तुलसीदास की रचना कवितावली मुझे उनकी सारी रचनाओं से जरा अलग लगी! इसमे तुलसीदास ने अपने जीवन के उन दिनों का वर्णन किया है जब वह अत्यन्त गरीब थे, और भूखे पेट भी रहना पड़ता था! उन्होने यह भी बताया है कि किस तरह से काशी के ब्राह्मण उन्हे मारना चाहते थे!
इतनी सारी विपदाओं को लिखने के बावजूद भी तुलसीदास ने इसमे भी अपनी आदतानुसार जाति-पात और ऊँच-नीच घुसा दिया है!
तुलसीदास ने कवितावली के उत्तरकाण्ड मे राम की प्रशंसा करते हुये लिखा है-
"सज्जन-सींव बिभीषनु भो, अजहूँ बिलसै बर बंधबधू सो"
अर्थात- हे राम! आपकी कृपा से जो विभीषण अपने बड़े भाई (रावण) की पत्नि (मंदोदरी) का उपभोग करते हैं, वो भी आपकी कृपा से साधुता पा गये!
यह एक और विवादपूर्ण बात है कि तुलसीदास कह रहे हैं कि भले ही विभीषण अपनी भाभी से विवाह किये पर आपने उन्हे भी संत बना दिया!
सवाल यह है की जो राम बालि को केवल इसलिये मार डाले कि उसने सुग्रीव की पत्नि को कैद करके रखा था, वो भला विभीषण को कैसे क्षमा करते यदि उसने अपनी भाभी का उपभोग किया!
आगे तुलसी दास ने लिखते हैं-
"रिषिनारि उधारि कियो सठ केवटु मीत पुनीत सुकीर्ती लही"
अर्थात- हे राम! आपने उस दुष्ट केवट को मित्र बनाकर पवित्र कर दिया!
जरा सोचो, उस केवट ने दुष्टता का कौन सा कार्य किया था, उसने तो स्नेह से राम के चरण ही धोये थे! वैसे वाल्मीकि रामायण मे ये चरण धोने वाला प्रकरण है ही नही, पर अगर तुलसीदास की ही बात सच मान लें कि केवट ने चरण धोये तो वह दुष्ट कैसे हुआ!
तुलसीदास ने इसी तरह मानस के लंकाकाण्ड मे लिखा है-
"सब भाँति अधम निषाद सो हरि भरत ज्यों उर लाइयो"
अर्थात- हर प्रकार से उस नीच निषाद को राम ने भरत जैसे गले लगा लिया!
अब बताओ, वह निषाद राम का मित्र था! फिर उसने ऐसा कौन सा कुकर्म कर दिया था कि तुलसीदास ने उसे नीच बना दिया, और अगर वह नीच था तो फिर राम ने उससे मित्रता क्यों की?
तुलसीदास ने समाज मे जाति-पात का वह जहर घोला है जिसका असर आज भी कायम है!
तुलसीदास पूरे मानस और कवितावली मे ब्राह्मणों के अलावा और किसी को मनुष्य मानने को तैयार ही नही थे!
वैसे तुलसीदास जातिवाद बहुत मानते थे, पर जब वो बुरे दौर मे थे, तब किसी भी जाति के घर मांगकर खा लेते थे!
इसी कवितावली मे तुलसी ने लिखा है-
"मातु-पिताँ जग जाइ तज्यो बिधिहूँ न लिखी कुछ भाल भलाई।
नीच निरादरभाजन कादर कूकर-टूकन लागि ललाई।।"
अर्थात- माता-पिता ने मुझे पैदा करके त्याग दिया, और ब्रह्मा ने भी भाग्य मे कुछ अच्छा नही लिखा था! तब मै निरादर होकर कुत्ते के मुँह मे टुकड़े को देखकर ललचाता था!
आगे तुलसीदास लिखते हैं-
"जातिके, सुजातिके, कुजाति के पेटागि बस।
खाए टूक सबके बिदित बात दूनीं सो।।"
अर्थात- मैने पेट की आगि (भूख) के कारण अपनी जाति, सुजाति और कुजाति सभी के टुकड़े मांगकर खाये है, और यह बात सभी को पता है।
अब जरा मानस अयोध्याकाण्ड-193 की चौपाई देखो-
"लोक बेद सब भाँतिहिं नीचा। जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा।।"
अर्थात- तुलसीदास यहाँ कह रहे हैं कि केवट लोकरीति और वेदरीति से सब भाँति नीच है, और जिसे उसकी परछाई छू ले उसे स्नान करना चाहिये!
