अगर राम का नाम लिख देने से पत्थर पानी मे तैर रहे थे तो फिर वानरो और भालुओं पर भी राम-राम लिखकर समुद्र मे उतार देना चाहिये था! यदि राम नाम के प्रभाव से पत्थर नही डूबे तो फिर वे भी न डूबते और ऐसे ही समुद्र पार कर लेते तथा पुल बांधने की जरूरत भी न पड़ती।
अगर नल और नील जिस चीज को छूकर पानी मे फेंक देते थे वो डूबती नही थी, तो फिर वानरों और भालुओं को भी नल-नील छूकर समुद्र मे फेंक देते और वो भी बिना डूबे समुद्र पार कर लेते।
सोचो.. यदि राम के पास ऐसे दो-दो विकल्प थे तो उन्हे क्या जरूरत थी पुल बनाने की?
पहली बात जो लोग समझते हैं कि राम-राम लिखने से पत्थर पानी मे नही डूबे थे, तो यह केवल किदवंती मात्र है!
इस बात के कहीं भी कोई प्रमाण नही है, यह गंजेड़ी-भंगेड़ी बाबाओं द्वारा बनायी गयी गप्प है जो अब बहुत प्रचलित हो गयी है।
दूसरी बात नल-नील के छूने वाली है, जो तुलसीदास की दिमागी उपज है! बाबा तुलसी ने रामचरित मानस सुन्दरकाण्ड-59 मे लिखा है-
"नाथ नील नल द्वौ भाई।
लरिकाई रिषि आसिष पाई।।
तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे।
तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे।।"
अर्थात- समुद्र राम से कहता है कि हे नाथ! आपकी सेना मे नल और नील दो भाई है, जिन्हे लड़कपन मे क्रोध मे आकर एक ऋषि ने आशिर्वाद दिया था कि उनके स्पर्श से भारी पहाड़ भी जल मे डूबेंगे नही।
बस तुलसीदास की यह काल्पनिक बात इतनी प्रचारित हुई कि लोगो ने सोचा भी नही कि क्या यह सम्भव है?
क्या ऐसा हो सकता है कि कोई ठोस वस्तु पानी मे डालो और वह डूबे नही?
असल मे तुलसीदास जबरन राम को भगवान और चमत्कारी पुरुष बनाने पर उतारू थे, और यह सब उसी कड़ी का एक हिस्सा था। लेकिन सच मे ऐसा कुछ भी नही हुआ था..
वाल्मीकि ने रामायण युद्धकाण्ड सर्ग-22 श्लोक-45-70 मे साफ लिखा है कि न तो कोई पत्थर तैरा और न ही किसी पत्थर पर राम का नाम लिखा गया।
वाल्मीकि लिखते है कि समुद्र ने राम से कहा कि सौम्य! आपकी सेना मे जो नल नामक वानर है, वह विश्वकर्मा का औरसपुत्र है और शिल्पकर्म मे अपने पिता जैसा ही निपुड़ है!
यहाँ यह समझना चाहिये कि नल को एक इंजीनियर जैसा बताया जा रहा था, जिनके पास शिल्पकर्म की योग्यता थी।
फिर राम ने नल से पुल बांधने के बारे मे पूँछा कि क्या यह सम्भव है?
नल ने कहा कि प्रभु मै समुद्र पर पुल बांधने मे समर्थ हूँ, अतः सब वानर आज ही कार्य प्रारम्भ कर दे।
अब जरा श्लोक-55-57 ध्यान से पढ़े! यहाँ लिखा है कि वानर बड़े-बड़े पत्थरों और वृक्षों को उखाड़कर समुद्र मे डाल रहे थे। वे साल, अश्वकर्ण, धव, बाँस, कुटज, अर्जुन, ताल, तिलक, तिनिश, बेल, छितवन, कनेर, आम और अशोक आदि वृक्षों से समुद्र पाटने लगे।
इन तीनों श्लोकों मे साफ दर्शाया गया है कि पत्थरों और विभिन्न प्रकार के पेड़ों से वानर समुद्र पाट रहे थे!
