बामसेफी भीमटों द्वारा कुछ दुष्प्रचार हमेशा किया जाता है, जैसे कि-
... शूद्रों को पहले राजा बनने का अधिकार नही था!
... शूद्रों को पहले पढ़ने का अधिकार नही था!
... शूद्र पहले सम्पत्ति नही रख सकता था!
... शूद्र (अनार्य) और ब्राह्मण (आर्य) पहले शत्रु थे!
... शूद्रों का काम पहले केवल तीनों वर्णों की सेवा करना था!
इसके आगे भीमटे यह बताते हैं कि शूद्रों का पहले जो शोषण हो रहा था, उसे हमारे "बाबा ब्लू" ने आकर समाप्त कर दिया।
मै भीमटों के इस झूठ का कई बार पर्दाफाश कर चुका हूँ, वह भी पूर्ण-प्रमाण के साथ। आज भी मै इनके सबसे बड़े झूठ कि अम्बेडकर से पहले शूद्र राजा नही बनते थे, उस पर अपनी राय रखूँगा।
पहली बात तो ये जिस मनुस्मृति का सबसे अधिक सहारा लेते है, उसमे भी मुझे कहीं ऐसा लिखा नही मिला कि शूद्र राजा नही होगा। हाँ.. मनु ने अध्याय-4/61 मे यह जरूर लिखा है कि जिस राज्य का राजा शूद्र हो, वहाँ ब्राह्मण को निवास नही करना चाहिये। इससे भी यह तो पता चल ही जाता है कि पूर्वकाल मे शूद्र राजा होते थे, इसीलिये मनु ब्राह्मणों को शूद्रों के राज्य से चले जाने की सलाह दे रहे हैं।
दूसरी बात अम्बेडकर से पहले भारत मे शूद्र ही नही अतिशूद्र भी राजा हुये है। बिजली पासी और लाखन पासी क्या राजा नही थे? लाखन पासी के नाम पर तो लखनऊ शहर भी है, फिर इन्हे कैसे भुलाया जा सकता है? इसके अलावा राजा सुहेलदेव भी थे, और उनके ही आगे-पीछे कई जाट राजा भी थे, जो वर्तमान समय मे तथाकथित शूद्र ही है।
वैसे खुद डा० अम्बेडकर भी मानते थे कि शूद्रों को पहले वह तमाम अधिकार थे, जो ब्राह्मणो और क्षत्रियों को मिले थे। अम्बेडकर ने अपनी किताब "Who were shudra" मे पंडों से यही सवाल पूँछा था कि आपने किस आधार पर शूद्रों को निचले पायदान पर धकेला, जबकि वह वैदिककाल मे पहले तीनों वर्णों जैसे सम्मानित और सम्पन्न थे।
डा० अम्बेडकर ने पंडों से जो सवाल किया है, उसमे उन्होने तर्क और प्रमाण भी दिये हैं, पर शायद अम्बेडकर यह नही जानते थे कि आगे चलकर उनके नाम का प्रयोग करने वाले उनके ही चेले-चपाटे भी वही सब करेंगे, जो पंडों ने किया। इसलिये जो सवाल अम्बेडकर ने पंडों से किया था, वही मै आज भीमटों से कर रहा हूँ! दम है तो भीमटे जवाब दें, क्योंकि सवाल मेरे नही, उनके अपने ही आदर्श अम्बेडकर के हैं-
1- जब शूद्रों को अनार्य और आर्यों का शत्रु कहा जाता है और यह भी कहा जाता है कि आर्यों ने शूद्रों पर विजय प्राप्त करके उन्हे गुलाम बना लिया था! तो फिर ऐसा क्यों हैं कि यजुर्वेद और अथर्ववेद के ऋषियों ने शूद्रों के गौरव की कामना की है?
2- कहा जाता है कि शूद्रों को वेद पढ़ने का अधिकार नही था तो फिर ऐसा क्यों हुआ कि सुदास नामक शूद्र ने ऋग्वेद के मंत्रों की रचना की?
3- जब शूद्रों को यज्ञ करने का अधिकार नही था तो सुदास ने अश्वमेध-यज्ञ कैसे किया, और शतपथ ब्राह्मण मे शूद्रों को याजक क्यों माना गया?
4- जब शूद्रों को सम्पत्ति रखने का अधिकार नही था, तो मैत्रायणी और काठक संहिता मे शूद्रों को धनी और सम्पन्न कैसे बताया गया?
5- जब शूद्रों का कर्तव्य तीन उच्च-वर्णों की सेवा ही करना था, तो सुदास और पैजवन नामक शूद्र महाभारत काल मे राजा कैसे हुये?
इन पाँच सवालों के अतिरिक्त अम्बेडकर ने और भी तार्किक सवाल किये हैं, जैसे कि "यदि ब्राह्मण शूद्रों को उपनयन संस्कार करवाते, उन्हे वेद पढ़ाते और उनके घर यज्ञ करते तो उन्हे ही फायदा होता! शूद्रों को उपनयन, वेदाध्यन और यज्ञ का अधिकार देने से ब्राह्मणों को मोटी दक्षिणा मिलती।"
जब भीमटे कहते ही हैं कि ब्राह्मण लालची होते हैं तो शूद्रों को यह अधिकार देने से ब्राह्मणों की कोई क्षति न होती और उनकी कमाई ही बढ़ती तो ब्राह्मण अपना नुकसान क्यों करते?
