Saturday, 27 March 2021

दुर्गा, महिषासुर।

नवरात्रि के त्योहार आ रहे हैं, अब जगह-जगह भव्य पंडाल सजाये जायेंगे, और वहाँ जोर-जोर से "जय महिषासुर मर्दिनी" के जयकारे लगाये जायेंगे!
इन पंडालों मे एक प्रतिमा लगायी जायेगी, जिसमे शेर पर आरूढ़ एक गोरी-चिट्टी सुन्दर आर्य महिला (दुर्गा) एक काले-कलूटे विकृत आदिवासी (महिषासुर) के सीने मे त्रिशूल भोंपकर उसका वध करती हुई दिखाई देगी।

नवरात्रि इसीलिये मनायी जाती है क्योंकि मान्यता है कि दुर्गा ने इसी नौ दिनों मे युद्ध करके महिषासुर का वध किया था!
विचारणीय बात यह है कि आखिर इस बात के क्या ऐतिहासिक प्रमाण है कि कोई दुर्गा थी, या कोई महिषासुर था!

मुझे तो ये पूरी कहानी काल्पनिक सी लगती है! दुर्गा का कोई अता-पता नही कि किसकी पुत्री थी, कहाँ से आयी और कहाँ चली गयी?
महिषासुर के बारे मे भी जो जानकारी है, वह मिथक ही प्रतीत होती है!
चलिये आज पहले महिषासुर के बारे मे जानते हैं-
देवीपुराण के पाँचवें स्कन्द मे एक कथा आती है कि असुरों के राजा रम्भ को अग्निदेव ने वर दिया कि तुम्हे एक पराक्रमी पुत्र पैदा होगा!
एक दिन रम्भ विचरण कर रहा था तो उसने एक जवान मदमस्त भैंस देखी, रम्भ का मन उस भैंस पर आ गया और उसने उससे सहवास किया! कालान्तर मे रम्भ के वीर्य से गर्भित होकर उसी भैंस ने महिषासुर को जन्म दिया!

कुछ दिनों बाद जब वह भैंस घास चर रही थी तो अचानक एक भयंकर भैसा कही आ गया, और वह उस भैंस से मैथुन करने के लिये उसकी ओर दौड़ा...
रम्भ भी वहीं था, उसने देखा कि एक भैसा मेरी भैंस से 'मुँह पीला' (चूँकि भैस का मुँह पहले ही काला होता है) करने का प्रयास कर रहा था! उसकी गैरत जाग गयी और वह भैंसे से भिड़ गया।
फिर क्या था, उस भैसे की नुकीली सींगों से रम्भ मारा गया, और जब रम्भ के सेवकों ने उसके शव को चिता पर लेटाया तो उसकी बीवी पतिव्रता भैंस भी चिता पर चढ़कर रम्भ के साथ सती हो गयी।
मुझे तो यह सोचकर भी आश्चर्य होता है कि किसी जमाने मे भारत मे इतनी पतिव्रता भैंस भी हुआ करती थी जो अपने पति के साथ आत्मदाह कर लेती थी।
खैर... ऐसे ही पैदा हुआ पंडों का कल्पित चरित्र महिषासुर। (चित्र-1-4)

महिषासुर से सम्बन्धित एक दूसरी कथा वराहपुराण अध्याय-95 मे भी मिलती है, जो निम्न है-
विप्रचित नामक दैत्य की एक सुन्दर कन्या थी माहिष्मती! माहिष्मती मायावी-शक्ति से वेष बदलना जानती थी! एक दिन वह अपनी सखियों के साथ घूमती हुई एक पर्वत की तराई मे आ गयी, जहाँ एक सुन्दर उपवन था और एक ऋषि (सुपार्श्व) वहीं तप कर रहे थे।
माहिष्मती उस मनोहर उपवन मे रहना चाहती थी, उसने सोचा कि इस ऋषि को डराकर भगा दूँ और अपनी सखियों के साथ यहाँ कुछ दिन विहार करूँ!
यही सोचकर माहिष्मती ने एक भैंस का रूप धारण किया और सुपार्श्व ऋषि को पास आकर उन्हे डराने लगी! ऋषि ने अपनी योगशक्ति से सत्य को जान लिया और माहिष्मती को श्राप दिया कि तू भैंस का रूप धारण करके मुझे डरा रही है तो जाऽऽ... मै तुझे श्राप देता हूँ कि तू सौ वर्षों तक इसी भैंस-रूप मे रहेगी!