सवाल तो यह भी होता है कि अगर परछाई छूने पर स्नान करना है तो फिर तुलसीदास ने बचपन मे कुजातियों के घर भोजन किया था, तो वो कैसे पवित्र हुये?
दूसरी बात तुलसीदास ने अपनी मुर्खतावश वेदों पर भी आक्षेप लगा दिया है, वेदों ने किसी को भी नीच बताया ही नही है!
वेद कहते हैं "कृण्वन्तो विश्वमार्यम् " अर्थात- पूरे संसार को श्रेष्ठ बनाओ!
फिर तुलसीदास ने कौन से वेद पढ़े थे जो निषादों (केवट) को नीच बताता है!
तुलसीदास ने वेदों का आक्षेप लगाना यही नही रोका, आगे अयोध्याकाण्ड-195 मे उन्होने लिखा है-
"कपटी कायर कुमति कुजाती। लोक बेद बाहेर सब भाँती।।"
अर्थात- केवट कपटी, डरपोक, मूर्ख और कुजाति होते हैं, तथा सभी प्रकार मे लोकरीति और वेदरीति से बाहर हैं!
अब सोचना यह है कि तुलसीदास ने यहाँ केवटों को कुजाति कहा हैं, और कवितावली मे कुजाति का भोजन करने की बात की है!
साथ ही साथ केवटों को लोकरीति से वेदव्राह्य बता रहे हैं!
मै जानना चाहता हूँ कि किस वेद ने निषादों का परित्याग किया है!
केवटों के विरुद्ध तुलसीदास इतना जहर उगलकर गये हैं, पर अज्ञानता-वश केवट भी रामचरित मानस का पाठ करवाते हैं!
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आप लोगों ने रामानन्द सागर की धारावाहिक "रामायण" मे देखा होगा कि जब रामजी सीता स्वयंवर मे शिव-धनुष तोड़ते हैं तो बड़े क्रोध से वहाँ परशुराम आ जाते हैं और राम को मारने के लिये उतावले हो जाते है!
इसके बाद लक्ष्मण के साथ उनकी गर्मा-गर्म बहस भी होती है...
आपने कभी सोचा कि इतनी शीघ्र परशुराम को पता कैसे चला कि शिवधनुष टूट गया है, और वो महेन्द्र पर्वत से फौरन ही कैसे आ धमके?
वास्तव मे यह पूरी गप्प कहानी तुलसीदास के खुरापाती दिमाग की उपज है, जिसका वास्तविकता से दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नही!
वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड सर्ग-67 मे राम के द्वारा शिवधनुष भंग का प्रकरण है, जबकि सर्ग-74 मे परशुराम और राम की भेंट हुई!
तुलसीदास ने जान-बूझकर कहानी को रोमांचक बनाने के लिये परशुराम को जनक के दरबार तक पहुँचा दिया!
जबकि वास्तव मे राम सीता से विवाह करने के बाद जब अयोध्या लौट रहे थे, तब उनकी मुलाकात परशुराम से मार्ग मे हुई, जहाँ परशुराम ने केवल उन्हे अपने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने के लिये कहा, और यहाँ लक्ष्मण बिल्कुल चुप ही रहे थे!
अर्थात परशुराम और लक्ष्मण मे कभी भी तू-तू, मै-मै नही हुई!
तुलसीदास ने ऐसे ही कई झूठ रामचरित मानस मे लिखे है, जिसमे सबसे बड़ा झूठ है हनुमान द्धारा सुषेन वैध को घर सहित लंका से उठा लाना है!
मानस मे तुलसीदास ने लिखा है-
"जामवंत कह बैद सुषेना, लंकाँ रहइ को पठई लेना।
धरि लघु रूप गयउ हनुमंता, आनेउ भवन समेत तुरंता।।"
अर्थात-जामवंत के कहने पर हनुमान सूक्ष्मरूप बनाकर लंका मे गये और सुषेन वैध को घर सहित उठाकर लाये!