आखिर जितने अधिक ग्राहक, उतना अधिक फायदा।
अब मै भीमटों से यही कहूँगा कि आओ और इस पोस्ट पर अपना ज्ञान दो! या तो खुद झूठे साबित होकर भ्रामक-प्रचार बन्द करो, या अपने बाप अम्बेडकर को झूठा साबित करो।
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भीमवादी आपसे जब भी बात करेंगे तो वे "आर्य" और "शूद्र" की बातें जरूर करेंगे, और यह साबित करने के लिये पूरा जोर लगायेंगे कि "आर्य" लोग भारत मे बाहर से आये थे।
बामसेफी भीमटों की बड़ी समस्या यह है कि वे अपने अलावा किसी दूसरे की बात सुनते ही नही! बस यही वजह होती है कि आपके लाख-प्रमाण भी इन्हे कन्विन्स नही कर सकते।
खैर.. मैने कुछ महीनों पहले पोस्ट करके अम्बेडकर की किताब "Who were shudra" से यह प्रमाण दिया था कि जिस समाज को बामसेफी शूद्र कहकर अपमानित करते हैं, वे लोग अम्बेडकर की नजर मे आर्य (क्षत्रिय) थे।
आज मै इसी किताब से सप्रमाण यह बताना चाहता हूँ कि अम्बेडकर ने भारत मे आर्य और अनार्य को नस्लीय भिन्न होने की धारणा को किस तरह नकार दिया था।
यहाँ पहले मै यह बता दूँ कि जब डा० अम्बेडकर का युग था, तब आर्य और द्रविण जैसी धारणाऐं समाज मे थी! 1873 मे ज्योतिबा फुले ने सबसे पहले "मूलनिवासी" थ्योरी को प्रचारित किया, और ब्राह्मणों को "ईरानी आर्य" घोषित करने की कोशिश की थी।
अम्बेडकर अपने जीवनकाल मे फुले से बहुत प्रभावित थे और उन्हे अपना 'गुरू' भी मानते थे, इसके बावजूद भी उन्होने फुले की आर्य और मूलनिवासी थ्योरी को पूरी तरह से नकार दिया था।
डा० अम्बेडकर ने वेदों मे वर्णित आर्य और दास-दस्यु शब्द को कोई नस्लीय-प्रजाति न मानकर पूजा-पद्धति की भिन्नता बतायी थी। अम्बेडकर का कहना था कि आर्य और दास-दस्यु कोई अलग-अलग रंग-रूप वाले प्रजाति नही थे, बल्कि ये अपनी पूजा-पद्धति से भिन्न थे।
अपनी किताब Who were shudra के पृष्ठ-84-85 (चित्र-1-3) पर अम्बेडकर लिखते हैं कि "वेदों मे जो आर्य और दास-दस्यु शब्द आये हैं, उनका सम्बन्ध प्रजाति से न होकर पूजा-पद्धति से है और जो समाज स्वयं को आर्य कहता था वह विदेशी नही था। कोई भी विदेशी जब किसी अन्य देश मे जायेगा तो वह वहाँ की नदियों को भी इतना सम्मान नही देगा जितना कि आर्यों ने भारत की नदियों को "मेरी गंगा, मेरी यमुना" कहकर दिया है"
अम्बेडकर की बात मे तर्क है, जब तक आप किसी चीज से भावनात्मक-रूप से नही जुड़े रहेंगे, उसे इतने प्रेमिल अंदाज मे सम्बोधित नही करेंगे। जबकि तमाम शास्त्रों मे आर्यों ने नदियों को "मेरी" कहकर तो पुकारा ही है, साथ ही साथ उन्हे माँ का दर्जा भी दिया है।
इसी देश मे तमाम विदेशी आक्रमणकारी जैसे मुगल, मंगोल और अंग्रेज भी आये, पर क्या इन्होने भी भारत की नदियों और पहाड़ों से वैसा भी ममतत्व रखा जैसा कि आर्यों ने?
