, जो पहले यहूदी थे और बाद मे बौद्ध बन गये।
इनका राज्य तो अफगानिस्तान तक फैला था और इनकी राजधानी पाकिस्तान (पेशावर) मे थी। अगर कनिष्क जैसा चक्रवर्ती राजा बौद्ध था तो जरूर ही उसके काल मे बौद्धधर्म खूब फला-फूला होगा।
यही नही, कनिष्क से लगभग 450 साल बाद हर्षवर्धन राजा बने, जो की पहले हिन्दू थे और बाद मे बौद्ध बन गये।
हर्षवर्धन ने पूरे उत्तर भारत पर एकक्षत्र राज किया, तब क्या भारत मे बौद्ध नही रहे होंगे?
जब स्वयं राजा ही बौद्ध था तो क्या उसने बौद्धों का संरक्षण नही किया होगा, या बौद्धधर्म का प्रसार करने की कोशिश नही की होगी?

असल भी भीमटों को झूठ बोलने की ऐसी आदत है, जो हर समय उन्हे ब्राह्मण-विरोध की खुलजी देती रहती हैं।
भीमटों ने भारत मे बौद्धधर्म के पतन की असली कहानी दबा दी और सारा दोष पुष्यमित्र के बहाने ब्राह्मणों के सिर पर मढ़ दिया।
भारत मे बौद्धधर्म का पतन कैसे हुआ, इसके बारे मे सबसे सटीक और प्रमाणिक बात "राहुल सांकृत्यायन" ने अपनी किताब "बुद्धचर्य्या" मे लिखी है।
राहुल सांकृत्यायन खुद बौद्ध थे, और उन्होने तिब्बत, चीन था श्रीलंका की यात्रा भी की थी।

महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने भारत मे बौद्धधर्म के पतन के दो मुख्य कारण बताये हैं-
1- बौद्धधर्म मे पनपी वज्रयानी शाखा!
2- भारत पर मुसलमानों का आक्रमण!

राहुल सांकृत्यायन ने अपनी किताब "बुद्धचर्य्या" के पृष्ठ-21/22 पर लिखा है कि आठवीं सदी के आते-आते जब भारत मे हर्षवर्धन का युग समाप्त हो चुका था, तब बौद्धधर्म वज्रयानी या भैरवीचक्र मे बदल चुका था। वज्रयानी बौद्ध बुद्ध की सीधी-साधी शिक्षाओं को त्यागकर तंत्र-मंत्र मे विश्वास करने लगे थे और झूठे-मूठे चमत्कार दिखाकर लोगों को भ्रमित करने लगे थे।
वज्रयानी गुप्त साधना करते जिसमे शराब का सेवन और स्त्री-सम्भोग मुख्यरूप से किया था। वज्रयानी बौद्ध कुवाँरी कन्याओं को लाकर तंत्र-मंत्र करते और उनका शीलभंग करते, इस क्रिया को वे "सम्भोग-योग" कहते थे।
इस किताब के पृष्ठ-22 पर सांकृत्यायन ने लिखा है कि वज्रयानियों के जाल मे कई राजा-महाराजा भी फंस गये थे, और वे भी अपनी सुन्दर कन्याओं को इन्हे सौंप देते थे, तथा वज्रयानी इन कन्याओं से खुल्लम-खुल्ला तंत्रसाधना के नाम पर व्यभिचार करते थे।
वज्रयानियों के चक्कर मे पड़कर उस समय के सारे बौद्ध काम-व्यसनी हो गये थे, और राजा भी इतने मूढ़-विश्वासी बन गये थे कि इन दुराचारी वज्रयानियों की सुरक्षा के लिये सैनिकों की पलटने रखने लगे थे।

बौद्धधर्म के विनष्ट का दूसरा कारण बताते हुये इसी किताब मे सांकृत्यायन ने लिखा है कि मुसलमानों ने जब भारत पर आक्रमण किया तो इस्लाम के प्रसार हेतु उन्होने बौद्धों को मारना शुरू कर दिया। सांकृत्यायन ने बख्तियार खिलजी द्वारा नालन्दा विश्वविधालय जलाने का वर्णन करते हुये लिखा है कि खिलजी ने नालन्दा को जलाने के साथ-साथ हजारों बौद्धों की हत्या भी की थी।
इसी किताब के पृष्ठ-26 सर सांकृत्यायन ने लिखा है कि एक सवाल अक्सर सबके दिमाग मे आता है कि मुसलमानो (तुर्कों) ने ब्राह्मणों और बौद्धों दोनो के मन्दिर तोड़े और दोनो को मारा, पर क्या बात है कि ब्राह्मण आज भी भारत मे हैं और बौद्धभिक्षु लुप्त हो गये?
इसके जवाब मे सांकृत्यायन ने लिखा है कि ब्राह्मण गृहस्थ रहकर भी धर्म की अगुवायी करता था! पर भिक्षु भगवा कपड़े पहनकर मठो मे रहते थे, अतः मुसलमानों द्वारा आसानी से पहचान लिये जाते थे, और इन्हे मार डाला जाता था।
दूसरी बात उस दौर के सारे भिक्षु वज्रयानी थे, जो तंत्र -मंत्र से शक्ति दिखाने का प्रयास करते थे, पर तुर्कों की तलवार ने इनकी तांत्रिक-शक्तियों का दिवाला निकाल दिया, जिससे इनके अनुवायियों को विश्वास हो गया कि इनके पास कोई शक्ति नही है, परिणाम-स्वरूप उन्होने भिक्षुओं को धन नही दिया तो तुर्कों द्वारा तोड़े गये बौद्धविहारों का पुनर्निमाण भी न हो सका।

किताब के पृष्ठ-27 पर लिखा है कि जहाँ बौद्धों ने तुर्को द्वारा नष्ट किये गये एक भी बौद्धविहार का निर्माण नही करवा पाया, वही ब्राह्मणों ने इसके विपरीत बनारस के विश्वनाथ मन्दिर का चार बार निर्माण करवाया।
मुसलमानों मे विश्वेश्वरगंज मन्दिर तोड़कर मस्जिद बनवा दी, पर लोग आज भी शिवरात्रि के दिन वहाँ जल चढ़ाने जाते हैं! कुछ ऐसी ही हालत ज्ञानवापी के मन्दिर का भी हुआ, जिसे तोड़कर मस्जिद बना दी गयी, पर ब्राह्मणों की आस्था कम न हुयी। जबकि मुसलमानों द्वारा नालन्दा, उड़न्तपुरी और जेतवन जैसे बौद्धविहारों को तोड़ देने के बाद बौद्धभिक्षु तिब्बत, नेपाल तथा दूसरे देशों मे भाग गये, और भिक्षुओं के आभाव मे बौद्धों का झुकाव इस्लाम तथा ब्राह्मणी-धर्म की तरफ हो गया। जुलाहा, धुनिया जैसी छोटी जातियों ने मुसलमानों के भय या प्रलोभन से इस्लाम कबूल लिया, जिससे दो ही शताब्दी मे बौद्ध या तो ब्राह्मण-धर्मी बन गये या तो मुसलमान!

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