Saturday, 27 March 2021

सीता, स्त्री, पुत्र।

सीताजी के जन्म के बारे मे आमतौर पर लोग यही जानते हैं कि उनका जन्म भूमि से हुआ था। ऐसा इसलिये माना जाता है क्योंकि वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड सर्ग-66 श्लोक-13-14 मे जनक ने सीता का परिचय देते हुये कहा है कि "एक दिन मै यज्ञ के लिये खेत जोत रहा था, और उसी समय जोती हुई भूमि से एक कन्या प्रकट हुई! पृथ्वी से प्रकट होने के कारण मैने उसका नाम सीता रखा"                 (चित्र-1)

बस इसी एक श्लोक को प्रमाण मानकर बिना तर्क किये इतनी बड़ी अवैज्ञानिक बात को हिन्दुओं ने सच मान लिया। जबकि जनक ने इसके आगे-पीछे धरती से पैदा होने की और कोई भी बात नही की है।

खैर...चलिये आज हम सीता के जन्म पर ही तर्क करते हैं।
सबसे पहली बात तो भूमि के अन्दर से किसी मनुष्य का जन्म लेना अप्राकृतिक और अवैज्ञानिक दोनो है!
दूसरी बात यदि कथानुसार जनक के राज्य मे कई सालों से आकाल (सूखा) पड़ा था, जिसके निवारण के लिये वे यज्ञ-हेतु भूमि जोत रहे थे। अगर यह सच है तो वर्षों तक वहाँ अकाल पड़ने से धरती बंजर होकर बिना पानी के पत्थर जैसी कड़क हो गयी होगी। जब धरती मे नमी थी ही नही तो हल जोता कैसे गया कि हल कि फाल (Coulter) धरती के इतना भीतर गया और सीता पैदा हो गयी?
वास्तव मे पौराणिक लेखकों ने रामायण को सनसनीखेज और चमत्कारी बनाने का प्रयास किया, पर उसका परिणाम यह हुआ कि अब मूल-कथा ही काल्पनिक लगने लगी। अभी तो ठीक है, पर आगे जब हिन्दू समाज शिक्षित होकर रामायण को वैज्ञानिकी तर्को की कसौटी पर कसेगा तो पूरी रामायण को ही काल्पनिक मानकर नकार देगा। भलाई इसी मे हैं कि इसमे से गपोड़ बातें जितनी जल्दी हो सके निकाल देनी चाहिये।

खैर अब बात करते हैं कि सीता वास्तव मे पैदा कैसे हुई?
वाल्मीकि ने रामायण मे कई प्रसंग "गौण" भाव मे लिखे हैं। वाल्मीकि रामायण का सही अर्थ केवल वही विद्वान बता सकता है जो मनुस्मृति का ज्ञाता हो, क्योंकि वाल्मीकि ने बहुत सारी बातें मनुस्मृति के आधार पर अलंकारित करके लिखी है। राजा जनक द्वारा "खेत जोतने" की बात भी ऐसी ही "गौण" भाव मे लिखी गयी है।
मनुस्मृति-9/33 मे एक श्लोक लिखा है-
"क्षेत्रभूता स्मृता नारी बीजभूतः स्मृत पुमान।
क्षेत्रबीजसमायोगात् सम्भवः सर्वदेहिनाम् ।।"
अर्थात- स्त्री को क्षेत्र (खेत) रूप, तथा पुरुष को बीजरूप कहा गया है। खेत और बीज के संयोग से सभी जीवों की उत्पत्ति होती है।           (चित्र-2-3)

इस श्लोक मे मनु ने स्त्री को खेतरूप माना है। बस.. वाल्मीकि ने भी मनुस्मृति के आधार पर ही स्त्री को खेत लिखा है, जिससे यह सारा भ्रम पैदा हुआ।
वाल्मीकि ने जब रामायण लिखा होगा तब उन्होने सोचा भी नही होगा कि आगे ऐसे लोग इसका अनुवाद करेंगे जिन्हे उनके "गौण" भावों का अर्थ निकालना भी नही आता होगा।

मनु ने केवल एक श्लोक मे नही, बल्कि अध्याय-9 श्लोक-34-35-36 और 37 मे स्त्री को खेतरूप ही लिखा है।

असल मे ये सीता के जन्म को लेकर सारी गड़बड़ी एक श्लोक का गलत अर्थ निकालना और उसके बाद पद्मपुराण पातालखण्ड मे इस कहानी को लिखकर और मजबूती दे देना ही है। वैसे पद्मपुराण पातालखण्ड भले ही सीता को भूमि से जन्मी मानता है, पर अन्त मे भूमि मे समाहित होने वाली बात को वह भी नकार देता है।
पद्मपुराण के पातालखण्ड अध्याय-33 मे साफ लिखा है कि जब सीता वाल्मीकि के आश्रम से वापस आयी तब महर्षि अगस्त्य ने सोने की सीता को हटाकर उसकी जगह असली सीता को बैठाया, और राम ने अपना यज्ञ पूर्ण किया। यही नही.... इसी अध्याय मे आगे लिखा है कि उसके बाद राम और सीता ने तीन अश्वमेध यज्ञ और भी किये।      (चित्र-4)
अर्थात.. पद्मपुराण यह नही मानता कि सीता जमीन मे समाहित हो गयी थी।

