पिछले दिनों होली त्योहार के बारे मे कई लोगों ने अपने-अपने विचार दिये कि आखिर होली क्यों मनायी जाती है?
इस पर्व का उद्देश्य क्या है?
यह कैसे प्रारम्भ हुई?
होलिका दहन के बारे मे जो पौराणिक कथा है उसे लगभग सभी जानते हैं, पर उस कथा का न तो कोई ठोस प्रमाण है और न ही वह कथा तार्किक लगती है।
मेरे पास "त्योहारों का रहस्य" नाम की एक किताब है, जिसमे तमाम हिन्दू त्योहारों के बारे मे लेखक (रोशन बौद्ध) ने अपनी राय रखी है।
इस किताब मे होली के बारे मे भी लिखा है! किताब के पृष्ठ-28 पर "होली का रहस्य" नामक शीर्षक मे लिखा है कि प्राचीनकाल मे जब आर्यों और अनार्यों का युद्ध हुआ तो विजेता आर्यों ने अनार्यों को गुलाम बना लिया और अपने हिसाब से इतिहास को लिखना शुरू किया।
लेखक का कहना है कि होलिका के बारे मे जो कथा ब्राह्मणी-ग्रंथों मे लिखी है वह तर्कहीन है, क्योंकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण यही है कि अगर एक जैसी दो वस्तुऐं (होलिका और प्रह्लाद) एक साथ आग मे डाली जायें तो दोनो लगभग साथ ही नष्ट हो जायेगी! फिर होलिका का जल जाना और प्रह्लाद का बच जाना सम्भव ही नही है।
लेखक ने लिखा है कि यूपी मे जो हरदोई नामक जिला है उसका प्राचीन नाम "हरिद्रोही" था! इसका नाम हरिद्रोही इसलिये था क्योंकि यहाँ का राजा हिरण्यकश्यप हरि (विष्णु) का दुश्मन (द्रोही) था।
इसी राजा हिरण्यकश्यप को प्रह्लाद नामक एक पुत्र था, जो हिरण्यकश्यप की गैर-मौजूदगी मे नारद से विष्णु की प्रशंसा सुनकर विष्णु का भक्त हो गया था! यह बात जब हिरण्यकश्यप को पता चली तो उसने प्रह्लाद को यह कहकर फटकार लगायी कि तुम हमारे दुश्मन विष्णु की स्तुति क्यों करते हो?
हिरण्यकश्यप के बार-बार समझाने के बाद भी प्रह्लाद न माना, क्योंकि वह नारद और दूसरें आर्यों के बहकावे मे आकर वैष्णव बन गया था! अन्ततः थक-हारकर हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को अपने महल से निकाल दिया, और अब प्रह्लाद दूसरे विष्णु उपासकों की मित्र-मण्डली बनाकर रहने लगा।
हिरण्यकश्यप की बहन होलिका अपने भतीजे प्रह्लाद से बहुत स्नेह करती थी, अतः वह एक दिन चुपके से अपने आंचल मे खाना छुपाकर प्रह्लाद को खिलाने के लिये गयी। उस दिन फागुन महीने की पूर्णिमा थी, और होलिका का विवाह भी तय हो चुका था तथा अगले ही दिन उसकी बारात आनी थी। होलिका ने सोचा कि कल मै ससुराल चली जाऊँगी, अतः आज आखिरी बार अपने भतीजे से मिल लूँ! यही सोचकर जब वह प्रह्लाद के पास पहुँची तो प्रह्लाद और उसके आंवारा मित्रों ने उसे पकड़ लिया....
होलिका गिड़गिड़ाती रही, फिर भी प्रह्लाद और उसके मित्रों ने पहले उससे दुष्कर्म किया, फिर अपने पाप को छुपाने के लिये होलिका को जलाने का निश्चय किया।
अब समस्या यह थी कि लाश जलाने के लिये इतनी सारी लकड़ियाँ कहाँ से लाये, तब प्रह्लाद और उसके मित्रों ने रात को जहाँ भी लकड़ी मिली, चाहे वह चौकी हो, चारपाई हो, छप्पर हो या ऊपल, जो भी मिला उसे एकत्र करके होलिका को जला डाला।
लेखक का कहना है कि यह परम्परा आज भी जारी ही है, यूँ तो हिन्दूधर्म मे रात को शव जलाना मना है पर आज भी होलिका रात को जलायी जाती है और आज भी उसी तरह होलिका जलाने के लिये ईधन जुटाया जाता है जैसे सदियों पहले प्रह्लाद ने जुटाया था।
अब अगले दिन जब होलिका का होने वाला पति "इलोही" बारात लेकर आया तो उसे पता चला कि होलिका को रात मे ही जला दिया गया। इलोही बदहवास होकर वहाँ पहुँचा जहाँ होलिका जली थी, और वह चिता की राख को इधर-उधर बिखरते हुये रोने लगा। भस्म की धूल को उड़ाने की वजह से ही अगले दिन धूलेड़ी (धूल-उड़ी) का त्योहार मनाया जाता है।
जब हिरण्यकश्यप को यह बात पता चली की उसके अपने ही नालायक बेटे ने उसकी बहन होलिका से दुष्कर्म भी किया और उसे मार भी डाला तो उसने तुरन्त प्रह्लाद को गिरप्तार करवा लिया। हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को दण्ड-स्वरूप उसके माथे पर इस कायराना कृत्य के लिये अ'वीर शब्द (क्योंकि प्रह्लाद का कृत्य वीरों वाला नही था, अतः उसके माथे पर अवीर अर्थात कायर लिखवाया गया) लिखवा दिया।
अवीर लिखने का अर्थ था कि राज्य की जनता ने प्रह्लाद और उसके साथियों के मुँह पर कीचड़, मिट्टी और कालिख जो भी मिलता उसे फेंक देते! बाद मे ब्राह्मणों ने इसी घटना को रूपान्तरित करके एक होलिका का त्योहार बना दिया, और लोग आज बिना जाने-समझे अपने माथे पर "अबीर" का टीका लगवाते हैं।
नोट- यह कहानी भी मुझे उतनी ही बनावटी लग रही है, जितनी की ब्राह्मणों द्वारा लिखी गयी होलिका की पौराणिक कथा है!
इस कहानी की सत्यता का मेरे पास कोई प्रमाण नही है, अतः इस कथा की जिम्मेदारी लेखक रोशन बौद्ध पर ही है। वैसे तो सवाल यह भी है कि यदि ऐसी कथाऐं कोरी-गप्प ही है तो इस तरह की किताबों को लिखने वालों और छापने वालों पर कारवाई क्यों नही होती?
यह किताब दिल्ली के "सम्यक प्रकाशन" ने छापी है, जो बौद्ध और बहुजन साहित्य के काफी बड़े प्रकाशक हैं। इसके लेखक रोशन बौद्ध हैं, जिनका परिचय अन्तिम चित्र मे आपको मिल जायेगा।
यदि किसी मित्र को इससे जुड़ा कोई सवाल करना है तो सम्यक प्रकाशन को खत लिखें, या फिर रोशन बौद्ध को फोन करें।
।। धन्यवाद ।।
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