मनु भी 1/100 मे लिखते हैं कि ब्राह्मण सबसे श्रेष्ठ है, अतः सारी पृथ्वी उसी की है!
मनुस्मृति-9/2 मे लिखते हैं- "अस्वतन्त्रः स्त्रियः कार्याः पुरुषैः स्वैर्दिवानिशम्।"
अर्थात- पुरुष द्वारा अपने स्त्रियों को कभी स्वतंत्रता नही देनी चाहिये।
मनु कहते हैं-
"एकोऽलुब्धस्तु साक्षी स्याद् बह्वच्य शुच्योऽपि न स्त्रियः।
स्त्रीबुद्धेरस्थिरत्वात्तु दोषैश्चान्येऽपि ये वृताः"
मनुस्मृति-8/77
अर्थात- एक निर्लोभी पुरुष भी साक्षी हो सकता है, परन्तु अनेक स्त्रियां पवित्र होने पर भी साक्षी नही हो सकती, क्योंकि स्त्रियों की बुद्धि चंचल होती है! और अन्य मनुष्य भी जो दोषों से घिरें हैं, साक्षी होने के योग्य नही होते।
मनुस्मृति-9/33 मे लिखा है-
"क्षेत्रभूता स्मृता नारी बीजभूतः स्मृत पुमान।
क्षेत्रबीजसमायोगात् सम्भवः सर्वदेहिनाम् ।।"
अर्थात- स्त्री को खेत (क्षेत्र) और पुरुष को बीज (अनाज) रूप माना गया है, खेत और बीज के मिलन से जीवों की उत्पत्ति होती है।
बल्कि मनु ने 9/41 मे कहा है कि पराये खेत मे पुरुष को अपना बीज नही बोना चाहिये, और 9/49 मे कहते हैं-
"येऽक्षेत्रिणो बीजवन्तः परक्षेत्रप्रवापिणः।
ते वै सस्यस्य जातस्य न लभन्ते फलं क्वचित् ।।"
अर्थात- जिसके पास खेत (स्त्री) नही है, वह दूसरे के खेत मे बीज बोता है तो उसमे उत्पन्न धान्य (बालक) को वह पाने का अधिकारी नही है।
अगर स्त्री व्यभिचार कर ले तो मनु ने उसकी शुद्धि का मंत्र भी बताया है!
मनु ने 9/20 मे लिखा है-
अगर कोई स्त्री की पर-पुरुष से व्यभिचार कर लेती है तो उसकी शुद्धि के लिये मनु ने एक मंत्र भी बताया है, जो निम्न है-
"यन्मे माता प्रलुलुभे विचरन्त्यपतिव्रता।
तन्मे रेतः पिता वृक्तामित्यस्यैतन्निदर्शनम् ।।"
इस मंत्र का अर्थ है - 'मेरी माता ने अपवित्रता पूर्वक घूमते हुये पराये घर मे जाकर पर पुरुष की इच्छा की, अतः उसके दूषित रज को मेरे पिता शुद्ध करें'
मनु का यह भी दावा है कि यह वेदमंत्र है।
मनु का मानना था कि विधवा का पुनः विवाह नही होना चाहिये! मनु ने बाकयदा 9/65 मे इसे लिखा भी है-
"नोद्वाहिकेषु मन्त्रेषु नियोगः कीर्त्यते क्वचित् ।
न विवाहविधावुक्तं विधवावेदनं पुनः।।"
अर्थात- विवाह के वेदमंत्रों मे नियोग का कही उल्लेख नही है, और न ही विवाह विषयक शास्त्रों मे विधवा विवाह का उल्लेख है।
मनु ने भी 4/81 मे लिखा है-
"यो ह्यस्य धर्ममाचष्टे यश्चैवादिशति व्रतम् ।
सोऽसंवृतं नाम तमः सह तेनैव मज्जति।।"
अर्थात- दूसरे धर्म का उपदेश और व्रत का जो पालन करता है, वह उस शूद्र सहित असंवृत नामक अंधकारमय नरक मे जा गिरता है!