अब उक्त प्रमाणों से यह बात तो स्पष्ट है कि सीता न तो धरती से पैदा हुई और न ही धरती मे समाई। फिर सोचना यह है कि सीता का जन्म कैसे हुआ, और उनकी माँ कौन थी?
इसका जवाब भी रामायण मे ही है। वाल्मीकि रामायण अयोध्याकाण्ड-118/88 और सुन्दरकाण्ड-28/2 मे सीता ने सुनैना (जनक की पत्नि) को अपनी "जननी" कहा है। अर्थात सुनैना ही सीता की माँ थी...
राजा जनक ने जिस खेत की तरफ इशारा किया है वह कोई और नही बल्कि उनकी पत्नि सुनैना ही थी।

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#माहवारी_का_रहस्य......

औरतों को हर महीने माहवारी का कष्ट झेलना पड़ता है...  पर शायद ये बहुत कम लोग जानते होंगे की माहवारी क्यों आती है! धन्य थे वो हमारे ऋषि-मुनि जिन्होने घोर तपस्या और कठिन साधना करके इसका पता लगाया था!
हमें स्कूलों/कालेजों मे भी झूठ पढ़ाया जाता है, आज मै आपको सच बताऊँगा की माहवारी क्यों आती है,
पहले इन वैज्ञानिकों का झूठ बताता हूँ.......

विज्ञान के अनुसार महिलाओं के अंडाशय में एक अंडा तैयार होता है, जो गर्भाशय की नलिका में पहुंच जाता है,
साथ ही गर्भाशय की अंदरूनी परत में खून जमा होता है ताकि अगर गर्भ बैठ जाए तो उस खून से बच्‍चा विकसित हो सके!
अगर गर्भ नहीं बैठता तो यह परत टूट जाती है और उसमें जमा खून माहवारी के रूप में शरीर से बाहर आता है....
हर महीने फिर गर्भ की तैयारी होती है और यही चक्र चलता है,
अगर किसी माह गर्भ बैठ जाता है तो बच्‍चा गर्भाशय में पलने लगता है और इसीलिए माहवारी आना बंद हो जाती है!

अब मै सत्य बताता हूँ.....   भागवतपुराण के अनुसार आदिकाल मे असुरों और देवों का भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें देवता हार गये! इन्द्र से अपना खोया हुआ स्वर्ग वापस पाने के लिये विष्णुजी से सलाह ली!
विष्णु ने कहा कि किसी ब्रह्मज्ञानी की सेवा करके वरदान अर्जित करो और असुरों को हराओ....

इन्द्र ने एक ब्रह्मज्ञानी की सेवा करनी शुरू कर दी, पर उस ब्रह्मज्ञानी की माँ असुर घराने से थी....   जैसे ही यह बात इन्द्र को पता चली उन्होने उस ब्रह्मज्ञानी की हत्या कर दी!
अब इन्द्र पर ब्रह्महत्या का पाप लग गया....  उसके निदान के लिऐ विष्णु जी ने इन्द्र से कहा कि आप अपने पाप को धरती,पेड़,जल और नारी मे एक-एक चौथाई करके बांट दो....
इन्द्र ने धरती,पेड़,जल और नारी को उनका श्राप लेने के लिये मना लिया......   पर नारी ने बदले मे एक वर मांगा कि मै पुरुषों से अधिक कामशक्ति वाली रहूँ और पुरुषों का उपभोग कर सकूँ......
इन्द्र ने वरदान देकर अपना एक चौथाई पाप महिलाओं को दे दिया....  अब हर महीने जो माहवारी का दर्द महिलाऐं झेलती हैं वो ब्रह्महत्या का एक चौथाई पाप ही है, इससे स्वयं कामाख्या देवी भी नही बची और वो भी हर महीने माहवारी मे होती हैं तथा मन्दिर बन्द करना पड़ता है!

बस ये पता लगाना अभी शेष है कि वो कौन महिला थी जो सारी औरतों की चौधरी बनकर गयी और एक चौथाई पाप को स्वीकार कर लिया!


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#गांधारी_के_सौ_पुत्र....

महाभारत के अनुसार धृतराष्ट्र की पत्नि गांधारी ने सौ पुत्रो को जन्म दिया था, जिन्हे कौरव कहा जाता है!
अब सवाल यह उठता है कि क्या कोई महिला अपने जीवनकाल मे सौ बच्चो को जन्म दे सकती है?

