Sunday, 28 March 2021

मांस।

पुराणों मे कई जगह ऐसा लिखा है कि पौराणिक-काल मे ऋषि-मुनि इतने सामर्थ्यवान होते थे कि अपने तपोबल से कोई भी असाध्य-कार्य क्षणमात्र मे कर डालते थे।
पुराण कहते हैं कि प्राचीन ऋषियों ने संकल्पमात्र से ऐसे-ऐसे कार्य कर दिये जो सम्भव ही नही थे। जैसे कि माण्डव ऋषि का सशरीर यमलोक जाना और अगस्त्य ऋषि पूरा समुद्र पी जाना, इत्यादि!

             वैसे इन कथाओं को सुनने के बाद साधारण-बुद्धि से भी यही लगता है कि ये बातें झूठी हैं। अब मै आपको मनुस्मृति से कुछ ऐसे श्लोक दे रहा हूँ जो यह प्रमाणित कर देंगी कि ऋषि-मुनि कोई भी चमत्कार करने मे समर्थ नही थे।

                मनुस्मृति काफी प्राचीन ग्रंथ है इसमे कोई शक नही है। मनुस्मृति मे कहीं भी शिव और विष्णु तक का उल्लेख नही है। मतलब यह ग्रंथ इतना तो प्राचीन है ही कि शिव और विष्णु वाली कथाऐं इस ग्रंथ के बाद हिन्दू समाज आयी। इसी मनुस्मृति के दसवें अध्याय मे मनु ने यह बताने का प्रयास किया है कि मांस खाना विषम परिस्थिति मे पापाचार नही है। 

          मनु ने लिखा है कि यदि आप भूख से व्याकुल हो, और आपके पास खाने की कोई दूसरी सामाग्री नही है तो आप मांस खा सकते हो, इससे तनिक भी पाप नही लगेगा! अपनी इसी बात को प्रमाणित करने के लिये मनु ने कुछ उदाहरण भी दिये हैं, जिसमे उन्होने बताया है कि प्राचीनकाल मे किस तरह बड़े-बड़े ऋषि भी भूख से व्याकुल होने के बाद कुत्ते तक का मांस खाने के लिये विवश हो गये थे, लेकिन फिर भी उन्हे पाप नही लगा।

इसी कड़ी मे मनु ने मनुस्मृति-10/105-108 (चित्र देखें) मे लिखा है कि पूर्वकाल मे ऋषि विश्वामित्र और वामदेव ने भूख से अपने प्राणों की रक्षा करने के लिये कुत्ते के भांस का भक्षण किया, फिर भी वे पापरहित बने रहे।

            अब मेरा सवाल यह है कि यदि ऋषि-मुनि अपने तपोबल से कुछ भी करने मे समर्थ थे तो क्या इसी तपोबल से वे अपने लिये स्वादिष्ट भोजन या फल की व्यवस्था नही कर पाये? तब उनका तपोबल कहाँ चला गया था जब वे प्राणरक्षा हेतु कुत्ते जैसे जीव का मांसाहार करने को विवश हुये?

वामदेव के चमत्कारों को तो सभी जानते हैं, ये दशरथ के पूज्य भी थे। विश्वामित्र के बारे मे जितना कहा जाये कम ही होगा, इन्होने तो अपने पतोबल से राजा त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया था। ऐसे महातपस्वी भी अपने लिये न तो भोजन एकत्र कर पाये और न ही अपने तप से अपनी भूख को नियंत्रित कर पाये।

बात स्पष्ट है, ये तपोबल वाली सारी कहाँनिया भोले-भाले लोगों को बेवकूफ बनाने के लिये गढ़ी गयी हैं, अन्यथा वेद-वेदान्त के ज्ञाता और इतने बड़े तपस्वी ऋषियों ने कुत्ते का मांस खाना क्यों स्वीकार किया?

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