Monday, 29 March 2021

अश्लीलता।

वेदों मे दो देवताओं का वर्णन मिलता है जिन्हे 'अश्विनीकुमार' कहा जाता है!
यह वही अश्विनीकुमार है जिन्होने पाण्डु की दूसरी पत्नि माद्री से 'नियोग' करके "नकुल और सहदेव" को पैदा किया था! ये अश्विनीकुमार पुराणों मे सूर्य के पुत्र माने गये हैं, पर इनके जन्म की कथा भी बड़ी रोचक है!

"ब्रह्मपुराण" हिन्दूधर्म का प्रथम पुराण है, जो सबसे पहले लिखा गया और जिसे सारे पुराणों से अधिक प्रमाणिक माना जा सकता है! इसी ब्रह्मपुराण के "गारुड़तीर्थ और गोवर्धनतीर्थ की महिमा" अध्याय मे एक कथा आती है....
सूर्यदेव की पत्नि का नाम ऊषा था, ऊषा बहुत सुन्दर और पतिव्रता थी तथा सूर्य से उसने दो पुत्र मनु और यम को जन्म दिया था, इसके अलावा उनकी एक पुत्री यमुना भी थी!
ऊषा यूँ तो सूर्यदेव से बहुत प्रेम करती थी, पर कई बार उससे सूर्य का तीव्र ताप सहन नही होता था! वह चाहती थी कि कुछ दिनों के लिये सूर्य से दूर कही शीतल जगह पर विश्राम करने चली जाये, पर उसे यह भी मालुम था कि सूर्य उसके बिना रह नही पायेगे, और व्याकुल होकर खोजने लगेगे!
एक दिन ऊषा ने एक उपाय निकाला, उसने अपने ही जैसी एक दूसरी महिला "छाया" को अपनी माया से बनाया और उसे समझाया कि तुम मेरी जगह सूर्य की प्रेयसी बनकर रहो, तथा मेरी आज्ञा से मेरे पति (सूर्य) की सेवा और मेरे बच्चों का पालन करो, और हाँ... यह भेद किसी से प्रकट मत करना! 
छाया को ऐसा आदेश देकर, उसे अपने ही कक्ष मे छोड़कर ऊषा सूर्य से दूर चली गयी! उसने सोचा कि सूर्य छाया को देखकर उसे ही समझेगे और ढ़ूढ़ेगे नही!

शाम को जब सूर्यदेव भ्रमण से वापस आये तो वो न जाने कैसे छाया को देखकर यह पहचान लिया कि यह मेरी पत्नि ऊषा नही है, अतः वो व्यग्र होकर ऊषा को खोजने लगे!

इधर ऊषा उत्तरकुरू नामक स्थान पर आयी और "घोड़ी" का रूप बनाकर तप करने लगी! सूर्यदेव ऊषा को खोजते हुये उसी स्थान पर पहुँचे, और घोड़ी बनी ऊषा को देखकर पहचान गये तथा खुद भी घोड़ा बनकर उसके पास गये! ऊषा घोड़े को देखकर उसकी नियत भांप गयी, और पर-पुरुष की आशंका से वह भागकर गौतमी नदी के तट पर आ गयी! सूर्यदेव घोड़ा बनकर उसका पीछा करते हुये वहाँ भी पहुँच गये, और तब उन्होने घोड़ीरूपी ऊषा को बताया कि मै तुम्हारा पति सूर्य हूँ!
इसके बाद घोड़ीरूपी ऊषा ने घोड़ारूपी सूर्य से समागम किया तथा उसी के परिणाम-स्वरूप दोनो अश्विनीकुमारों का जन्म हुआ!

अब जरा सोचना कि घोड़ी बनी ऊषा मनुष्य जैसे पुत्रों को जन्म कैसे दे सकती है?
दूसरी बात क्या जानवर-योनि मे देवों को सहवास करने मे अधिक आनन्द आता था, जो वो ऐसा प्रयोग करते थे?
तीसरी बात यदि वो ऐसा करते ही थे तो पौराणिक-लेखकों को क्या जरूरत थी इसे लिखने की?

हाँ.... चौथी बात मेरी तरफ से, पढ़ो और आनन्द लो, क्योंकि इसे पढ़ने के बाद पोर्न-मूवी देखने की भी इच्छा नही होगी!

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#अप्राकृतिक_मैथुन

पुराणों मे कई जगह ऐसा उल्लेख मिलता है कि पुरातनकाल मे ऋषि-मुनि आप्राकृतिक तरीके से अपना वीर्य स्खलन करते थे!