अब कुछ लोग सोचेगें कि क्या मनु के समय मे दूसरा धर्म भी था, तो मै बता दूँ कि उस काल मे दस्युधर्म था, जो रक्ष संस्कृति को मानते थे और मनुस्मृति मे इसका व्याख्यान भी है!
मनु ने तो 5/89 मे यह भी कहा है कि जिन्होने अपना धर्म त्याग दिया हो, उन्हे जलाञ्जलि भी नही देनी चाहिये।
मनु ने भी एक से अधिक विवाह को उचित माना है!
मनु के अनुसार पहली पत्नि की इच्छा के विपरीत भी पुरुष को दूसरा विवाह करना चाहिये, और अगर पत्नि विरोध करे तो उसे त्याग देना चाहिये!
मनु का यह श्लोक देखें...
"अधिविन्ना तु या नारी निर्गच्छेद्रुषिता गृहात् ।
सा सद्यः संनिरोध्दव्या त्याज्या वा कुलसन्निधौ।।"
मनुस्मृति-9/83
अर्थात- दूसरा व्याह करने पर यदि पहली स्त्री रुष्ठ होकर घर से भागे तो उसे पकड़कर घर मे बन्द कर देना चाहिये, या उसे उसके मायके पहुँचा देना चाहिये।
यही नही मनु तो बालविवाह को भी जायज मानते थे! मनु ने 9/88 मे लिखा है-
"उत्कृष्ठायाभिरूपाय वराय सदृशाय च।
अप्राप्तामपि तां तस्मै कन्यां दद्याद्यथाविधिः।।
अर्थात- उत्तम कुल और सुन्दर वर मिल जाये तो कन्या के विवाह योग्य न होने पर भी ऐसे वर से उसका विवाह विधिवत कर देना चाहिये।
मनु 7/96 मे कहते हैं कि जो सैनिक दासी को युद्ध मे जीतकर लाता है, उस पर उसी का अधिकार है!
आगे मनु 7/194 मे लिखते हैं कि शत्रु के अन्दर खौफ पैदा करने के लिये उसके अन्न, जलायश जला दो और राज्य मे घेरा डालो, यह ठीक उसी तरह है जिस तरह अल्लाह आदेश देते हैं कि मूर्तिपूजकों की घात मे बैठो, और काफिरों के अन्दर धाक पैदा कर दो!
और भी बहुत सारी समानताऐं हैं मनुस्मृति तथा कुरान मे, जिसे लिखने पर पोस्ट बहुत बड़ा हो जायेगा।
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#विरोधाभासी_मनु
मनुस्मृति कितनी पुरानी पुस्तक है यह तो मै शायद नही बता सकता, पर इतना जरूर कह सकता हूँ कि यह ग्रंथ रामायण और महाभारत से प्राचीन है!
मनुस्मृति मे कहीं भी राम और कृष्ण का कोई उल्लेख नही है, परन्तु रामायण के किष्किंधाकाण्ड मे राम ने स्वयं मनुस्मृति की प्रशंसा की है, तो महाभारत के शान्तिपर्व और अनुशासन पर्व मे भीष्म पितामह ने इस ग्रंथ का गुणगान किया है!
मनुस्मृति निश्चित ही किसी काल मे सनातन धर्म की सबसे मान्य पुस्तक थी, लेकिन इस किताब मे मनु ने कई श्लोक ऐसे लिखे हैं, जो उन्ही के अन्य श्लोकों का ठीक उलट है!
आइऐ, कुछ ऐसे ही श्लोकों पर नजर डालते हैं-
मनुस्मृति-3/56 मे मनु ने नारियों के सम्मान मे यह बड़ी बात कही है-
"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।।"
अर्थात- जहाँ नारियों की पूजा होती है, वहाँ देवताओं का वास होता है, और जहाँ नारियाँ कष्ट पाती है, वहाँ समृद्धि नही होती!
यहाँ तो मनु ने बड़ी उत्तम बात लिखी, पर नौवां अध्याय शुरू होते ही मनु कहते हैं कि नारियों को स्वतंत्रता मत दो, नारियां कामुक होती है!