अगर गांधारी ने प्रत्येक बच्चे नौ महीने के अन्तराल मे पैदा किये तो भी सौ पुत्र पैदा करने मे नौ सौ महीने अर्थात 75 साल लगेगे......एक महिला कम से कम 12 वर्ष की उम्र के बाद ही माँ बनने की क्षमता रखती है तो क्या गांधारी 90 वर्ष की उम्र तक बच्चे पैदा कर रही थी!

यह बात ना तो तार्किक और ना ही धार्मिक तौर पर मानने योग्य है!

विज्ञान मानता है कि महिला को कम से कम 10 वर्ष की उम्र मे माहवारी शुरू होती है और 50 वर्ष तक सूख जाती है, जब महिला 18 से 35 वर्ष के मध्य होती है तो उसे 5 से 7 दिनो ऋतुकाल रहता है, पर 35 की उम्र पार होते ही 2 से 3 दिन ही रह जाता है! मतलब साफ है कि 40 की उम्र तक ही महिला के गर्भाशय मे अण्डे तैयार होते है, और इसी उम्र तक पैदा हुये बच्चे स्वस्थ और निरोग होते है.....50 वर्ष की उम्र के बाद हार्मोंस क्षीण हो जाते हैं अतः महिला बच्चो को स्तनपान कराने मे भी सक्षम नही रहती!

अब गांधारी भी एक महिला ही थी, कोई मशीन नही, जिसने अपने जीवन मे 101 बच्चो (एक पुत्री दुश्शाला) को जन्म दिया....  जिसे मानना मुश्किल ही है!

महाभारत ने उसके सौ पुत्रो के जन्म की अलग ही कहानी बताई है जिसे मानना और भी मुश्किल है!
महाभारत के अनुसार व्यास ने गांधारी को सौ पुत्रो का आशीर्वाद दिया था, दो वर्ष गर्भ रहने के बाद गांधारी ने एक लोहे के पिण्ड को जन्म दिया और घबराकर उसे फेकने जा रही थी! तभी व्यास जी ने आकर उसे रोका और उस पिण्ड के सौ टुकड़े करवा कर सौ मटको मे रखवा दिया....  दो वर्ष बाद उन्ही मटको मे से गांधारी के सौ पुत्र पैदा हुऐ!

इस बात पर तो कोई भी विश्वास नही करेगा, मतलब स्पष्ट है कि गांधारी के सौ पुत्रो वाली कहानी सिर्फ गढ़ी गयी है! वैसे भी द्वैपायन व्यास ने पूर्वकाल मे महाभारत मे 8 हजार श्लोक ही लिखे थे, जो आज बढ़कर लाखो हो गये है, तो सम्भव है कि ये बात भी झूठी ही हो।

वैसे जब से मैने पढ़ा है कि दुर्योधन और उसके 99 भाई मटके से पैदा हुये थे, तब से मेरा मानसिक संतुलन धर्मग्रंथों पर और भी खराब हो गया!

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महेश शर्मा ने जब मोर के आंसू वाली बात कही तो सोशल मीडिया पर उनकी खूब खिचाई हुई..........
असल मे ब्रह्मपुराण मे लिखा है कि मोरनी मोर के आंसू पीकर गर्भ धारण करती है, क्योकि मोर ब्रह्मचारी होता है!
यह बात शर्मा जी के दिमाग पर हावी थी सो उन्होने कह दी....

अब मै महाभारत से एक ऐसी ही बात बता रहा हूँ.....  
कश्यप ऋषि की तेरह पत्नियाँ थी, उन्होने ही समस्त जीव-जन्तुओं को जन्म दिया था (इस पर मैने पूर्व मे पोस्ट की थी) उनकी दो पत्नियो के नाम कद्रु और विनता थे....
कद्रु से सांप और विनता से अरुण तथा गरुण का जन्म हुआ था!

कश्यप ऋषि की ये दोनो पत्नियाँ जब गर्भवती हुई तो इन्होने बच्चो को जन्म नही दिया, बल्कि कद्रु ने एक हजार और विनता ने दो अंडे दिये थे.......  उन अंडो को दासियों ने प्रसन्न होकर गर्म बर्तन मे रख दिया जिसमे से कद्रु के हजार नाग,सांप और तक्षक पैदा हुये!
पर विनता के अंडे मे से बच्चे नही निकले तो उन्होने जल्दबाजी मे खुद एक अंडा फोड़ दिया, जिसमे वरुण देव थे.....
वरुण को बहुत गुस्सा आया...    और बोले कि तुमने मुझे समय से पहले अंडा फोड़कर बाहर निकाला इसलिये मै तुम्हे श्राप देता हूँ सैकड़ो वर्षो तक तुम अपनी सौतन की नौकरानी रहोगी....

अब जरा विचार करो कि अगर महिलाऐं उस काल अंडे देती थी और बच्चा अंडे से निकलकर माँ श्राप देता था, तो मोरनी वाली बात भी आश्चर्यजनक नही हो सकती।

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गीत गोबिंद जयदेव।

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