इसके बाद अम्बेडकर आगे लिखते हैं कि आर्यों और दासो-दस्युओं के बीच चाहे जिस सीमा तक टकराव रहा हो, पर यह प्रजाति का टकराव नही था, बल्कि यह टकराव अलग-अलग पूजा पद्धति की वजह से पैदा हुआ था।
अगर मै अम्बेडकर की बात को साफ शब्दों मे कहूँ तो उनका कहना था कि उस समय सम्पूर्ण भारत मे वेदों का प्रसार नही था, और जो लोग वेदों को मानते थे वे खुद को आर्य कहते थे, और जो अवैदिक थे वे दास-दस्यु समझे जाते थे।
अम्बेडकर ने अपनी एक अन्य किताब "Riddle in hinduism" (चित्र-4-5) मे भगवान शिव को भी अवैदिक और अनार्य लिखा है। इस किताब मे भी उन्होने लिखा है कि आर्यों और अनार्यों के बीच भिन्नता जातीय आधार पर नही, बल्कि संस्कृति (उपासना पद्धति) के आधार पर थी।
उनका मतलब साफ था कि शिवजी और उनके उपासक वेदों को नही मानते थे! आज भी कर्नाटक के लिंगायत वेदों को नही मानते और न ही उनकी कोई वर्णव्यवस्था है।
अम्बेडकर केवल यहीं नही रुके, वे इस किताब मे प्रमाण पर प्रमाण देकर विदेशी साहित्यकारों द्वारा बनायी गयी "आर्य-आक्रमण थ्योरी" की बखिया उधेड़ते हैं।
उन्होने लिखा है कि आर्य आक्रमण करने वाला सिद्धान्त पाश्चात्य लेखकों का अविष्कार है। उन्होने जिंद अवेस्ता तक से प्रमाण देकर यह साबित किया है कि खुद को आर्य कहने वाले लोग विशुद्ध भारतीय थे और वे हर रंग (गोरे-काले) के थे। उनमे कोई रंगभेद नही था, बल्कि उन्होने शास्त्रों मे श्याम (काले) रंग को अधिक ही महत्व दिया है।
अम्बेडकर द्वारा लिखी गयी सारी बातें इस पोस्ट मे लिखना सम्भव नही है, फिर भी मै पाठकों की सुविधा के लिये कुछ तस्वीरें खीचकर कमेन्ट बाक्स मे डाल देता हूँ, जिसे पढ़ने से काफी कुछ समझ आ जायेगा।
अन्त मे मै भीमटों से यही कहूँगा कि आप जब तक विदेशियों की लिखी किताबों को पढ़कर अपना इतिहास ढ़ूढ़ते रहोगे, तब तक ऐसे ही भटकोगे! अपने खुद के महापुरुष को पढ़ो, शायद आपको भी अक्ल आ जाये।
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भीमवादियों द्वारा एक कहानी हमेशा सुनायी जाती है कि हजारों साल पहले आर्य ईरान से भारत आये और यहाँ के मूलनिवासियों से लड़कर उनका राज्य छीन लिया। फिर आर्यों ने यहाँ के मूलनिवासियों को गुलाम बनाने के लिये उन्हे "शूद्र" घोषित कर दिया।
जिन मूलनिवासियों ने इनका अधिक विरोध किया उन्हे 'अछूत शूद्र' बना दिया, और जिन्होने कम विरोध किया उन्हे 'सछूत शूद्र' बनाकर अपने यहाँ नौकरी पर रख लिया।
सबसे पहले मै भीमवादियों की इस कहानी का यह बताकर खण्डन करना चाहूँगा कि भारत मे कभी आर्य-अनार्य संघर्ष हुआ इसके कोई ठोस प्रमाण नही है।
सिंधु घाटी मे जो नरकंकाल मिले थे वह लगभग ईसा से 1750 साल पुराने थे, और भारत मे आर्यों का आगमन ईसा से लगभग 1500 साल पहले हुआ। अर्थात आर्यों के आगमन से लगभग 250 साल पहले सिंधुघाटी नष्ट हो चुकी थी। वैसे भी लगभग सभी इतिहासकार इस बात पर सहमत हैं कि सिंधुघाटी मे जो कंकाल मिले थे वह बाढ़ आने, आकाल पड़ने या कोई महामारी जैसी बीमारी की वजह से मारे गये लोगों के थे, न कि आर्य-अनार्य संघर्ष से।
वैसे इस आर्य-अनार्य वाली कहानी को बाल गंगाधर तिलक जैसे कुछ चतुर ब्राह्मणों ने सहमति दी थी, ताकि वे यह जता सकें कि इस देश पर उनका अधिकार दूसरों से अधिक है, क्योंकि उनके पूर्वजों ने इस देश को जीतकर हासिल किया है। ब्राह्मणों ने तो विजेता-भाव रखने के लिये इस कथा को मौन-सहमति दे दी, पर मूर्ख भीमवादियों ने इस झूठी कहानी का खूब प्रचार-प्रसार किया।
भीमवादी एक षणयन्त्र और करते हैं, ये लोग पिछड़ों (OBC) को ब्राह्मणों के खिलाफ भड़काने के लिये कहते हैं कि आर्य बाहर से आये और तुम्हारे पूर्वजों को गुलाम बनाकर उन्हे "शूद्र" घोषित कर दिया।
एक बात यहाँ और ध्यान देना कि वेद और पुराण कहते हैं कि चारों ही वर्ण आर्यों के थे, पर भीमटे कहते हैं कि तीन वर्ण आर्यों के थे और चौथा (शूद्र) अनार्यों का....