अब माहिष्मती भैंस बनकर नर्मदा तट पर रहने लगी! वहीं नजदीक सिन्धुद्वीप नामक एक ऋषि तप करते थे। एक दिन जब ऋषि स्नान करने के लिये नर्मदा नदी के तट पर गये तो उन्होने देखा कि वहाँ एक सुन्दर दैत्यकन्या इन्दुमती नंगी होकर स्नान कर रही थी! उसे नग्नावस्था मे देखकर ऋषि का जल मे ही वीर्यपात हो गया! माहिष्मती ने उसी जल को पी लिया, जिससे वह गर्भवती हो गयी और कुछ महीनों बाद इसी माहिष्मती भैंस ने महिषासुर को जन्म दिया!  (चित्र-5-7)

महिषासुर की कथा केवल इन्ही दो पुराणों मे मिलती है, और दोनो के अनुसार वह भैंस के पेट से पैदा हुआ।
अब कम से कम मेरी साधारण बुद्धि तो यह मानने को तैयार नही कि एक भैंस किस इंसान के भ्रूण को जन्म दे सकती है! अतः इससे स्पष्ट है कि पौराणिक कहानी तो पूरी तरह से काल्पनिक है।
अब बड़ा सवाल यह होता है कि क्या महिषासुर काल्पनिक है!
इतिहासकारों ने भी महिषासुर पर अलग-अलग राय दी है!
कोसम्बी कहते थे कि वह म्हसोबा (महोबा) का था, तो मैसूर के निवासी कहते हैं कि मैसूर का पुराना नाम ही महिष-असुर ही था! मैसूर मे महिषासुर की एक विशालकाय प्रतिमा भी है।

रही बात दुर्गा की तो उनके बारें मे भी पढ़े तो कुछ अता-पता नही चलता!
एक पुराण कहता है कि दुर्गा कात्यायन ऋषि की पुत्री थी।
दूसरा कहता है कि दुर्गा मणिद्वीप मे रहने वाली जगदम्बा ही थी।
यही नही.. कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि वह चोलवंश की राजकुमारी थी।

अगर दुर्गा को जानने के लिये देवीपुराण पढ़ो तो पूरी पौराणिक-मान्यताऐं ही पलट जाती है!
देवीपुराण मे लिखा है कि अब तक राम-कृष्ण समेत जितने भी अवतार हुये हैं, वह सब दुर्गा के थे, विष्णु के नही! बल्कि यह पुराण तो कहता है कि विष्णु भी दुर्गा की प्रेरणा से ही जन्मे! दुर्गा चालीसा मे भी नरसिंह अवतार दुर्गा का कहा गया है। ये निम्न चौपाई देखें-
"धरा रूप नरसिंह को अम्बा।
प्रकट भई फाड़ कर खम्बा।।
रक्षा करि प्रहलाद बचायो।
हिरनाकुश को स्वर्ग पठायो।।"

जहाँ तक मेरा मानना है तो यह कथा पाखण्ड ही हैं और दुर्गा को प्रतिष्ठित करना या पूजना बेकार मे समय की बर्बादी के अलावा और कुछ नही है! 
वैसे भी जो गलती हमारे पूर्वजों ने अज्ञानतावश की है, उसे हम परम्परा मानकर आखिर कब तक दोहराते रहेंगे।

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नवरात्रि लगभग खत्म हो रही है, उसके बाद नौ-दिनों तक आस्था की केन्द्र बनी दुर्गा की मूर्तियों को नजदीकी नदियों/नहरों मे फेंक दिया जायेगा! 
खैर... यह सतत प्रकृया है, पर दुर्गा को लेकर अभी भी सवाल वही है कि दुर्गा आखिर कौन थी?

पुराणों के अध्ययन से पता चलता है कि महिषासुर के पास न तो कोई चमात्कारी वरदान था और न ही कोई विलक्षण शक्ति, फिर आखिर उसे विष्णु या शिव ने क्यों नही मार दिया?
एक महिला दुर्गा ही क्यों उसे मारती है?

मार्कण्डेयपुराण शाक्त-सम्प्रदाय का मुख्य पुराण है! इसी पुराण से दुर्गा-सप्तशती लिखी गयी है! पिछले एक सप्ताह से मै दुर्गा के बारे मे खोजते-खोजते इसी पुराण तक पहुँचा! इस पुराण के देवी माहत्म्य द्वितीयोऽध्याय मे दुर्गा की उत्पत्ति की कथा है! वैसे तो यह कथा भी पूर्णतः काल्पनिक ही है, फिर भी मै आप लोगों को बता देता हूँ।
कथानुसार महिषासुर ने तमाम देवताओं को हराकर स्वर्ग से बाहर खदेड़ दिया! तब सारे देवता ब्रह्मा, विष्णु और शिव के पास आये और अपना विधवा-विलाप करने लगे। फिर सभी देवताओं ने महिषासुर को मारने के लिये अपने-अपने तेज से एक देवी को प्रकट किया। शंकर के तेज से देवी का मुख, विष्णु के तेज से भुजाऐं, यम के तेज से बाल, चन्द्र के तेज से दोनो स्तन, इन्द्र के तेज से कमर, वरुण के तेज से जंघा, पृथ्वी के तेज से पुष्ठ, ब्रह्मा के तेज से चरण, सूर्य के तेज से अंगुलियाँ, कुबेर के तेज से नाक, प्रजापति के तेज से दांत, अग्नि के तेज से आँखें, और वायु के तेज से उस देवी के कान बने! यही देवी पुराणों मे 'दुर्गा' के नाम से विख्यात हुई! फिर सारे देवताओं ने उस देवी को अपने-अपने अस्त्र देकर महिषासुर से लड़ने के लिये भेजा।

