राहुल सांकृत्यायन।
डॉक्टर अम्बेडकर।
■■■■■■
वैसे यहूदी और अरबी दोनो ही खुद को इब्राहिम का वंशज मानते हैं। यहूदी खुद को इब्राहिम के बेटे इसाक (इसहाक) का तो अरबी खुद को इब्राहिम के दूसरे बेटे इस्माएल (इस्माइल) का वंश कहते थे।
मोहम्मद भी खुद को इस्माएल का ही वंशज बताते थे... पर अब समस्या यह थी कि यहूदियों की किताब तोरह मे पहले ही यहूदियों की श्रेष्ठता बतायी गयी थी।
यहूदियों के ईश्वर यहोवा ने तोरह मे कहा था कि "मै अपनी वाचा इसाक के साथ सिद्ध करूँगा, जो अगले वर्ष सारा (इब्राहिम की पत्नि) से उत्पन्न होगा (उत्पत्ति 21:13)
इसी किताब मे अरबियों के पूर्वज अर्थात इस्माएल को दासी का पुत्र कहकर अपमानित भी किया गया है।
यहाँ तक कि यहोवा इस्माएल को इब्राहिम का पुत्र भी नही मानता, बस यह कहता है कि वह तुम्हारे वीर्य से पैदा हुआ है-
"दासी हगर (हाजिरा) के पुत्र से भी मै एक जाति पैदा करूँगा, क्योंकि वह तेरा (इब्राहिम) वंश है" (उत्पत्ति 21:13)
तोरह की उक्त आयत साफ दर्शाती है कि इस्माएल के वंश को यहोवा केवल इसलिये बढ़ाता है, क्योंकि वह इब्राहिम से पैदा हुआ था। अर्थात यहाँ यहोवा सीधा-सीधा इसाक को वरीयता देता है।
यहोवा यही नही रुका, वह यहूदियों को प्रोत्साहित करने के लिये आगे कहता है "तू परमेश्वर यहोवा कि पवित्र प्रजा है, यहोवा ने पृथ्वी भर के सब देशों के लोगों मे से तुमको चुना है" (व्यवस्था विवरण 7:6)
अल्लाह बने मोहम्मद यही नही रुके, उन्होने अपने पूर्वज इस्माएल की श्रेष्ठता साबित करने के लिये एक और चाल चली...
इब्राहिमी परम्परा के अनुसार एक बार ईश्वर (यहोवा/अल्लाह) ने इब्राहिम से कहा था कि तुम्हे जो चीज सबसे अधिक प्रिय हो, तुम उसकी कुर्बानी दे दो।
अब इस कहानी को तोरह (बाइबल) मे लिखा है कि इब्राहिम ने यहोवा के आदेश पर अपने सबसे प्रिय पुत्र इसाक को कुर्बान करना चाहा था! अब चूःकि इसाक यहूदियों के पूर्वज थे, अतः यह बात मोहम्मद को पसन्द नही आयी और उन्होने कुरान मे इस कथा को उलट दिया!
इससे स्पष्ट है कि मोहम्मद ने आज से चौदह सौ साल पहले यहूदियों और मुसलमानों मे जो आग लगायी थी, वह आज भी जल रही है।
यहूदी जब पूरी दुनिया मे प्रताड़ित होने के बाद अपने राजा डेविड (दाउद) की नगरी (इजराइल) मे आकर बस गये तो मुसलमानों से उनका संघर्ष शुरू हो गया। आज भी अधिकांश मुस्लिम देशों ने इजराइल को स्वीकार नही किया है! मुसलमानों मे यह भावना है कि जो इजरायल और यहूदियों का जितना बड़ा दुश्मन होगा, वह इस्लाम का उतना बड़ा प्रहरी समझा जायेगा। शायद इसीलिये आज भी पाकिस्तान के पासपोर्ट पर लिखा होता है "Not valid for Israel"
यहूदियों के द्वारा स्वयं को इब्राहिम का वैध-वंशज बताना और उनकी जातीय-उच्चता के दावे उस समय मोहम्मद को सहन नही थे, जिसका परिणाम अरब-यहूदी संघर्ष का मूल बना।
दुनिया के अन्य मुसलमान (जैसे भारतीय महाद्वीप) इस संघर्ष मे इसलिये कूदे हैं क्योंकि ये भी खुद को अरबियों का पिछलग्गू ही मानते हैं, और दूसरी बात इनकी धार्मिक भावना भी है। जबकि दूसरी सच्चाई यह है कि अरबी भी मोहम्मद के जैसे इतने बड़े नस्लवादी हैं कि वे भी अरब के बाहर के अन्य मुसलमानों को अपने से हीन ही समझते हैं।
........... अनवर शेख लिखित किताब "इस्लाम: अरब साम्राज्यवाद" पर आधारित!
No comments:
Post a Comment