Friday, 26 March 2021

जातियां।

हिन्दुवादी लोग अक्सर यह शोर मचाते हैं कि ईसाई मिशनरी वाले धन के माध्यम से भील, कोल, मुण्डा, गोण्ड और नागा जैसी जनजातियों का धर्म परिवर्तन करवाते हैं.... तो भाई, सोचना यह है कि क्या भारत के मुसलमान लखपति या करोड़पति हैं... आखिर मिशनरी वाले उनका धर्मपरिवर्तन क्यों नही करवा पाते?
मतलब साफ है कि हिन्दूधर्म मे ही कमी है, जो हिन्दू खुद ही अपना धर्मपरिवर्तन कर लेते हैं।

अब सोचना यह है कि हिन्दूधर्म मे कमी कहाँ है?
मेरी समझ से सबसे बड़ी कमी है "जातिवाद"

जी हाँ जातिवाद.... जातिवाद किसने बनायी? 
कब बनाई?
कैसे बनायी?
कहाँ बनायी?
यह सारी बातें पीछे छूट चुकी हैं, पर इसे खत्म करने का कितना प्रयास किया गया, यह बात महत्वपूर्ण है?

सबसे पहली बात तो हर हिन्दू अपनी जाति पर थोड़-बहुत गर्व जरूर करता है! क्षत्रिय सोचता है कि मै भले ही ब्राह्मण से नीचे हूँ, पर वैश्य से ऊपर हूँ। वैश्य सोचता है कि मै भी सवर्ण हूँ और शूद्रों से ऊपर हूँ, और सबसे गयी-गुजरी स्थिति तो तथाकथित शूद्रों की हैं! यादव सोचता है कि मै कृष्ण का वंशज हूँ और कुम्हार/केवट जैसी जातियों से ऊपर हूँ, कुम्हार सोचता है कि मै पासी-चमार से ऊपर हूँ, चमार सोचते हैं कि मै भंगियों से ऊपर हूँ...
मतलब इसी काल्पनिक गर्व हर कोई अपनी जाति सुरक्षित रखना चाहता है! वैसे जातिवाद को मजबूत करने का काफी काम जातिगत आरक्षण ने भी कर दिया।

जातिवाद का सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि इसने हिन्दूसमाज को धड़ो-धड़ो मे बाँट दिया, जो शायद कभी एक न हो सके।
संत रैदास ने भी कहा था-
"जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात।
रैदास मनुष ना जुड़ सके, जब तक जाति न जात।।"

जातिवाद का दूसरा बड़ा नुकसान यह था कि लोगों ने अपनी ही जाति मे शादी/व्याह भी करना शुरू कर दिया था, जिससे अच्छी संतान भी पैदा न हुई।

संतराम बी. ए. जी कहते थे कि भारत के गुलामी की मूलजड़ एकजातीय-विवाह ही था। उनके अनुसार ब्राह्मण बुद्धिमान तो होता था, पर वृथाभिमानी भी होता था, और क्षत्रिय निडर होने के साथ-साथ अविवेकी होता था। यदि इन दोनों की संतान आपस मे विवाह करती तो उनसे क्षत्रिय की वीरता और ब्राह्मणों की बुद्धिमत्ता वाली संतान पैदा होती।

             वर्णसंकर संतान वास्तव मे अपने जनक से कहीं अधिक ओजवान होती है, गधा और घोड़ी के मिलन से खच्चर पैदा होता है जो उन दोनो की प्रजाति से अधिक मजबूत, बलवान और मेहनती होता है। आक्सीजन और हाइड्रोजन जैसे दो भिन्न गुण वाले पदार्थ के मेल से जीवनदायी जल बनता है!

यही नही, यदि पौराणिक भारत का अध्ययन करें तो वहाँ भी वर्णसंकर संतान बहुत ही ओजस्वी हुई हैं।
जमदग्नि (ब्राह्मण) और रेणुका (क्षत्रिय) के पुत्र परशुराम महापराक्रमी थे!
शकुन्तला (ब्राह्मण) और दुष्यन्त (क्षत्रिय) के पुत्र भरत चक्रवर्ती राजा था, जिसके नाम पर हमारे देश का नाम "भारत" पड़ा!
भीमसेन (क्षत्रिय) और हिडिम्बा (राक्षसकुल) का पुत्र घटोत्कक्ष महाबलशाली था!
(अब यहाँ कोई यह मत कह देना कि भारत के राजीव गाँधी और इटली की सोनिया गाँधी की वर्णशंकर संतान राहुल गाँधी ऐसे क्यों है? तो मै बता दूँ कि वे इस मामले मे अपवाद हैं।)

खैर.. भारत मे मनु ने गैरवर्णीय विवाह को प्रतिलोम विवाह घोषित कर दिया, जिससे लोगों ने अपने वर्ण और जाति मे ही विवाह करना शुरू कर दिया।
मुगल सम्राट अकबर ने भी हिन्दू राजपूतों को मुसलमान लड़कियाँ दिलाने का यत्न किया था, पर राजपूतों ने उनसे विवाह करने से मना कर दिया था ताकि उनकी जाति भ्रष्ट न हो जाये।

संतराम जी कहते थे कि अपनी ही जाति मे शादी करना अपनी बहन से शादी करने जैसा ही है, और एक ही जाति मे शादी करने से संतान भी विकसित नही होती।

            भारत लड़ाइयों मे इसलिये नही हारता था कि उसके सैनिक पराक्रमी नही थे, बल्कि इसलिये हारता था क्योंकि उसके सेनानायक अयोग्य थे। सेनापति मे क्षत्रिय की वीरता और ब्राह्मण की दूरदर्शिता होनी चाहिये थी, जो कि स्वजातीय-विवाह की वजह से नही हो पायी। यदि ब्राह्मण-क्षत्रिय आपस मे शादी करते तो उनकी संतानों मे यह गुण जन्मजात होते। क्षत्रियों ने अच्छे लड़ाके तो पैदा किये, पर अच्छे सेनानायक नही पैदा कर पाये, शायद इसीलिये महाराजा रणजीत सिंह अपनी सेना के लिये फ्रेंच सेनापति रखते थे।

उदाहरण के लिये देखिये, अंग्रेजों ने पहले यूपी के पुरबियों की सेना बनाकर सिखों को हरा दिया, और फिर 1857 मे सिखों की सेना बनाकर उन्ही पूरबियों को हरा दिया।
कहने का अर्थ यह कि जिस सेना का सेनानायक अंग्रेज होता था, वह सेना युद्ध जीत जाती थी, क्योंकि लड़ाई जीतने के लिये शारीरिक बल अर्थात क्षत्रित्व ही नही, दीर्घदर्शिता अर्थात ब्राह्मणत्व भी चाहिये, और यह गुण अंग्रेजों के पास भरपूर था।

तथागत गौतम बुद्ध ने भी कहा था-
"समान प्रसवात्मिका जातिः"
अर्थात- जिनका प्रसव एक समान हो, वे सब एक ही जाति हैं।

        ....... हिन्दुओं के पास अभी भी समय है, चेत जायें और इस जाति-पात के कुचक्र से बाहर निकल लें, अन्यथा ईसाइयों को कोसने या मुसलमानों को गाली देने से कुछ नही होगा, और आने वाले समय मे कई और कश्मीर तथा नागालैण्ड भारत मे बन जायेंगे।

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