अब भीमटों की यह बात कितनी बड़ी झूठ है यह मै बताता हूँ।
भीमटों के पैगम्बर डा० अम्बेडकर ने शूद्रों के बारे मे एक किताब (Who were shudra) लिखी थी, जिसमे उन्होने दावा किया था कि शूद्र कोई और नही बल्कि आर्य ही है। और तो और अम्बेडकर ने अपनी किताब मे शूद्रों को क्षत्रिय वर्ण का माना है।
अम्बेडकर ने इस किताब के पृष्ठ-125 (चित्र-1&2) पर लिखा है कि-
...... शूद्र अनार्य प्रजाति के नही थे, बल्कि शूद्र लोग आर्य थे।
...... शूद्र लोग पूर्वकाल मे क्षत्रिय वर्ण के थे।
...... शूद्र लोग इतने महत्वपूर्ण क्षत्रिय वर्ण के थे कि ये प्राचीन आर्य-समुदाय से भी अधिक ख्याति-प्राप्त राजा थे।
अम्बेडकर ने इस किताब मे पैजवन और शूद्र राजा सुदास का जिक्र भी किया हैं... अम्बेडकर ने लिखा है कि पौराणिक-काल मे ब्राह्मणों और क्षत्रियों मे काफी संघर्ष होता था, जैसा कि विश्वामित्र और वशिष्ठ के बीच सदैव होता रहा। इसी संघर्ष के परिणाम-स्वरूप ब्राह्मणों ने क्षत्रियों का उपनयन संस्कार करना बन्द कर दिया और जिसके परिणाम-स्वरूप क्षत्रियों को शूद्र घोषित कर दिया।
अम्बेडकर ने इसी किताब के पृष्ठ-143 (चित्र-3) पर लिखा है कि " इसमे तो कोई सन्देह है ही नही कि शूद्र लोग आर्य और क्षत्रिय थे, जो दूसरे आर्यों से पहले भारत आये थे"
............. अब सोचो कि भीमटे किस तरह से झूठ बोलकर समाज मे जहर घोलते हैं! ये लोग केवल पिछड़ों को शूद्र घोषित करके उन्हे भड़काते ही नही, बल्कि यह कहकर उनका आत्मविश्वास भी तोड़ देते हैं कि "तुम्हारे पूर्वज तो ब्राह्मणों के गुलाम थे, और 'ब्लू बाबा' ने उन्हे मुक्ति दिलायी"
भीमटों की एक ही मनोदशा है कि इस देश मे जितना भी कुछ गड़बड़ है, उसका सारा ठीकरा ब्राह्मणों के सिर फोड़ दो। इसी कड़ी मे भीमटे अछूतपन के लिये भी ब्राह्मणों को ही जिम्मेदार ठहराते हैं।
भीमटे कहते हैं कि ब्राह्मणों ने षणयन्त्र करके यहाँ के मूलनिवासियों को अछूत बना दिया, पर इत्तेफाक की बात यह है कि ब्लू बाबा अम्बेडकर भीमटों की इस बात को भी नकार कर गये हैं।
ब्लू बाबा ने भारत के अछूतों पर भी "अछूत कौन और कैसे" नामक एक किताब लिखी, और उसमे उन्होने बताया कि एक पूरा समाज आखिर अछूत कैसे हो गया?
इसी किताब के पृष्ठ-83 (चित्र-4,5&6) पर अम्बेडकर ने लिखा है कि "कोई भी हिन्दू चाहे जितना भी निम्न श्रेणी का हो, वह गाय का मांस नही छुएगा, पर कुछ समुदाय मृत गाय की खाल उतारते थे और ये लोग मरी हुई गाय का मांस भी खाते थे, जो इनके अछूतपन का मूल है"
अम्बेडकर ने साफ लिखा है कि मरे हुये जानवरों को खाना, और सफाई से न रहना ही अछूतपन का कारण बना, पर भीमटे यह साबित करने पर उतारू हैं कि सारी बदमाशी ब्राह्मणों ने की।
एक बार आप लोग ही गहराई से सोचो कि यदि ब्राह्मण किसी को अछूत घोषित करते तो केवल उसे ब्राह्मण समाज ही अछूत मानता, फिर दूसरी अन्य छोटी जातियों ने भी उन्हे अछूत कैसे मान लिया?
आखिर 3% ब्राह्मणों ने अपनी बात 97% लोगों को कैसे मनवा ली?
मतलब साफ था... कुछ समुदाय के लोग मरे हुये जानवरों का मांस खाते थे, जिसकी वजह से ब्राह्मण समेत दूसरे अन्य समुदायों ने उनसे दूरी बना ली, और वे समाज मे अछूत हो गये। डा० अम्बेडकर ने भी यही लिखा है, पर भीमटे हैं जो मानने को तैयार ही नही।
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"मनुवाद" शब्द वर्तमान समय मे भीमवादियों का एक अचूक-अस्त्र बन गया है, अक्सर भीमवादी किसी के भी ऊपर मनुवादी होने का आरोप लगा देते हैं।
सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि मनुवाद है क्या?