सवाल यह होता है कि क्या पुरातन भारत मे लोग आप्राकृतिक मैथुन करते थे, जैसे हस्तमैथुन या जानवर से मैथुन आदि!

रामायणकाल मे एक ऋषि (विभण्डक) की कथा मिलती है! एक बार विभण्डक ऋषि ने जंगल मे उर्वशी को देखा, और उन्होने कामाशक्त होकर जल मे ही वीर्यपात कर दिया, इनके वीर्य को एक हिरनी ने पी लिया और वह गर्भवती हो गयी!
वीर्य पीने से हिरनी का गर्भवती होना नामुमिकन है, हाँ अगर दूसरे तरीके से हिरनी के गर्भ मे वीर्य ना पहुचाया गया हो!
यह तो प्रक्षेपण कहानी थी, जबकि सच यह होगा कि विभण्डक की कामाग्नि जब बर्दाश्त के बाहर हो गयी तो उन्हे साममे खड़ी हिरनी भी उर्वशी नजर आने लगी होगी!

महाभारत के आदिपर्व मे भी ऐसी ही दो घटनाऐं है....
एक बार भारद्वाज ऋषि स्नान करने जा रहे थे, कि अचानक उन्हे घृताची अप्सरा दिखी... 
अप्सरा को देखते ही ऋषि का वीर्य गिर पड़ा और उसी से द्रोणाचार्य पैदा हुये!
दूसरी घटना विश्वामित्र की है..... जब विश्वामित्र ने मेनका को देखकर अपनी तपस्या भंग की और उसी का परिणाम शकुन्तला का जन्म हुआ!

इन कथाओं के बारें मे आचार्य रजनीश (ओशो) भी कहते थे कि अप्सराओं को क्या जरूरत थी ऋषि-मुनियों के सामने नग्न होकर नाचने की, जबकि ना जाने कितने लोग उनके लिये अपना सर्वत्र लूटाने को तैयार थे!
ओशो का कहना था कि ये अप्सराऐं मानसिक थी, ये उन ऋषियों के मन मे दबी हुई वासनाये थी! 
ऋषियों ने अपनी वासनाओं को इतनी बुरी तरह से दबाया था कि वो दबते-दबते इतनी प्रगाढ़ हो गयी कि खुली आँख अप्सराओं के सपने देखने लगे!
ये कुछ और नही बल्कि उनकी कल्पना (संभ्रम) मात्र था!

यह बात भी सच है कि जिस तरह कई दिनों से प्यासे मनुष्य को चमकीली रेत भी पानी सी प्रतीत होती है, उसी तरह कई वर्षों तक वासनाऐं दबाने से उसका वीभत्स रूप सामने आने लगता है, जिसे आप अप्राकृतिक मैथुन भी कह सकते हो!

हमारे ऋषि-मुनि ईश्वर की तलाश मे जंगलों मे तो चले जाते थे, और उस समय उन्हे यह बड़ा सहज लगता था कि हम अध्यात्म से काम (Sex) को वश मे कर लेंगे, पर ऐसा होता नही था! फिर जब काम उन पर हावी होता था तो उनका हाथ बर्बस उनके शिश्न तक चला जाता था, और उसी को पुराणों मे वीर्य स्खलन लिखा गया है! 
जो कभी घड़े मे... 
कभी दोने मे....
कभी जल मे....
तो कभी-कभी पशुओं (जैसे हिरनी आदि) मे....

खजुराहों मे भी पशुमैथुन की एक मूर्ति है! यह मूर्ति भी मूर्तिकार की कल्पनामात्र नही है, बल्कि उस दौर की विकृति को दर्शाती है!

रही बात उर्वशी और रम्भा की तो उन्हे ऋषियों के पास आने की क्या जरूरत थी! उनकी जैसी सुन्दरियों के साथ समागम करने के लिये बड़े-बड़े राजा-महाराजा अपना सब कुछ हथेली पर लेकर कतार मे खड़े रहते थे, तो फिर भला उर्वशी-रम्भा इन नंगे-फकीर ऋषियों के पास वीरान जंगलों मे क्या करने जाती!