तुलसीदास हनुमान को हीरो बनाने के चक्कर मे इतने पागल हो गये थे कि कुतर्क पर कुतर्क कर रहे थे!
सोचो कि अगर सुषेन वैध को लाना ही था तो उसे ही उठाकर लाते, उसका घर भी साथ लाने के क्या जरूरत थी?
वास्तव मे तुलसीदास हनुमान की शक्ति का महिमा-मण्डन करना चाहते थे, जबकि वाल्मीकि रामायण मे सुषेन वैध नाम का कोई पात्र ही नही है!
वाल्मीकि रामायण युद्धकाण्ड सर्ग-74 मे साफ लिखा है कि जाम्बवान नामक ऋक्ष के आदेश पर हनुमान संजीवनी लाने गये थे, न कि किसी सुषेन वैध के, और यह जाम्बवान ऋक्ष राम की ही सेना मे थे!
मतलब सुषेन वैध का पूरा का पूरा प्रकरण ही झूठ है, हाँ पुराणों मे सुषेन नाम के एक वैध का वर्णन है, पर वह लंका मे नही बल्कि वानरों के वैध थे और वानरराज बालि के ससुर भी थे!
यही नही अगर आप रामायण का सूक्ष्मता से अध्ययन करो तो यह भी पता चलता है कि हनुमान उड़कर नही बल्कि तैरकर समुद्र पार करके लंका गये थे!
वाल्मीकि रामायण सुन्दरकाण्ड सर्ग-1 श्लोक-67-69 मे लिखा है कि हनुमान समुद्र के जल मे ऐसे चल रहे थे जैसे कोई नौका तैरती हो, उनका आधा शरीर पानी मे था और आधा पानी के ऊपर!
इससे साफ है कि हनुमान तैर रहे थे, न कि उड़ रहे थे, उड़ते हुए मनुष्य का आधा शरीर पानी मे कैसे रहेगा!
आगे लिखा है हनुमान जिस तरफ जाते थे उनके अंगो से समुद्र मे तरंगे उठने लगती थी, और वो अपनी छाती से तरंगमालाओं को चूर-चूर कर रहे थे!
अब अगर कोई आसमान मे उड़ेगा तो उससे पानी मे तरंगे नही उठेगी, और उसकी छाती जल की तरंगो को नही छुएगी...
बात बिल्कुल साफ है कि हनुमान तैर ही रहे थे, और तो और तुलसीदास ने भी हनुमान चालीसा मे लिखा है-
"प्रभु मुद्रिका मेलिं मुँख माहि।
जलधि लांघि गये अचरज नाहि।।"
अब अगर हनुमान आकाश मे उड़ रहे थे तो उन्हे राम की मुद्रिका मुँह मे रखने की क्या जरूरत थी! हाँ तैरते समय कही हाथ से छिटक न जाये इसलिये मुँह मे रखने की बात प्रासंगिक हो सकती है!
हम लोग अक्सर रामायण पढ़ते नही है, और रामचरित मानस का इतना प्रचार-प्रसार है कि सारी झूठी बातें ही हिन्दू सच मानकर तार्किकों से लड़ते रहते हैं!
हनुमान का उड़कर समुद्र पार करना, सुषेन को घर समेत उठाकर लाना, लक्ष्मण तथा परशुराम को लड़ाना, हनुमान का बूटी लेने जाते समय रास्ते मे कालनेमि का मिलना और भरत का बाण मारकर हनुमान को पहाड़ समेत पृथ्वी पर गिरा देना, ये सारे कृत्य तुलसीदास की कल्पना मात्र है!
आपने जो रामानन्द सागर की टेलीवीजन पर "रामायण" देखी थी, वह भी वास्तव मे 'रामचरित मानस' ही थी!
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तुलसीदास ने रामचरित मानस मे रामजी की सेना का वर्णन करते हुये लिखा है-
"अस मैं सुना श्रवन दसकंधर।
पदुम अठारह जूथप बंदर॥"
अर्थात-तुलसीदास लिख रहे हैं कि राम की सेना मे 18 पद्म केवल बन्दरों के सेनापति थे! अब जरा आप लोग अनुमान लगाओ कि जहाँ 18 पद्म केवल सेनापति थे, तो सेना कितनी बड़ी होगी?