यही नही मनु ने अध्याय-8/371 मे लिखा है-
"भर्तारं लङ्घयेद्या स्त्री ज्ञाति गुणदर्पिता।
तां श्वाभिः खादयेद्राजा संस्थाने बहुसंस्थिते।।"
अर्थात- अपनी सुन्दरता और बाप-दादा के धन पर यदि स्त्री घमण्ड करे तो उसे सबके सामने कुत्ते से नोचवा डालें।
जरा सोचो कि पहले नारियों को पूजने की बात करने वाले मनु अब कुत्ते से नोचवाने की सलाह दे रहे है!
मनु का दूसरा विरोधाभास यह है कि उन्होने अध्याय-9/104 मे कहा है कि-
"ऊर्ध्वं पितुश्च मातुश्च समेत्य भ्रातरः समम् ।
भजेरन्पैतृकं रिक्थमनीशास्ते हि जीवतोः।।"
अर्थात- माता-पिता की मृत्यु के बाद सभी भाई धन-सम्पत्ति को बराबर-बराबर बांट लें, माता-पिता के जीते जी उन्हे धन बांटने का कोई अधिकार नही।
इस श्लोक मे मनु पैतृक सम्पत्ति मे सभी भाइयों को बराबर को अधिकार बता रहे हैं, पर इसका ठीक अगला ही श्लोक उन्होने गांजे के नशे मे लिखा और मनु अध्याय-9/105 मे लिखते हैं-
"ज्येष्ठ एव तु गृह्णीयान्पित्र्यं धनमशेषतः।
शेषास्तमुपजीवेयुर्यथैव पितरं तथा।।"
अर्थात- भाइयों मे जो सबसे श्रेष्ठ हो, वो पिता की सम्पूर्ण धन-सम्पत्ति को ग्रहण करे, शेष भाई उसे पितातुल्य मानकर उसके अधीन रहें!
अब ये पागलपन देखो.... पहले तो उन्होने सम्पत्ति मे सभी भाइयों का बराबर अधिकार बताया, पर अगले ही श्लोक मे कहा कि सारी सम्पत्ति बड़े भाई की है!
आगे मनु ने मनुस्मृति-8/123-124 मे लिखा है कि राजा केवल क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र को दण्ड दे, क्योंकि स्वायम्भायु मनु ने जो दण्ड विधान बताया है, वह केवल इन्ही तीन वर्णों के लिये है, ब्राह्मण के लिये नही।
लेकिन कुछ आगे बढ़ते ही मनु की अक्ल फिर ठिकाने आयी और इसी आठवें अध्याय के श्लोक-337/338 मे मनु लिखते हैं कि यदि शूद्र चोरी करे तो उससे आठ गुना, वैश्य करे तो सोलह गुना, क्षत्रिय करे तो बत्तीस गुना और ब्राह्मण करे तो उसे चौंसठ गुना या एक सौ अट्ठाइस गुना दण्ड दें!
मनु केवल इतने ही विरोधाभासी नही थे! मनु के अनुसार मांस नही खाना चाहिये, अतः मांस खाने से रोकने के लिये मनु ने लोगों को डराया है और मनुस्मृति-5/55 मे लिखा है-
"मांस भक्षयिताऽमुत्र यस्य मांसमिहाद्म्यहम् ।
एतन्मांसस्य मांसत्व प्रवदन्ति मनीषिणः।।"
अर्थात- जो मनुष्य इस लोक मे जिसका मांस खाता है, परलोक मे वह उसका भी मांस खाता है, यही मांस का मांसत्व है।
लेकिन इसी अध्याय मे उन्होने मांस खाना अनिवार्य भी कहा है!
इसी अध्याय के श्लोक-5/35 मे मनु कहते हैं-
"नियुक्तस्तु यथान्यायं यो मांसं नात्ति मानवः।
स प्रेत्य पशुतां याति संभावनेकविंशशतिम् ।।"
अर्थात- जो विधि नियुक्त होने पर भी मांस नही खाता, वह मरने के बाद इक्कीस जन्म तक पशु होता है!
सोचों! कि मनु कैसे आदमी थे, पहले कह रहे हैं कि मांस नही खाओगे तो पशुयोनि मे जाओगे, और बाद बता रहे हैं कि तुम जिसका मांस खाओगे, वो तुम्हारा भी मांस खायेगा!