पुराणों मे लिखा है कि इन्द्र ऋषियों की तपस्या भंग करने के लिये उर्वशी,रम्भा और मेनका जैसी अप्सराओं को इनके पास भेजता था!
पर ओशों कहते थे कि न तो इन्द्र किसी को भेजता था और ना ही कोई उर्वशी आती थी! इन्द्र तो खुद ऋषि-मुनियों की पत्नियों के पीछे पड़ा रहता था! वो क्यों अपनी अप्सराओं को इनके पास भेजेगा!

ओशो का यह भी कहना था कि धर्मग्रंथों मे जो चीजें वर्जित की गयी है, वो उस समय मे बहुतायत होती थी, फिर उसे रोकने के लिये धर्मग्रंथों मे उसे पाप बताया गया, ताकि नर्क मे जाने के डर से लोग उसे करना छोड़ दे!

पुरातन भारत मे आप्राकृतिक मैथुन निश्चित ही होता होगा, तभी तो मनु ने मनुस्मृति मे इसे पाप बताया है!

मनुस्मृति -11/173 मे मनु ने लिखा है-
"मानुषीषु पुरुष उदक्यायामयोनिषु।
रेतः सिक्त्वा जले चैव कृच्र्छं सान्तपनं चरेत् ।।"

अर्थात- जो मनुष्य अमानुषीय (मनुष्य से भिन्न योनि मे, जैसे जानवर आदि) रजस्वला स्त्री से, अथवा योनि से भिन्न स्थान मे (जैसे गुदामैथुन) और जल मे वीर्यपात करता है, वह कृच्र्छसान्तपन करने से शुद्ध होता है।

यह श्लोक उस दौर की सच्चाई से अवगत करा रहा है!

कुल मिलाकर सच यही है कि किसी भी ऋषि-मुनि के पास जंगल मे अप्सराऐं नही आती थी, बल्कि उनके अन्दर वर्षों से दबी वासनाऐं ही उनके सामने अप्सरा बनकर नग्न नृत्य करती थी! अब चूकिः ये ऋषि जंगल मे तप करने जाते थे तो वहाँ कोई स्त्री नही मिलती थी, फिर ये आप्राकृतिक तरीके से अपनी हवस को शांत करते थे!

नोट- इस लेख के कुछ अंश ओशो के प्रवचन का हिस्सा है!


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आज आधुनिक समय मे विज्ञान ने भले ही इतनी तरक्की कर ली है, फिर भी मानव के अण्डकोष (Testis) का प्रत्यार्पण शायद ही कभी हुआ हो!

अण्डकोष जन्म के समय से ही पुरुष शरीर का महत्वपूर्ण अंग होता है!
यह पुरुषत्व का प्रमाण होता है, और शरीर मे उत्तेजना हेतु द्रव का निर्माण करता है! यह चमड़े की एक सिकुड़ी थैली जैसी होती है, जिसमे दो स्क्रोटम होते है!

यह स्क्रोटम दो भागो मे बटा होता है, जो लिंग (Penis) के अगल-बगल नीचे की और होता है!
पुरुष का बायाँ अण्डकोष दायें से थोड़ा अधिक लटका रहता है, और ये स्क्रोटम ठंड मे सिकुड़ जाते हैं, जबकि उत्तेजना के समय ऊपर की और आ जाते है!

जब मनुष्य प्रजनन करता है तो उसके दो अंग बहुत महत्वपूर्ण होते है!
पहला अण्डकोष, और दूसरा लिंग!

अण्डकोष का काम होता है कि वह पहले पुरुष को उत्तेजित करने के लिये हारमोन्स तैयार करता है, और बाद मे शुक्राणु (Sperm) बनाता है!
लिंग इन्ही शुक्राणुओं को स्त्री के योनिमार्ग से गर्भाशय तक पहुँचा देता है, और स्त्री गर्भवती हो जाती है!

अब आप सोच रहे होंगे कि मै ये सब क्यों बता रहा हूँ, तो इससे ही जुड़ा मेरे पास एक धार्मिक प्रश्न है!

रामायण के अनुसार जब देवराज इन्द्र ने गौतम ऋषि का वेष बनाकर उनकी पत्नि अहिल्या से दुष्कर्म किया, तब ऋषि गौतम ने उन्हे श्राप दिया था कि- "हे इन्द्र! मै तुम्हे श्राप देता हूँ कि तुम्हारा अण्डकोष कटकर भूमि पर गिर जाऐं"

ऋषि के श्राप से इन्द्र अण्डकोष विहीन हो गये, देवताओं के लिये यह बड़ी शर्म की बात थी कि उनके राजा के पास अण्डकोष ही नही था!
सारे देवताओं ने एक उपाय खोजा और देवराज को एक भेड़े (Sheep) का अण्डकोष लगा दिया!