------ मनुवादी का अर्थ होता है मनु के बनाये विधान (मनुस्मृति) पर अमल करने वाला।
भीमवादियों के घोषित मसीहा डा० अम्बेडकर भी पूरे जीवन मनुस्मृति की आलोचना करते रहे, और गैर-सवर्णों को उसका डर दिखाकर अपने साथ भीड़ जुटाने का प्रयत्न भी करते थे। पर अम्बेडकर को पढ़ने के बाद ऐसा लगता है कि वे भी मनुस्मृति पर कोई ठीक-ठाक आरोप लगाने मे सफल नही रहे।
अम्बेडकर मनु के इतने विरोधी थे कि वे कहते थे "मेरे ऊपर मनु का भूत सवार है, और मै भलीभाँति जानता हूँ कि मुझमे इतनी क्षमता नही है कि मै अपने जीते-जी उसे उतार सकूँ" (भारत मे जातियाँ, पृष्ठ-24, चित्र-1)
अम्बेडकर के इस कथन से स्पष्ट है कि अम्बेडकर मनु से कितने चिढ़े हुये थे? पर वास्तव मे अम्बेडकर ने अपना पूरा जीवन भ्रम मे ही जिया...
अम्बेडकर अच्छे से जानते थे कि जिस तरह शैतान के बिना भगवान का कोई अस्तित्व नही है, ठीक उसी तरह मनुवाद-मनुवाद चिल्लाये बिना मेरे आन्दोलन मे भी धार नही आ सकती।
अम्बेडकर मनु पर आरोप लगाते थे कि मनु ने चारो वर्णों के लिये अलग-अलग दण्डविधान बनाया! हालाकि अम्बेडकर स्वयं यह कहते थे कि "वर्णव्यवस्था मनु ने नही बनायी, यह तो वेदों से आयी, पर मनु ने उसका पोषण किया"
अम्बेडकर की बात सही थी, वर्णव्यवस्था वेदों से ही आयी, पर मनु ने वर्णानुसार जो दण्डविधान बनाया उसमे तो ब्राह्मण को ही अधिक दण्ड देने का प्रावधान किया था, क्योंकि मनु के अनुसार ब्राह्मण अधिक बुद्धिमान होता है, और यदि बुद्धिमान अपराध करे तो उसे दण्ड भी अधिक मिलना चाहिये।
मनु ने मनुस्मृति-8/337-338 (चित्र-2) मे लिखा है- "चोरी करने से पाप लगता है, और इसे जानने के बाद भी यदि शूद्र चोरी करे तो उससे माल का आठ गुना, वैश्य करे तो सोलह गुना, क्षत्रिय करे तो बत्तीस गुना, और यदि ब्राह्मण करे तो उसे चौंसठ गुना या एक सौ अट्ठाइस गुना दण्ड देना चाहिये।"
------------- अब बताइये कि मनु कहाँ ब्राह्मणों के पक्षधर थे?
भीमवादी अक्सर जाति-व्यवस्था का आरोप भी मनु के ऊपर ही लगा देते हैं। आज भीमवादियों को उसका भी जवाब उनके अपने पितामह अम्बेडकर की किताब से ही दे देता हूँ।
अम्बेडकर ने "भारत मे जातियाँ" (चित्र-3) नामक एक बड़ी चर्चित किताब लिखी थी, उसमे उन्होने यह बताया है कि भारत मे जातिवाद कैसे बना?
इसी किताब के पृष्ठ-24 (चित्र-4) पर अम्बेडकर ने लिखा है कि "मै आपको एक बात बताना चाहता हूँ कि जातिविधान मनु ने नही बनाया है, और वह इसे बना भी नही सकता था!"
भीमवादी जाति-व्यवस्था बनाने का आरोप ब्राह्मणों पर भी लगाते हैं, पर इनके उपास्य अम्बेडकर ने तो इससे भी इनकार कर दिया है! इसी किताब के पृष्ठ-25 (चित्र-5) पर अम्बेडकर लिखते हैं कि "ब्राह्मण अनेक गलतियाँ करने के दोषी रहे होंगे, और उन्होने ऐसा किया भी होगा, लेकिन जातिव्यवस्था बनाकर उसे गैर-ब्राह्मणों पर लाद देने की उनमे क्षमता नही थी"
मतलब साफ है कि अम्बेडकर ने जातिव्यवस्था का दोष न तो मनु को दिया और न ही ब्राह्मणों को। फिर भीमवादी कहाँ से ज्ञान लाकर ब्राह्मणों और मनु को दोषी बताते हैं, और अपने पितामह अम्बेडकर को झूठा साबित करते हैं।
यहाँ एक बात मै और बताता चलूँ कि भीमवादी कहते हैं कि वर्ण-व्यवस्था कर्मानुसार नही थी, और वर्णों मे परिवर्तन नही होता था। लेकिन अम्बेडकर ने अपनी किताब मे ठीक इसके विपरीत लिखा है.....