खैर..तुलसीदास को फेंकने की आदत थी। पर मुझे पहले ऐसा लगता था कि फेंकने की कला मे तुलसीदास ने ही महारथ हासिल की थी, पर आश्चर्य होता है कि स्वयं वाल्मीकि भी इसमे कम नही थे।
कुछ लोग कहते हैं कि वाल्मीकि रामायण मे न तो कुछ अवैज्ञानिक है, न ही पाखण्ड है और न ही उसमे तुलसीदास के जैसे फेकमफांक वाली बातें लिखी हैं। पर यह भ्रम ही है... वास्तव मे कई जगह तो वाल्मीकि ने तुलसीदास से भी अधिक फेंका है।
ऐसा ही कुछ वाल्मीकि रामायण, किष्किंधाकाण्ड, सर्ग-39 मे लिखा है। यहाँ वाल्मीकि ने राम के सेना की संख्या बताते हुये जो लिखा है, मै वही नीचे लिख रहा हूँ। आप लोग खुद गिनती कर लेना...
वाल्मीकि लिखते हैं कि-
... शतबलि नामक वानर ने दस अरब की सेना सुग्रीव को दी!
... तारा के पिता सुषेण ने सौ करोड़ की सेना दी!
... सुग्रीव के ससुर ने दस अरब सेना दी!
... केसरी ने कई हजार वानरों की सेना दी!
... गवाक्ष ने दस अरब वानरों की सेना दी!
... धूम्र ने बीस अरब भालूओं की सेना दी!
... पनस ने तीन करोड़ वानरों की सेना दी!
... नील ने दस करोड़ वानरों की सेना दी!
... गवय ने पाँच करोड़ वानरों की सेना दी!
... दरीमुख ने दस अरब वानरों की सेना दी!
... मैन्द और द्विविद ने बीस अरब वानरों की सेना दी!
... गज ने तीन करोड़ वानरों की सेना दी!
... जामवन्त ने दस करोड़ भालुओं की सेना दी!
... रुमण ने एक अरब वानरों की सेना दी!
... गन्धमादन ने एक पद्म वानरों की सेना दी!
... अंगद ने दस शंख और एक पद्म वानरों की सेना दी!
... तार ने पाँच करोड़ वानरों की सेना दी!
... इन्द्रजानु ने ग्यारह करोड़ वानरों की सेना दी!
... रम्भ ने ग्यारह हजार एक सौ वानरों की सेना दी!
... दुर्मुख ने दो करोड़ वानरों की सेना दी!
... हनुमान जी ने दस अरब वानरों की सेना दी!
... नल ने एक अरब से अधिक वानरों की सेना दी!
... दधिमुख ने दस करोड़ वानरों की सेना दी!
... इसके अतिरिक्त शरभ, कुमुद, वह्नि तथा रंह नामक वानरों ने भी विशाल सेना सुग्रीव को दिया!
अब जरा सारी सेना की गिनती कर लो! कसम से, दुनिया के सबसे बड़े गणितज्ञ का भी दिमाग उलझ जायेगा।
आखिर इतनी सेना लंका मे कहाँ ठहरी भाई?
आखिर इतना झूठ लिखने से क्या हासिल क्या वाल्मीकि ने?
क्या इसे पढ़ने के बाद यह नही लगता कि रामायण एक काल्पनिक ग्रंथ है, जिसमे झूठ की सारी सीमाऐं तोड़ दी गयी है!
क्या अब भी कोई कह सकता है कि वाल्मीकि पाखण्ड और झूठ नही लिखते थे?
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इस्लाम की मान्यता है की जब कोई इंसान मरता है तो अगर उसने अल्लाह के बनाये नियम अर्थात कुरान पर ईमान लाया है और मोहम्मद साहब को अपना नबी माना है तो वह जन्नत मे जायेगा। यदि उसने ऐसा नही किया है तो उसे जहन्नुम की आग नसीब होगी...
पर ये सब इतनी शीघ्र नही होगा, अर्थात इंसान मरने के बाद कब्र मे कयामत होने तक पड़ा रहेगा, और कयामत के बाद ही अल्लाह यह निर्णय करेंगे कि कौन जन्नत जायेगा और कौन जहन्नुम?