मनु ने इतनी ही नही, और भी कई विरोधाभासी बातें कही हैं, जैसे-
मनु ने मनुस्मृति-10/65 मे लिखा है-
"शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम।"
अर्थात- अपने कर्मो से ब्राह्मण शूद्र और शूद्र ब्राह्मणत्व को प्राप्त होता है!
पर इसी अध्याय के श्लोक 10/73 मे मनु लिखते हैं कि ब्राह्मण और शूद्र कभी समान नही हो सकते, अर्थात यहाँ उन्होने वर्ण-परिवर्तन को नकार दिया है।
मनु के ऐसा लिखने के पीछे केवल दो ही कारण हो सकते है-
पहला तो यह कि वो बहुत घटिया किस्म गांजा पीते थे!
दूसरा कि वो बड़े भुलक्कड़ थे, पीछे क्या लिखा है, उसे भूलकर आगे ठीक उसका विपरीत लिख देते थे!
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जब मै धार्मिक पाखण्डों पर लेख लिखता हूँ तो कई धार्मिक मुझसे कहते हैं कि- "तुम नास्तिक हो, और अगर ईश्वर को नही मानते तो यह बताओ कि दुनिया मे पहले मुर्गी आयी, या पहले अण्डा आया"
वैसे तो विज्ञान इस मूर्खतापूर्ण सवाल का जवाब दे चुका है, पर मै धार्मिकों को धार्मिकस्तर का ही जवाब देता हूँ!
मनुस्मृति मे लिखा है कि ब्रह्मा का जन्म एक अण्डे से हुआ!
वर्षों तक ब्रह्माजी अण्डे मे रहे, फिर अण्डे को फोड़कर बाहर आये...
यह सब वैसा ही है, जैसे आज मुर्गी का चूजा अण्डे को निकलता है!
मनुस्मृति का यह श्लोक देखो-
"यत्तत्कारणमव्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम् ।
तद्विसृष्टः स पुरुषो लोके ब्रह्मेति कथ्यते।।
तस्मिन्नण्डे स भगवानुषित्वा परिवत्सरम् ।
स्वयमेवाऽऽत्मनो ध्यानात्तदण्डमकरोद् द्विधा।।"
(मनुस्मृति-1/11-13)
अर्थात- सम्पूर्ण सृष्टि के कारण, अव्यक्त, नित्य, सत्-असत् स्वरूप से जो पुरुष उत्पन्न हुआ, उसे संसार 'ब्रह्मा' कहता है! अपने से वर्षो पर्यन्त उस अण्डे मे रहकर, ब्रह्मा ने स्वयं अपने ही ध्यान से उस अण्डे का दो खण्ड कर दिया।
अब जरा धार्मिक लोग मुझे यह बताऐं कि ब्रह्मा जिस अण्डे से पैदा हुये, उस अण्डे को किसने दिया?
शिव अथवा विष्णु ने...
क्योंकि लगभग तमाम पुराण यही कहते हैं कि ब्रह्मा से पहले सृष्टि मे केवल शिव और विष्णु ही थे! इसका जवाब जो धार्मिक महापुरुष देगा, वही मुझसे "पहले मुर्गी या पहले अण्डे" सवाल पूँछे।
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पुराणों मे ऐसे कई प्रकरण मिल जायेंगे जब किसी राजा या अन्य को संतान न होने पर ऋषियों से यज्ञ-हवन करवाने या आशिर्वाद प्राप्त करने से संतानोत्पत्ति हो जाती थी।
रामायण काल मे देखा जाये तो राम और उनके चारों भाइयों का जन्म भी ऐसी ही पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाने से हुआ था।
महाभारत काल मे तो कर्ण, पाँचों पाण्डव, पाण्डु, धृतराष्ट्र और विदुर समेत कई महापुरुष देवताओं या ऋषियों के आशिर्वाद से ही पैदा हुये हैं।
अब हम संतानोत्पत्ति के दूसरे पहलु पर आते हैं। प्राचीनकाल मे सनातनियों मे नियोग प्रथा आम बात थी। पूर्वकाल मे जब किसी महिला को अपने पति से संतान नही पैदा होता था तो वह किसी ऋषि या देवता से नियोग करके संतान पैदा करती थी। आगे चलकर इसी प्रथा को मनु ने धार्मिक नियम बना दिया था। मनु ने मनुस्मृति-9/59 (चित्र-1) मे लिखा है-
"देवराद्वा सपिण्डाद्वा स्त्रिया सम्यङ् नियुक्तया।
प्रजेप्सिताधिगन्तव्या सन्तानस्य परिक्षये।।"
अर्थात- अपने पति और गुरूजनों की आज्ञा से संतान न होने पर स्त्री देवर या सपिण्ड से अभीष्ट (नियोग करके) संतान पैदा करे!