इसी किताब के पृष्ठ-26 (चित्र-6) पर अम्बेडकर लिखते हैं कि "प्रारम्भ मे वर्ण-व्यवस्था वर्ग-व्यवस्था जैसी ही थी। प्रारम्भ मे सुविदित पुरोहित, सैनिक, व्यवसायी और सेवक, चार वर्ग थे, और इसमे योग्यता प्राप्त कर लेने के बाद व्यक्ति अपना वर्ग बदल सकते थे।"
वैसे मनुस्मृति-10/65 मे भी वर्ण-परिवर्तन की बात लिखी है, जिस पर अम्बेडकर ने अपनी किताब के माध्यम से मुहर भी लगा दी है।
अब सवाल यह है कि जब मनुस्मृति और अम्बेडकर दोनो ही वर्ण-परिवर्तन की बात मानते हैं तो भीमवादी किस आधार इससे इनकार करते हैं?
भीमवादी एक कुतर्क और करते हैं, और कहते हैं कि ब्राह्मणों ने रंगभेद की नीति अपनायी थी! उन्होने काले मूलनिवासियों को अछूत और नीच जाति बनाया, तथा गोरे आर्यों को उच्च-जाति माना।
भीमवादी और बामसेफियों की इस धारणा का भी अम्बेडकर ने विरोध किया है, और उन्होने इसे अंग्रेजों की चाल बतायी है।
अम्बेडकर ने इसी किताब के पृष्ठ-31 (चित्र-7) पर लिखा है कि- "जाति-व्यवस्था पर अनुसंधान करने वालों ने मेरे मतानुसार अनेक गलतियाँ की हैं, जिसके फलस्वरूप उन्होने गलत मार्ग अपना लिया। जाति-व्यवस्था के यूरोपीय अध्ययन-कर्ताओं ने इस सम्बन्ध मे वर्ण (रंग) की भूमिका पर अनावश्यक बल दिया! क्योंकि वे (यूरोपीय) रंगभेद के शिकार हैं, अतः उन्होने सरलतापूर्वक यह सोच लिया कि भारत की जाति-व्यवस्था मे भी वर्ण (रंग) की भूमिका रही है। लेकिन इससे अधिक सत्य से परे और कोई बात नही हो सकती है"
अब आप लोग जरा विचार करो कि भीमवादी आज जितने भी मनगढ़ंत आरोप लगाते हैं, उन्हे अम्बेडकर लगभग 70 साल पहले ही खारिज कर चुके हैं। भीमवादी ब्राह्मणों को और मनु को दोषी बनाने के प्रयास मे अपने ही महापुरुष अम्बेडकर को झूठा साबित करने पर तुले हैं।
भीमवादियों को लज्जा नही आती कि जिस अम्बेडकर के नाम की वे जय-जयकार करते हैं, उनकी ही बात नही मानते और थोड़े से फायदे के लिये स्वतः अम्बेडकर का अपमान करते हैं।
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आमतौर पर लोग डा० बाबासाहब अम्बेडकर को बहुत बुद्धिजीवी और पाखण्ड विरोधी मानते हैं, पर यह लोगों की भूल है!
असल मे किसी व्यक्ति को बेहतर समझने के लिये उसकी कृतियों को पढ़ना जरूरी होता है, और अम्बेडकर जी की एक ऐसी ही कृति है "भगवान बुद्ध और उनका धम्म"
इस किताब मे अम्बेडकर ने तथागत बुद्ध की पूरी जीवनी और उनके उपदेशों को लिखा है....
मेरे एक मित्र ने मुझे यह किताब पढ़ने का सुझाव दिया, और पढ़कर मुझे ऐसा लगा कि अम्बेडकर भी किसी पौराणिक ब्राह्मण से कम पाखण्डी नही थे!
अम्बेडकर इस किताब मे गौतम बुद्ध के जन्म के संदर्भ मे लिखते हैं कि एक बार महामाया (बुद्ध की माँ) किसी उत्सव मे गयी थी, और उन्हे वहाँ निद्रा आ गयी! फिर उन्होने स्वप्न देखा कि कुछ देवता आये और उन्हे उठाकर एक सुन्दर उपवन मे ले गये!
वहाँ उन देवताओं और उनकी देवियों ने महामाया का खूब स्वागत-सत्कार किया, फिर एक 'सुमेध' नामक देवता ने आकर महामाया से प्रार्थना की, और कहा- "हे देवी! मै धरती पर अपना अन्तिम अवतार लेना चाहता हूँ, क्या आप मेरी माँ बनोगी?
महामाया ने हाँ कर दिया, और वही सुमेध ही नियत समय पर बुद्धरूप मे पैदा हुये"
इतनी बड़ी पाखण्ड वाली उल्टी बाबासाहब ने नौवें पृष्ठ पर ही कर दी है, पर बाबासाहब का पौराणिक गप्प वाला पाखण्ड यहीं नही रुका, और आगे लिखते हैं कि जब बुद्ध पैदा हुये तो आकाश मे देवता 'बुद्ध, बुद्ध' के नारे लगा रहे थे, और 'असित' नामक एक महर्षि ने पूरे जम्बूद्वीप पर दिव्यदृष्टि से देखा तो उन्हे पता चला कि बुद्ध पैदा हो चुके है!