मुसलमानों को हजारों सालों तक कब्र मे पड़े रहने से बचने का एक उपाय है, जिसे तुलसीदास ने कवितावली के उत्तरकाण्ड पद संख्या-76 मे लिखा है!
तुलसीदास ने लिखा है-
"आँधरो अधम जड़ जाजरो जराँ जवनु,
सूकरके सावक ढ़कँ ढकेल्यो मगमे।
गिरो हिएँ हहरि हराम हो हराम हन्यो,
हाय! हाय करत परीगो कालफगमे।।
तुलसी बिसोक ह्नै त्रिलोकपतिलोक गयो,
नामकें प्रताप बात बिदित है जगमे।"
अर्थात- एक सुअर के बच्चे ने किसी अंधे, पापी और बुढ़ापे से जर्जर मुसलमान को रास्ते मे धक्का देकर गिरा दिया! वह जोर से गिर गया और भयभीत होकर "ह'राम ने मार डाला, ह'राम ने मार डाला" ऐसा चीखने लगा! इस प्रकार वह चिल्लाते हुये मर गया और अन्तिम समय मे भूल वश राम (ह'राम) कहने से वह समस्त पापों के बन्धन से छूटकर त्रिलोकीनाथ के धाम (वैकुण्ठ) चला गया।
अब मुसलमानों को निर्णय लेना है कि अल्लाह-अल्लाह करके सदियों तक कब्र मे पड़े रहना है, या अन्तिम समय से राम-राम करके सीधा वैकुण्ठ-धाम जाना है!
वैसे मेरा तो वैकुण्ठ का टिकट पक्का है, क्योंकि मै तो हमेशा राम-राम ही करता हूँ, हाँ भले ही श्रद्धा से नाम नही लेता, पर घृणा से नाम लेने पर भी वही प्रभाव होता है!
तुसलीदास ने लिखा है-
"तुलसी मेरे राम को रीझि भजो या खीझ।
भौम पड़ा जामे सभी उल्टा-सीधा बीज।।"
अर्थात- जैसे जमीन के अन्दर पड़ा बीज चाहे उल्टा हो या सीधा, फिर भी जाम जाता है, वैसे ही मेरे राम का नाम चाहे श्रद्धा से लो या घृणा से, पर फल भरपूर मिलता है।
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सांप को कान नही होते हैं यह बात किताबों मे सभी ने पढ़ी होगी, पर किसी को यह नही मालुम कि सांप को कान क्यों नही होते?
मैने भी सामान्य ज्ञान मे पढ़ा था कि सांप को कान नही होते है, और वह अपनी जीभ से इसकी भरपाई करता है! सांप की जीभ कैची के आकार की होती है, जिसे वह बाहर निकालकर हवा मे लहराता रहता है! यह सांप के लिये सेन्सर जैसा कार्य करती है...
लेकिन यह बात बड़ी प्रकृति-विरुद्ध थी कि किसी को कान ही न हो! पर अब जाकर उसका जवाब मिला जिसे विज्ञान अभी तक नही खोज पाया है!
पिछली सदी के महान वैज्ञानिक गोस्वामी तुलसीदास ने अपनी किताब "कवितावली" के बालकाण्ड-11 मे लिखा हैं-
"डिगति उर्वि, अति गुर्वि, सर्व पब्बै समुद्र-सर।
ब्याल बधिर तेहि काल, बिकल दिग्पाल चराचर।।"
अर्थात- सीता स्वयंवर मे जब श्री राम ने शिवधनुष तोड़ा, उस समय उसकी प्रचण्ड टंकार ब्रह्माण्ड के पार चली गयी और आघात से सारे पर्वत, समुद्र तथा तालाब सहित पृथ्वी डगमगाने लगी! उसी टण्कार के फल-स्वरूप सांप भी बहरे हो गये, अर्थात उनका कान उड़ गया।
देखा आपने बाबा तुसलीदास के ज्ञान-विज्ञान को, वास्तव मे त्रेतायुग से पहले सांप को कान होते थे, पर त्रेतायुग की उस घटना के बाद सांप कर्णहीन हो गये।
#तुलसीदास_और_नारी
तुलसीदास ने रामचरित मानस मे मे एक बड़ी ही चर्चित चौपाई लिखी है-
"ढोल गँवार सूद्र पसु नारी।
सकल ताड़ना के अधिकारी।।"
इस चौपाई मे वो नारियों को प्रताड़ना की अधिकारी बता रहें हैं! इस चौपाई की वजह से कई नारीवादी तुलसीदास का बड़ा विरोध करते हैं, और कहते हैं कि तुलसीदास नारी विरोधी थे!