अब यह सोचकर ही घृणा होती है कि पूर्वकाल मे संतान के लिये बड़े-बड़े राजा भी अपनी पत्नियों को किसी दूसरे पुरुष को सौंप देते थे।
वास्तव मे नियोग प्रथा एक घृणित व्यवस्था थी.. नियोग प्रथा का वर्णन मनुस्मृति मे ही मिलता है, पर मनु भी इसे "पशु-धर्म" ही मानते थे।
मनु ने मनुस्मृति-9/65-66 (चित्र-2/3) मे लिखा है-
"विवाह के वेदोक्त मंत्रों मे नियोग और विधवा विवाह का कही वर्णन नही है। यह पशुधर्म है और विद्वान ब्राह्मणों ने इसकी निन्दा की है। मानव समाज मे बेन राजा के समय मे यह पशु-धर्म प्रचलित हुआ।"
मतलब साफ है कि मनु भी इसे पशुवत्-कृत्य ही मानते थे, और उन्होने यह भी साफ कर दिया कि इसे मैने नही बनाया, बल्कि यह प्रथा तो मुझसे पहले (बेन राजा के समय) से चली आ रही है।
खैर.. अब मै मुख्य-विषय पर आता हूँ। यहाँ सवाल यह उठता है कि जब पूर्वकाल मे ब्राह्मण इतने तपस्वी होते थे कि यज्ञ करने से या आर्शिवाद देने से पुत्र पैदा करने मे सक्षम थे तो मनु ने नियोग जैसी बकवास प्रथा को क्यों आगे बढ़ाया?
मनु के मनुस्मृति मे लिखना चाहिये था कि- "जब किसी स्त्री को संतान न हो तो वह ऋषियों से पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाये अथवा मंत्रोच्चारित फल या खीर खाकर पुत्र पैदा करे। लेकिन इसके बदले मे मनु से किसी पर-पुरुष से सम्भोग करने की सलाह क्यों दी?
बात साफ है कि युग कोई भी रहा हो, बिना स्त्री-पुरुष के समागम से संतान कभी भी पैदा नही होती थी। यह बात मनु भी जानते थे, इसलिये उन्होने न चाहते हुये भी इस निन्दनीय-कृत्य को करने की विधि बनायी, ताकि आगे वंशवृद्धि हो सके। मनु जानते थे कि यदि कोई महिला अपने पति से गर्भवती न होने पर किसी अन्य पुरुष से गर्भधारण करेगी तो समाज उसे कलंकित मानेगा। इसीलिये उन्होने नियोग को धार्मिक प्रावधान बना दिया, ताकि न तो समाज महिला की निन्दा कर सके, और महिला भी आत्मग्लानि से बची रहे।
वास्तव मे सच्चाई यही है कि पुराणों और रामायण/महाभारत मे जितने भी महापुरुष मंत्रोच्चारित फल अथवा खीर पीने से, या देवताओं अथवा ऋषियों (ब्राह्मणों) के आशिर्वाद से पैदा हुये हैं, वे सब नियोग द्वारा ही जन्मे हैं। लेकिन ग्रंथों को लिखने वालों ने इस बात को छुपा दिया है। यदि पूर्वकाल मे सचमुच ऐसे चमत्कृत ढ़ंग से संतान पैदा करने की कोई भी विधि होती तो मनु कभी भी "नियोग-प्रथा" को धार्मिक प्रावधान न बनाते।
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