अब यहाँ सवाल यह बनता है कि इतने सारे देवता थे! स्वयं सर्व-शक्तिमान शिव और विष्णु भी थे, फिर आखिर ये सब महिषासुर से लड़ने क्यों नही गये?
क्यों सबने एक महिला को भेजा?
दूसरी बात जिस तरीके से दुर्गा की उत्पत्ति बतायी जा रही है यह तो पूर्णतः अवैज्ञानिक और अप्राकृतिक है।

खैर.. अब आगे बढ़ते हैं, और देखते हैं कि दुर्गा महिषासुर से कैसे लड़ती है?
इसी पुराण के तीसरे अध्याय मे दुर्गा और महिषासुर के युद्ध का विस्तार से वर्णन है! जब दुर्गा महिषासुर से युद्ध कर रही थी तो क्रोध मे आकर वह बार-बार मधु (मदिरा) पी रही थी, और उसको मदिरा का इतना अधिक प्रभाव हो गया था कि उनकी आँखें लाल हो गयी थी तथा बोलते समय उसकी वाणी भी लड़खड़ा रही थी।

अब ये समझ मे नही आ रहा है कि मदिरा पीकर कौन सा युद्ध हो रहा था?
भला युद्धक्षेत्र मे भी कोई मदिरा पीता है?
वैसे दुर्गा यही नही रुकी, इसी अध्याय के श्लोक-38 मे दुर्गा बोलती हैं-
"गर्ज गर्ज क्षणं मूढ मधु यावत्पिबाम्यहम् ।
मया त्वयि हतेऽत्रैव गर्जिष्यन्त्याशु देवताः।।"
अर्थात- हे असुर! जब तक मै मधु पीती हूँ, तब तक तू खूब गरज ले! मेरे हाथों यही तेरी मृत्यु हो जाने पर देवता भी शीघ्र गर्जना करेंगे।

यह श्लोक अपने-आप मे लम्बी कहानी समेटे हुआ है!
कई लोग कहते हैं कि देवी ने युद्ध मे मदिरा नही मधु पिया था! तो मै कहूँगा कि मधु पीने से किसकी जबान लड़खड़ाती है?
मधु पीने से आँखें क्यों लाल होगी?

ये सम्पूर्ण कहानी कुछ और ही है, लेखकों ने बड़ी चतुराई से सच को दबा दिया है! 
या तो ये कहानी पूर्ण काल्पनिक है, क्योंकि दुर्गा और महिषासुर का जन्म प्राकृतिक नही है! या तो इस कहानी को कुछ दूसरा ही रंग दे दिया गया है!
अभी भी बड़ा सवाल यही है कि यदि महिषासुर आतातायी था तो उसे देवताओं ने क्यों नही मारा, क्यों सर्वशक्तिमान देवों के रहते हुये भी एक महिला को शस्त्र देकर उससे लड़ने भेजा गया?

सोचो, सोचो.....
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इन दिनों हर हफ्ते एक-दो मामले ऐसे जरूर आ रहे हैं जब गोमांस (Beef) के कारण किसी ना किसी को मारा जा रहा है!

क्या अब इस देश मे गाय इंसान से अधिक कीमती हो गयी है?

खैर मेरा एक सवाल है कि अगर गोहत्या करने वाला या गोमांस खाने वाला वध करने योग्य है तो नरभक्षी या मानवमांस खाने वाले के साथ क्या करना चाहिये!

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण के पाँचवे स्कन्ध के अध्याय-28/29 (पृष्ठ-376-377) मे लिखा है कि जब देवी दुर्गा (चामुण्डा) असुरों से युद्ध कर रहीं थी तो उन्होने राक्षसों के रुधिर (खून) पिऐ और मृत असुरों के मांस तक खा डाले!

अब इन्ही देवी माँ को सनातनी सात्विक मानकर पूजते है...,माला,फूल और नारियल चुनरी चढ़ाते हैं!
जबकि पुराण मे साफ लिखा है कि इन्होनो मांस खाये......... तो इन्हे सेब,केला और नारियल क्यों चढ़ाया जाता है?

वाह भाई सनातनियों गोमांस खाने वाले को जान से मार रहे हो, और मानवमांस खाने वाले को धूप-दीप से पूज रहे हो..... इन्ही देवी के नाम पर नौ दिन व्रत करते हो!

मेरे इस प्रमाण को कोई इनकार भी नही सकता, क्योकि इस पुराण को नकारने से देवी दुर्गा का अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा, जो भी इस पुराण को नही मानता उसे देवी दुर्गा को भी नही मानना चाहिऐ.......

देवी दुर्गा का किरदार इसी पुराण की देन है!

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गीत गोबिंद जयदेव।

यदि आप महाभारत और हरिवंशपुराण पढ़ो, तो आपको पता चलेगा कि कृष्ण बहुत सुन्दर होने के साथ-साथ अत्यन्त चतुर थे, वेद-शास्त्रों के ज्ञाता और बुद्धि...