अब सवाल यह है कि अगर तुलसीदास की नजर मे नारियाँ 'ताड़ना' की अधिकारी है, तो सीता के बारे मे उनके क्या विचार थे?
क्योंकि सीता भी तो नारी ही थी, जिसे वो "माता" मानते थे!
पर तुलसीदास ने पूरे मानस मे सीता के बारें मे कही भी कोई अपशब्द नही लिखा!
वास्तव मे तुलसीदास नारी विरोधी नही थे, इसका प्रमाण भी रामचरित मानस मे ही है...
इसी मानस मे नारियों के बारे मे एक और चौपाई है-
"कत विधि सृजी नारी जग माहीं।
पराधीन सपनेहु सुख नाही।।"
यह चौपाई तब की हैं, जब शिवजी के साथ पार्वती की शादी हुई और विदाई के समय उनकी माँ मैनावती रो रही थी! तब तुलसीदास को भी बड़ा कष्ट हुआ, और उन्होने कहा कि "भगवान ने नारियों को कैसे बनाया, बेचारी दूसरे के अधीन होती है, और पराधीन को सपने मे भी सुख नही मिलता"
अब इसी मानस की एक दूसरी चौपाई भी देखिये-
"अधम ते अधम अधम अति नारी।
तिन्ह महँ मैं मतिमन्द अघारी।।"
यह चौपाई बाबा तुलसी ने शबरी के लिये अरण्यकाण्ड मे कही है, इसमे तुलसीदास कह रहे हैं- "जो नीचों मे नीच होते है, नारियाँ उनसे भी नीच होती है"
अब यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि बाबा तुलसी पार्वती को लिये आंसू बहा रहे हैं, और शबरी के लिये 'नीच' शब्द कह रहे हैं!
आखिर इसकी वजह क्या है?
हैं तो दोनो ही नारी!
असल मे पार्वती आर्य (सवर्ण) थी, और शबरी दलित (अवर्ण) थी!
तुलसीदास का नारी विरोध भी सेलेक्टिव था, वो केवल अनार्य नारियों का अपमान करते थे, सवर्ण नारियों पर उन्होने एक भी कटाक्ष नही लिखा! सीता का सम्मान बचाने के लिये तो वो झूठ भी लिखते थे!
इसका एक बड़ा उदाहरण मै आपको देता हूँ!
रामचरित मानस अरण्यकाण्ड मे तुलसीदास ने सीता और कौआ बने इन्द्रपुत्र जयन्त की कथा लिखी हैं!
तुलसीदास ने लिखा है-
"सीता चरण चोच हति भागा।
मूढ़ मंदमति कारन कागा।।"
अर्थात- अपनी मंदबुद्धि के कारण कौऐ ने सीता के चरणों मे चोंच मार दी!
तुलसीदास यहाँ 'चरण' मे चोंच मारने की बात करते हैं, जबकि सच कुछ और ही है!
यही प्रसंग बाल्मीकि ने सुन्दरकाण्ड सर्ग-38 मे लिखा है!
यहाँ बाल्मीकि साफ लिखते हैं कि जयन्त ने कौआ बनकर सीता की छाती (स्तन) पर चोंच मारी थी!
सीता खुद हनुमान को यह कथा बताती हैं, और कहती है- 'हे हनुमान! कौआरूपी जयन्त ने मेरे स्तनों पर इतने चोंच मारे कि मेरे स्तन घायल हो गये, और उसमे से खून की धारा बहने लगी'
अब जरा देखिये कि सीता के सम्मान को बचाये रखने के लिये तुलसीदास सच को किस चालाकी से हजम कर गये, और 'स्तन' की जगह 'चरण' लिख दिया!
वास्तव मे तुलसीदास घोर जातिवादी थे, और वो जाति देखकर ही नारी का अपमान करते थे! सीता एक सवर्ण महिला थी, तुलसी बाबा उनका सम्मान करते थे! अतः उन्हे झूठ बोलना स्वीकार था, पर सीता के शान मे कोई गुस्ताखी नही होनी चाहिये!
