Saturday, 27 March 2021

अवेस्ता।

मेरी अवेस्ता वाली पोस्ट पर एक भाई पूँछ रहे थे कि क्या अवेस्ता मे राम के बारे मे कुछ लिखा है?
मै उन्हे बताना चाहता हूँ कि अवेस्ता मे राम का नाम कई बार आया है। अवेस्ता के एक अध्याय मे जब पारसियों के ईश्वर अहुर मज्दा अपने पुत्रों (पारसियों) को सम्बोधित करते हैं तो कहते हैं कि "पोऊरु खाथ्रेम बवाहि यथ रामनो"
अर्थात- राम की तरह पूर्ण क्षत्रिय हो जाओ। (पृष्ठ-424, चित्र-1)

यही नही, जब पारसियों की शादी होती है तो पारसियों मे भी शादी-विवाह लगभग हिन्दू रीति-रिवाजों जैसा ही होता है! हिन्दू भी अग्नि को पवित्र मानते हैं और पारसी भी। जब पारसियों की शादियाँ होती है तो शादी सम्पन्न होने के बाद लोग अवेस्ता के ही जिंद (मंत्र) पढ़कर वर और वधू को आशिर्वाद देते हैं।
जहाँ लोग वर को आशिर्वाद देते समय कहते हैं कि "सदैव दीनशील हो, जरथुस्त्र की शिक्षाऐं ग्रहण करो, ऐसे ही आगे चलकर वर को आशिर्वाद देते हुये कहते हैं कि "रामः शाश्वतं आनन्दं" अर्थात राम की तरह सबको आनन्दित करो। (संस्कृत संस्करण अवेस्ता, पृष्ठ-515, चित्र-2)

अवेस्ता इतिहासकारों के अनुमान से लगभग 3,500 साल पुरानी किताब है, अतः इसमे राम का वर्णन होना यह बताता है कि यह किताब राम के बाद लिखी गयी।
दूसरा आश्चर्य तो यह है कि इसमे कृष्ण का नाम नही है! शायद कृष्ण का जन्म अवेस्ता के बाद हुआ हो....

उदाहरण के लिये जैसे रामायण मे कृष्ण का जिक्र तक नही है, पर गीता मे राम का नाम आता है। स्वयं कृष्ण ही अर्जुन से कहते हैं कि " हे पार्थ! मै सभी शस्त्रधारियों मे राम हूँ" (गीता-10/31)

अवेस्ता मे राम का नाम आना इस बात का ठोस प्रमाण है कि किसी समय भारत और ईरान की सभ्यताऐं एक ही थी!


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मुझे अक्सर अलग-अलग धर्मों के ग्रंथों को पढ़ने की बहुत रुचि है। इसी कड़ी मे काफी दिनों से मेरी इच्छा पारसी धर्मग्रंथ "अवेस्ता" को पढ़ने की थी।
अवेस्ता एक प्रकार से लुप्त किताब है, क्योंकि पारसी धर्म भी दुनिया मे लगभग समाप्त ही हो गया है।
पारसी इस समय दुनिया की माइक्रो मॉइनोरिटी मानी जाती है, जो भारत के गुजरात और महाराष्ट्र मे अभी भी मिलते हैं।

अवेस्ता को खोजते हुये मुझे गुजराती लिपि की काफी प्राचीन किताब मिली, जो 1880 मे प्रकाशित हुई थी।

वैसे लगभग सभी को यह पता ही है कि पहले ईरान मे पारसीधर्म था, बाद मे मुसलमानों के अतिक्रमण ने पारसियों और उनके धर्म को कुचल दिया, तथा कुछ पारसी किसी तरह अपनी जान बचाकर भारत (गुजरात) आ गये।

खैर, अब आते हैं अवेस्ता पर...
अवेस्ता की लेखनशैली वेदों से इतनी मिलती है कि आप यदि एक बार अवेस्ता पढ़ो तो आपको भ्रम हो जायेगा कि आप ऋगवेद ही पढ़ रहे हो! अवेस्ता मे वेदों की तरह ऋचायें तो हैं ही साथ ही इन्द्र, चन्द्र और मित्र जैसे देवताओं के नाम भी हैं।

यही नही, अवेस्ता मे चातुष्यवर्ण व्यवस्था भी है जो ऋग्वेद के पुरुषसूक्त मे भी लिखी है।
अवेस्ता के एक अध्याय जिसे "आफरीन अषो जरथुस्त्र" कहते हैं, उसमे लिखा है कि अवेस्ता का ईश्वर (अहुर मज्द) जरथुस्त्र (पारसी धर्म के प्रवर्तक) से कहते हैं कि "हमारे दस पुत्र हुये! उनमे से तीन अर्थवान (अथर्वऋषि जैसे ज्ञानी अर्थात ब्राह्मण) तीन रथेस्टार (क्षत्रिय) तीन वास्त्रेय (व्यापारी अर्थात वैश्य) हुये, और दसवां पुत्र हुतोक्ष (कुशल कारीगर अर्थात शूद्र) हुआ।
हांलाकि पारसियों के ईश्वर अहुर मज्द ने दसवें पुत्र की बहुत प्रशंसा भी की है और कहा कि मेरा यह पुत्र चन्द्रमा जैसा प्रकाशवान, अग्नि जैसा चमकदार, इन्द्र की तरह शत्रुओं का दमन करने वाला और राम की तरह आदरणीय होगा।"

अवेस्था कि वर्णव्यवस्था ठीक वेदों जैसी ही है, बस वैदिक-वर्णव्यवस्था मे शूद्र को निम्न दिखाया गया है, जबकि अवेस्ता का ईश्वर शूद्र को ही सबसे अधिक प्रेम करता है।

अब यहाँ सवाल यह उठता है कि अवेस्ता वेदों से इतनी अधिक मिलती कैसे है?
क्या वेदों की नकल करके अवेस्ता बनी, या अवेस्ता की नकल करके वेद बने?
वैसे भी ज्योतिबा फुले ने बहुत पहले अपनी किताब "गुलामगीरी" मे यह दावा किया था कि आर्य ईरान से भारत आये थे, जबकि दयानन्द सरस्वती का मानना था कि आर्य भारत से दूसरे देश जैसे कि ईरान वगैरह मे गये।
सच जो भी हो, पर वैदिकधर्म और पारसीधर्म का कहीं न कहीं गहरा सम्बन्ध जरूर हैं!

आज के बामसेफी भी यही कहते हैं कि ईरान से आर्यों की तीन जातियाँ (अथर्वा, रथाइस्ट और वस्तारिया) भारत मे आये!
रामायण की भी माने तो राजा दशरथ की पत्नि कैकेयी ईरान की ही थी। वही पुरातन शोधकर्ताओं की माने तो ब्रह्मा भी ईरान के एक प्रदेश (प्राचीन सुषानगर) के थे।

वैसे सच चाहे जो भी हो, पर भारतीय आर्यो और ईरानी आर्यों का गहरा सम्बन्ध जरूर है। अवेस्ता मे तो ईरान का प्राचीन नाम "अइर यान वेज" अर्थात "आर्यों का देश" बताया भी गया है।


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गीत गोबिंद जयदेव।

यदि आप महाभारत और हरिवंशपुराण पढ़ो, तो आपको पता चलेगा कि कृष्ण बहुत सुन्दर होने के साथ-साथ अत्यन्त चतुर थे, वेद-शास्त्रों के ज्ञाता और बुद्धि...