अब जरा विचार करो कि अगर इतनी पाखण्डी बात खुद बाबासाहब बीसवीं सदी मे लिख रहे थे, तो वो किस मुँह से वे हजारों साल पहले लिखी पौराणिक कथाओं का विरोध करते थे!
अम्बेडकर जी पुरातन ब्राह्मणों से भी बड़े पाखण्डी थे, पुराण लिखने वाले ब्राह्मण कितना पढ़े-लिखे थे, यह कोई नही जानता, पर वकालत समेत देश-विदेश से न जाने कितनी डिग्री लेने वाले अम्बेडकर बीसवीं सदी मे ऐसी आडम्बरपूर्ण बात लिख रहे थे!
डा० अम्बेडकर को 'बाबासाहब' उपनाम मिला था, और "बाबा" शब्द सही मे पाखण्ड का पर्याय होता है, फिर अम्बेडकर इस "बाबा" शब्द के प्रकोप से भला कैसे बच पाते!
आखिरकार वे कर ही बैठे ब्राह्मणवादी भूल!
वैसे अम्बेडकर जी तनिक भी ब्राह्मण विरोधी नही थे, बामसेफी लोंगो को झूठ-मूठ मे गुमराह करते हैं, अम्बेडकर ने तो इस किताब मे बाकयदा ब्राह्मणों का गुणगान किया है, और लिखा है कि देवी महामाया ने गर्भधारण करने के बाद आठ ब्राह्मणों को बुलाकर भोजन कराया और सोना-चाँदी दान किये! और इन ब्राह्मणों ने भविष्यवाणी भी की कि आपके घर एक प्रतापी पुत्र पैदा होगा!
अम्बेडकर ने तो तथागत बुद्ध को ब्राह्मणों का आशिर्वाद और एक देवता का अवतार ही बता डाला है, और बिडम्बना तो देखो कि बामसेफी आशिर्वाद और अवतारवाद का विरोध करते हैं!
अब आप जरा सोचों कि ब्राह्मणी पाखण्ड का विरोध करने वाला संगठन 'बामसेफ' क्या अम्बेडकरी पाखण्ड पर मुँह खोलता है!
बामसेफ इन बातों को दबाता है, बल्कि मुझे तो लगता है कि बामसेफियों ने अम्बेडकर को पढ़ा ही नही है!
खैर मै केवल यही कहूँगा कि देशविरोधी संगठन बामसेफ से दूर ही रहें, बामसेफ केवल लोगों मे वैमनस्य फैलाकर देश तोड़ना चाहता है!
आगे इस किताब को और पढ़ूँगा, तो और भी पोस्ट करूँगा!
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बाबासाहब भीमराव अम्बेडकर की सबसे विवादित और चर्चित किताब है "Riddles in hinduism"
जब मै यह किताब पढ़ रहा था तो इसके पृष्ठ-301 (सम्यक प्रकाशन) पर बाबासाहब ने कृष्ण और यदुवंशियों पर बड़े गम्भीर आरोप लगाये है!
डा० अम्बेडकर लिखते है कि- "यादव बहुपत्नीक थे, लेकिन श्रीकृष्ण के पूर्वज पुत्रीमैथुन करते थे! बाबासाहब ने मत्स्यपुराण का उदाहरण देते हुये लिखा है कि कृष्ण के पूर्वज तैत्तिरि ने अपनी पुत्री से शादी करके #नल नामक पुत्र पैदा किया था!
डा० अम्बेडकर यही नही रुके, उन्होने कृष्ण/जामवन्ती पुत्र साम्ब पर आरोप लगाया कि वह अपनी माँ से ही सहवास करता था, और अवैध रूप से श्रीकृष्ण की अन्य पत्नियों के साथ रहता था"
बाबासाहब ने यह बात #मत्स्यपुराण के हवाले से कही है, तो मैने सारा "मत्स्यपुराण" पढ़ डाला, पर मुझे ऐसा कहीं नही मिला!
मै अम्बेडकरवादी और दूसरे भीम समर्थकों से जानना चाहता हूँ कि बाबासाहब ने उक्त बातें कहाँ पढ़ी?
आखिर बाबासाहब किसका भाष्य पढ़ते थे?
यही नही बाबासाहब ने इसी किताब के पृष्ठ-214 पर #कुम्हारों को "ब्राह्मण पिता और वैश्य माता" की संतान बताया है!
इस पर भी बामसेफियों का क्या विचार है....
यह बात किसी कटाक्ष से नही, बल्कि कौतुहलवश मै जानना चाहता हूँ.....
क्या कोई अम्बेडकरवादी बता सकता हैं?
नोट- मैने गीताप्रेस (कोड-0557) वाली मत्स्यपुराण पढ़ी है।
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बामसेफ वाले अक्सर यह कहते हैं कि जब आर्य भारत मे आये तो उन्होने यहाँ के मूलनिवासियों से लड़कर उन्हे जंगलों मे खदेड़ दिया और उन्हे "अछूत" बना दिया!
यह तो बामसेफ कहता हैं, पर अम्बेडकर के विचार अछूतपन पर अलग ही है!