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गोस्वामी तुलसीदास रामचरित मानस (सुन्दरकाण्ड) मे लिखते है कि-
"अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर॥"
अर्थात- बाबा तुलसी कह रहे हैं कि रामजी की वानरी सेना मे 18 "पद्म" केवल सेनापति है!
अब यह जान लेना आवश्यक है कि एक "पद्म" किस संख्या को कहते है.....
सौ "करोड़" का एक "अरब" होता है,और सौ "अरब" का एक "खरब" , ऐसे ही सौ "खरब" का एक "नील" , और सौ "नील" की संख्या को एक "पद्म" कहते हैं!
अब अगर राम की सेना मे 18 "पद्म" सेनापति थे तो सेना कितनी बड़ी हुई! अगर एक सेनापति के पास सौ बन्दर भी थे, तो भी 180 "पद्म" बन्दरों की सेना हो जाती है!
बाबा तुलसी ने फेंकने के सारे रिकार्ड तोड़ दिये हैं, वास्तव मे तुलसीदास सस्ते दाम वाला "भंगेड़ा" पीते थे, और जब नशा होता था तो ऐसी ही अनर्गल बातें लिखते थे!
इतनी बड़ी संख्या की गिनती करने मे एक इंसान का पूरा जीवन निकल जायेगा, पर तुलसीदास ने ना जाने कैसे गणना कर ली थी!
दुःख की बात तो यह है कि आज भी पंडे-पुरोहित इसे सच मानते हैं, जबकि तुलसीदास ने यह भी लिखा है कि हर एक वानर सुग्रीव जैसा बलवान था, और अपने जैसे लाखों को कुछ भी नही समझता था, इतना बलवान की तीनों लोकों को "घास के टुकड़े" जैसा समझता था!
निम्न चौपाई देखो कि बाबा तुलसी कैसे फेंक रहें हैं......
"ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना॥
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रेलोकहि गनहीं॥"
अब आप खुद ही सोचो कि तुलसीदास कितने बड़े झूठे थे!
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अकबर और बीरबल की कहानियाँ तो सभी ने सुनी होगी, पर कम ही लोग जानते हैं कि अकबर पूर्वजन्म का कौन था?
जिस तरह पुराणों मे राम और कृष्ण का बखान किया गया है और उनके पूर्वजन्म के बारे मे लिखा गया है, उसी तरह अकबर की भी प्रशंसा की गयी है तथा उसके पूर्वजन्म के बारे मे भी लिखा है।
संक्षिप्स भविष्यपुराण (गीताप्रेस, गोरखपुर) के प्रतिसर्गपर्व के चतुर्थखण्ड (पृष्ठ-373-374, चित्र-1-3) की एक कथा मे लिखा है कि अकबर पूर्वजन्म का ब्राह्मण था और वो भी शंकराचार्य के गोत्र का, पर एक भूल के कारण वह इस जन्म मे म्लेच्छ (मुसलमान) बनकर पैदा हुआ! पर पूर्वजन्म का ब्राह्मण होने की वजह से उनके कर्म महान ही रहे...
कथानुसार, प्रयाग (इलाहाबाद) मे एक मुकुन्द नामक ब्राह्मण अपने बीस शिष्यों के साथ तप करता था, पर जब उसे पता चला कि म्लेच्छ बाबर ने भारत मे आकर देवी-देवताओं की मूर्तियाँ नष्ट कर दी, तो उसने दुःखी होकर अपने सभी शिष्यों के साथ आत्मदाह कर लिया, और यही मुकुन्द ब्राह्मण अगले जन्म मे अकबर बनकर पैदा हुआ।
एक तपस्वी ब्राह्मण म्लेच्छ-योनि मे कैसे पैदा हुआ, इसके पीछे भी एक कथा है?
एक बार जब मुकुन्द ब्राह्मण गाय का दूध पी रहा था तो उसने अज्ञानता-वश दूध के साथ गाय का रोम (बाल) भी पी लिया था, इसी दोष के कारण वह अगले जन्म मे म्लेच्छ बनकर पैदा हुआ। और इसी मुकुन्द ब्राह्मण के बीस चेले अगले जन्म मे बीरबल और तानसेन वगैरह बनकर उसकी सहायता के लिये जन्मे थे।
अब इस कथा मे यह भी बताया गया है कि मुकुन्द ब्राह्मण का नाम इस जन्म मे अकबर क्यों पड़ा?
