Monday, 29 March 2021

आत्मरक्षा, न्याय के लिए हिंसा।

तथागत बुद्ध हमेशा हिंसा के विरुद्ध थे, लेकिन सदा ही न्याय के पक्ष मे थे! पर जहाँ न्याय के लिये हिंसा जरूरी हो, वहाँ क्या किया जाये, यह बड़ा सवाल उनके सामने भी आता था?

एक बार वैशाली के मुख्य सेनापति ने आकर बुद्ध से पूँछा-
भगवन्! आप अहिंसा का उपदेश देते हो। आपके अनुसार क्या एक अपराधी को दण्ड से मुक्त रखा जाये?
भगवन्! क्या हम अपने बीवी, बच्चे और धन की रक्षा के लिये युद्ध न करें?
क्या हम सभी प्रकार के युद्ध से विरत होकर अहिंसा के नाम पर अपराधियों द्वारा सताये जायें?

तब बुद्ध ने उत्तर दिया-
हे सेनापति! आपने मेरे उपदेशों का गलत अर्थ लिया है। एक निर्दोष व्यक्ति की रक्षा होनी चाहिये पर अपराधी को सजा अवश्य मिलनी चाहिये। अपराधी को सजा देने से दण्डाधिकारी को दोष नही होता, क्योंकि सजा का कारण तो अपराधी का स्वयं का कृत्य है। कोई व्यक्ति जो न्याय के लिये लड़ता है वह अहिंसा का दोषी नही होता, इसी तरह अपराधी को सजा देने से दण्डाधिकारी दोषी नही माना जायेगा। यदि शांति स्थापित करने के सारे प्रयास विफल हो जाये तो हिंसा का उत्तरदायित्व युद्ध प्रारम्भ करने वाले पर होता है। शांति स्थापित करने के लिये युद्ध हो सकता है, पर युद्ध कभी स्वार्थ-सिद्धि के लिये नही होना चाहिये।

तथागत बुद्ध ने इन बातों से बहुत कुछ साफ कर दिया था। वे हिंसा के विरोध मे जरूर थे, पर न्याय की रक्षा के लिये हथियार उठाने को हिंसा नही मानते थे।

लगभग यही बातें सारे महापुरुषों के जीवनकाल मे घटी है, पैगम्बर मोहम्मद ने कई युद्ध ऐसे किये जो प्रतिरक्षा मे थे, लेकिन कई बार वो धर्म का विस्तार करने के लिये छोटे-छोटे कबीलों पर हमले करते थे, जो शायद अनुचित-कृत्य था!

श्रीकृष्ण ने भी अपने जीवन मे कभी किसी पर हमला नही किया, बल्कि दूसरों ने उन पर आक्रमण किया और वो आत्मरक्षा के लिये युद्ध करते रहे। पर एक बार इन्होने भी यह अनुचित-कृत्य किया है!
दरअसल इनकी पत्नि सत्यभामा ने एक बार इनसे कहा कि- "हे सइयां! हमको पारिजात का फूल चाहिये"
फिर क्या था... इन्होने कहा "हे गोरी! फूल क्या, हम तुम्हे पूरा पारिजात का पेड़ ही लाकर देंगे"
इसके बाद कृष्ण मे अमरावती पर हमला कर दिया!
समझ नही आता कि कृष्ण को इतना बड़ा जोरू का गुलाम बनने की क्या जरूरत थी?

तथागत बुद्ध की बात सही थी, अगर शांति-स्थापना के लिये तलवार उठाना पड़े तो जरूर उठाये, पर स्वार्थ-निहित हिंसा कभी नही करनी चाहिये।

बाइबल (न्यू टेस्टामेंट) Luke-22/36 मे जीसस ने भी कहा है कि "जिसके पास तलवार नही है, उसे अपना अंगरखा (वस्त्र) बेंचकर भी तलवार लेनी चाहिये"
शायद जीसस भी आत्मरक्षा के लिये ही तलवार खरीदने की सलाह दे रहे थे। अब तलवार से कोई सब्जी तो काटेगा नही...

कुल मिलाकर यही सच है कि आत्मरक्षा के लिये यदि हिंसा होती है तो कोई बात नही, पर कभी धर्म-विस्तार के लिये, या अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिये हिंसा का मार्ग उचित नही हो सकता।

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गीत गोबिंद जयदेव।

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