यह वैदिककाल की पहली सफल अण्डकोष सर्जरी थी, जिसमे एक मनुष्य को एक जानवर का अण्डकोष प्रत्यार्पण किया गया!

अब सवाल यह है कि इन्द्र और उनकी पत्नि शचि की दो संतान थी, पुत्र जयन्त और पुत्री जयन्ती!
अब अगर इन्द्र ने भेड़ वाले अण्डकोष से प्रजनन किया तो उनकी संतान भेड़ जैसी पैदा होनी चाहिये थी, क्योकि भेड़ का अण्डकोष भेड़ के ही DNA वाले शुक्राणु (Sperm) पैदा करेगा!

दूसरा सवाल देवता इतने शक्तिशाली थे कि संसार मे कोई भी कार्य उनके लिये असम्भव नही था, फिर देवराज को क्या जरूरत थी कि वो भेड़े का अण्डकोष इस्तेमाल करें...

मेरा आशय देवी-देवताओं का मजाक बनाना नही है, मै केवल यह बताना चाहता हूँ कि धर्मग्रंथों मे लिखी बातें 80% झूठी है, इस पर विश्वास करने का कोई ठोस प्रमाण नही है!

यह सारा वृतान्त बाल्मीकि रामायण/बालकाण्ड, सर्ग-49 पृष्ठ सं०-123 पर लिखा गया है!

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एक बार विष्णु जी ने किसी बात पर नाराज होकर लक्ष्मीजी को घोड़ी बनने का श्राप दे दिया..... फिर क्या था पलक झपकते ही लक्ष्मी घोड़ी बन गयी!
विष्णु ने निवारण के लिये कहा कि जब तुम एक पुत्र को जन्म दोगी तो फिर से अपने वास्तविक स्वरूप मे आ जाओगी!

लक्ष्मी जी घोड़ी बनकर सुपर्णाक्ष नामक स्थान पर आ गयी, और सोचने लगी कि मै जब तक पुत्र को जन्म नही दूँगी तब तक श्रापमुक्ति नही मिलेगी, पर पुत्र होगा कैसे?

यही विचार करके उन्होनेे शिवजी को ध्यान लगाया.....

भगवान शिव समझ गये कि जब तक पुत्र नही होगा ये बेचारी घोड़ी ही बनी रहेगी.......
पर पुत्र होगा कैसे?

ये यहाँ है, और विष्णु वैकुण्ठ मे.....  लक्ष्मी किसी दूसरे घोड़े के साथ मुँह काला करना नही चाहती थी....

यही सोचकर शिव ने विष्णु को फटकार लगायी, शिव की बात मानकर विष्णु शीघ्र घोड़ा बनकर लक्ष्मी के पास पहुँचे और फिर दोनो के संसर्ग से लक्ष्मी ने एक पुत्र को जन्म दिया!
इस पुत्र का नाम "एकवीर" रखा और यही आगे चलकर क्षत्रियों के हैहयवंश जन्मदाता बना।

अब सवाल यह है कि क्या यह कहानी सच है? अगर सच है तो विष्णु कैसे भगवान है जो खुद की पत्नि और समृद्धि की देवी लक्ष्मी को घोड़ी बना देते है!
क्या खुद को गौरवशाली समझने वाले हैहयवंशी क्षत्रिय घोड़ी से पैदा हुऐ?
क्या हिन्दुओं के सर्वमान्य परमेश्वर विष्णु इतने निर्लज्ज थे कि घोड़ा/घोड़ी बनकर पुत्र पैदा करते थे?

ये कथा कई प्रश्न पैदा कर रही है, जिस पर आप भी विचार कर सकते हो! वैसे पुराणों मे लिखी हर कथा को महंत और कथावाचक लोग नाच-गाकर बताते हैं, पर इस कथा को पंडे-पुरोहित दबाकर ही रखते हैं! मै चाहता हूँ कि इस कथा के माध्यम से आप सब धर्माधिकारियों से सवाल करो कि विष्णु कैसे भगवान थे जो खुद की पत्नि को घोड़ी बनाते थे और दूसरे (जलंधर) की पत्नि (वृन्दा "तुलसी" ) से छल करते थे!

श्रोत:- देवीपुराण/छठा स्कन्ध (अध्याय-18, पृष्ठ संख्या- 442)


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गीत गोबिंद जयदेव।

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