बाबासाहब ने अपनी किताब The untouchables (सम्यक प्रकाशन) के दसवें अध्याय (पृष्ठ-83) मे लिखा है कि "कोई भी हिन्दू चाहे वह जितना भी निम्नश्रेणी का हो, वह गाय का मांस नही छुएगा, पर कुछ समुदाय मृत गाय की खाल उतारते थे और उनकी खाल और हड्डियों से कुछ चीजें बनाते थे!
ये लोग मरी हुई गाय का मांस भी खाते थे, जो इनके अछूतपन का मूल है"
बाबासाहब ने बड़े विस्तृत रूप से लिखा है कि जो लोग गाय को पूजते थे और गाय के मांस से घृणा रखते थे उन्होने गाय का मांस खाने वालो को "अछूत" माना।
इसी पुस्तक के पृष्ठ-124 पर डा० अम्बेडकर ने लिखा है कि- "चमार (चर्मकार) ही केवल वह समुदाय है जो अपवित्र और अछूत दोनो मे आता है, अपवित्रों और चमार के बीच जिसने सर्वाधिक अन्तर पैदा किया वह है गाय का मांस खाना"
बाबासाहब ने बड़े स्पष्ट शब्दों मे लिखा है कि जो समुदाय गाय समेत मरे जानवरों का मांस खाते थे, उन्हे गाय को पवित्र मानने वालों ने अछूत घोषित किया!
अम्बेडकर ने इसी पृष्ठ-124 पर लिखा है कि- "यह निर्णायक है कि गाय का मांस खाना अछूतपन का मूल है, जो अपवित्र और अछूतों मे विभाजन पैदा करता है"
अब इसमे कोई शक नही है कि चर्मकारों को अछूत ब्राह्मणों ने नही बनाया, बल्कि वो अछूत इसलिये बने क्योकि प्राचीन समय मे वो गाय का मांस खाते थे!
अब बामसेफियों की विचारधारा को क्या कहा जाये, ये तो अम्बेडकर से भी दस कदम आगे हैं...
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यूँ तो अपने जीवनकाल मे अम्बेडकर जी ने मनु का बहुत विरोध किया था,पर उन्होने कुछ कार्य ऐसे किये है, जो मनु के जैसे ही है!
पहली बात तो जब अम्बेडकर जी मनुस्मृति को जला रहे थे, तो आर्यसमाजियों ने उन्हे समझाने का प्रयास किया कि इसमे मिलावट है, पर अम्बेडकर ना माने!
फिर कुछ समय पश्चात जब उन्होने बौद्धधर्म अपनाया तो बौद्धग्रन्थो को काट-झाटकर अपनी किताब लिखी और दलील दी कि बौद्धग्रंथो मे मिलावट है!
अम्बेडकर जी का यह दोहरा चरित्र था, वो मनुस्मृति मे मिलावट मानने को तैयार नही थे, पर बौद्धग्रन्थो मे मिलावट की बात खुद कह रहे थे!
अगर बौद्धग्रंथो मे मिलावट हो सकती है तो रामायण और मनुस्मृति मे क्यो नही?
दूसरी बात अगर मान भी ले कि मनुस्मृति मे मिलावट नही थी, तो मनु ने लिखा है कि जो भी ब्राह्मण का नाम ले या उसे अपमानसूचक शब्द कहे, उसके मुँह मे गर्म लोहे की सलाखें डाल देनी चाहिये!
अब जरा आप हमारे संविधान मे एट्रोसिटी एक्ट पढ़ना, यह अधिनियम भी कहता है कि कोई भी दलितों को अगर अपमानसूचक शब्द कहता है या उनका अपमान करता है, तो वह दण्ड का अपराधी है!
जरा विचार करो कि मनु और अम्बेडकर मे क्या फर्क है! क्या यह देश ब्राह्मण और दलितों का ही है!
एक के हाथ मे धर्म की तलवार है तो दूसरे को संविधान का संरक्षण...
अब बचे हुये ओबीसी और मुसलमान क्या इस देश मे मदारी है, जो तम्बूरा बजायें!
तीसरी बात बाबासाहब ने खुद ही कहा था कि मनु ने वर्णव्यवस्था नही बनाई है, वर्णव्यवस्था तो वेदों मे है, मनु ने उसका पोषण किया है, जिससे वर्णव्यवस्था मजबूत हुई.... अतः मनु भी दोषी है!
अब जरा आरक्षण व्यवस्था देखो, बाबासाहब ने जाति के नाम पर आरक्षण मांगा है!
जातिव्यवस्था हमारे देश मे पहले से ही थी, पर जाति के नाम पर आरक्षण लेकर क्या अम्बेडकर ने जातिव्यवस्था को मजबूत नही किया?
क्या बाबासाहब ने जाति व्यवस्था का पोषण नही किया? फिर अगर मनु दोषी हैं, तो अम्बेडकर जी निर्दोष कैसे?
अगर कोई अम्बेडकरवादी मठाधीश हो जिसे तर्क करना आता हो तो वही जवाब दे, कुतर्को की यहाँ जरूरत नही।
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