असल मे जब अकबर का जन्म हुआ तो हुमायूँ को एक भविष्यवाणी हुई कि "तुम्हारा पुत्र बड़ा प्रतापी और भाग्यशाली होगा, यह अक् (अकस्मात) वर (वरदान) की प्राप्ति के साथ पैदा हुआ है, इसीलिये इसका नाम 'अकबर' होगा।
खैर, यह तो सम्पूर्ण कथा थी, पर अब इस पौराणिक कथा के पीछे छुपे ब्राह्मणी पाखण्ड और झूठ को समझते हैं!
------ पहली बात तो अकबर के नामकरण की जो बात इस पुराण मे लिखी है, तो शायद डपोरशंख पंडों को पता नही होगा कि अकबर का असली नाम "जलालुद्दीन" था! अकबर तो अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है "महान"
बादशाह अकबर उदार-हृदय का था, और इसीलिये उसे अकबर कहा जाता था।
------ दूसरी बात इसमे लिखा है कि हुमायूँ को आकाशवाणी हुई थी, तो विचार करो कि यह कितनी झूठी बात है?
अबुल फजल ने भी "अकबरनामा" लिखी है, जो अकबर की ही जीवनी है, पर इसमे आकाशवाणी जैसा तो कोई उल्लेख नही है। इससे पता चलता है कि पौराणिक ब्राह्मण झूठ की झड़ी थे! आप इसी से समझ लो कि इसी तरह से ही इन्होने कंस को कृष्ण के पैदा होने की भी आकाशवाणी करवाई होगी, जैसे यहाँ अकबर के जन्म पर करवा दी।
------ तीसरी बात, कहते हैं कि गाय के रोम-रोम मे देवताओं का वास होता है, फिर भूलवश गाय का एक रोम पी जाना कैसे दोष हो गया?
ऐसे तो फिर बहुत सारे लोग म्लेच्छ बनकर पैदा होने वाले हैं, और फिर यदि गाय का रोम भक्षण करने से अगले जन्म मे गाय-भक्षण करने वाला बनकर पैदा होना है तो गाय पालने का क्या फायदा?
------ चौथी बात, जब मुकुन्द ब्राह्मण ने बाबर के उपद्रव की वजह से आत्मदाह किया था तो अगले जन्म मे उसी बाबर के कुल मे पैदा होना जरा अजीब लग रहा है! और यदि गाय के रोम-भक्षण की वजह से मुकुन्द ब्राह्मण मुस्लिम बना तो उसके चेले किस अपराध की वजह से अगले जन्म मे अब्दुल रहीम खान-ए-खाना, फैजी, मुल्ला दो-प्याजा और अबुल फजल आदि बनकर पैदा हुये?
वास्तव मे पुराणों मे लिखी राम, कृष्ण, शिव, दुर्गा और विष्णु की भी कहानियाँ मुकुन्द ब्राह्मण की कहानी की तरह कोरी गप्प है। और इन देवी-देवताओं के चमत्कार की जो बातें लिखी हैं, वह भी पूर्णतः कल्पना मात्र है।
ब्राह्मणों ने बड़ी चतुराई से ऐसी ही गप्प कहानियाँ गढ़कर भोले-भाले लोगों को बेवकूफ बनाया और उनका शारीरिक, मानसिक और आर्थिक शोषण किया।
वैसे यह मुकुन्द ब्राह्मण की कथा बाद मे अकबर-विरोधियों के लिये काफी परेशानी खड़ी करेगी। भारत मे एक वर्ग ऐसा भी है जो अकबर को महान नही मानता तथा उसे क्रूर और कामी बताकर उसका विरोध करता है, लेकिन इस पुराण मे अकबर की प्रशंसा की गयी है। अब अकबर के समर्थक इस कथा का अचूक-अस्त्र जैसा प्रयोग कर सकते हैं, क्योंकि मूर्खतावश ब्राह्मणों ने अकबर को ऐतिहासिक के साथ-साथ पौराणिक-पात्र भी बना दिया है।
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