वैसे हमे यह भी ज्ञात रहना चाहिये कि ये कोई आज की नही बल्कि साढ़े सात हजार साल पुरानी घटना है! तब से लेकर अब तक दुनिया की भौगोलिक स्थिति बहुत बदली है।
सम्भवतः उस समय समुद्र इतना गहरा न रहा होगा, क्योंकि वैज्ञानिक भी मानते हैं कि समुद्र का जलस्तर पहले की अपेक्षा ऊपर हुआ है, और अभी भी लगातार बढ़ रहा है! शायद उसी का परिणाम है कि द्वारिका जैसे नगर समुद्र मे डूब गये, और जिसके अवशेष अभी भी समुद्र मे हैं।
वाल्मीकि आगे लिखते है कि कुछ वानर सूत पकड़े थे तो कुछ नापने के लिये दण्ड पकड़े थे तथा वे काष्ठों द्वारा भिन्न-भिन्न स्थानों पर पुल बांध रहे थे।
वे वानर दानवों की तरह पहाड़ उठाकर समुद्र मे फेंक रहे थे और इसी तरह उन्होने पहले दिन चौदह योजन, दूसरे दिन बीस योजन, तीसरे दिन इक्कीस योजन, चौथे दिन बाइस योजन तथा पांचवे दिन तेइस योजन पुल बनाया! इस तरह सारे वानरों ने मिलकर पाँच दिनों मे सौ योजन लकड़ी और पत्थर का पुल बनाया। लेकिन पूरे रामायण मे वाल्मीकि ने यह कहीं नही लिखा है कि पत्थर तैर रहे थे, या वानरों ने पत्थर पर राम का नाम लिखा।
ये सब झूठी और अप्रमाणिक बातें हैं, जो केवल राम का महिमा-मण्डन करने के लिये गढ़ी गयी।
सच यही है कि राम कोई ईश्वर नही थे, वह भी सामान्य मनुष्यों जैसे ही एक मानव थे।
हाँ.. जो लोग अभी भी तुलसीदास को बुद्धिमान समझते हैं, मै उन्हे तुलसीदास से भी बड़ा मूर्ख मानता हूँ।
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वाल्मीकि के बारे मे एक चौपाई कही जाती है, जो निम्न है-
"उलटा नाम जपत जग जाना।
वाल्मीकि भए ब्रह्म समाना।।"
अर्थात- एक किवदंती के अनुसार वाल्मीकि ने राम के उल्टे नाम, अर्थात "मरा-मरा" का जाप करके ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति कर ली थी।
इस बेतुके और बेबुनियाद पाखण्ड पर कुछ लिखने से पहले मै पहले यह बता दूँ कि यह पागलपन वाली कहानी आयी कहाँ से?
संक्षिप्त भविष्यपुराण (गीताप्रेस) प्रतिसर्गपर्व-चतुर्थखण्ड, अध्याय-198 (चित्र-1-3) मे एक कथा लिखी है। कथानुसार प्राचीन काल मे मृगव्याध नामक एक अधम ब्राह्मण था, जो मार्ग मे आवागमन करने वाले यात्रियों को लूटता था। वह यात्रियों को मार भी डालता था, और खासकर ब्राह्मणों की हत्या करने मे उसे अधिक आनन्द आता था।
एक बार उसने सप्तऋषियों को मारने के लिये रोक लिया! तब ऋषियों ने उसे समझाया कि तुम जीवहत्या करके जो महापाप कर रहे हो, उसे भरेगा कौन?
मृगव्याध ने कहा कि मै और मेरे परिवार वाले...
तब ऋषियों ने कहा कि तुम अपने परिवार वालों से पूँछकर आओ कि वे तुम्हारे पाप मे भागी होंगे?
जब मृगव्याध ने यह बात अपने परिजनों से पूँछा तो उन्होने यह कहकर पाप मे भाग लेने से मना कर दिया कि हमारा पालन-पोषण करना तुम्हारा धर्म है, फिर हम तुम्हारे पाप मे भागी क्यों बने?
अब मृगव्याध को बड़ी ग्लानि हुई, और वह उन्ही ऋषियो के पास आकर अपने पाप के प्रायश्चित का मार्ग पूँछने लगा।
तब ऋषियों ने कहा कि तुम "राम-राम" का जाप करो।
अब मृगव्याध ने इतने अधर्म किये थे कि वह राम-राम न कह सका, पर मरा-मरा कहता रहा और इसी से वह पापहीन होकर ब्रह्मऋषि बन गया।
अब इस कहानी को समझने का प्रयास करते हैं।
सबसे पहले तो सवाल यह है कि राम के नाम मे ऐसा क्या प्रभाव था कि उसे जपने से कोई ब्रह्मऋषि बन जाये?
यदि राम का नाम सचमुच इतना प्रभावी था तो दशरथ राम-राम करते ही क्यों मर गये?
आज के भाजपाई नेता रोज राम-राम चिल्लाते हैं, उनमे से कितने ऋषि बने?
सबसे पहले तो यह समझना होगा कि राम के पास या उनके नाम मे कोई चमात्कारी शक्ति नही है।
कहने को तो राम ने अपने चरणों के स्पर्श से अहिल्या को पापहीन कर दिया था, फिर वे उसी चरणों से छूकर सीता को पवित्र क्यों नही कर पाये?
क्यों उन्हे वन मे भेजा?
यदि राम के नाम का उल्टा जाप करने से एक महापापी ब्रह्मऋषि बन जाता है तो दशरथ तो रोज अपने बेटे (राम) को राम-राम करके बुलाते होंगे, फिर वे श्रवणकुमार के पिता के श्राप से मुक्त क्यों नही हुये।
तर्क तो ऐसे दर्जनों किये जा सकते हैं! हाँ.. सोचना यह है कि आखिर किस अभिप्राय से पण्डे-पुरोहितों ने ऐसी कथा को प्रचारित किया।
दरअसल पण्डों ने भारत के भोलेभाले हिन्दुओं के दिमाग को अपने पंजे मे जकड़ने के लिये ऐसी काल्पनिक कथाऐं रची! यह कोई इकलौती कथा नही है, रामचरित मानस के अन्त मे गीताप्रेम ने तुलसीदास की जीवनी छापी है, जिसमे लिखा है कि जब तुलसीदास पैदा हुये तो वे रोये नही, बल्कि उनके मुँह से "राम" शब्द निकला था।
सोचो... कितना बड़ा झूठ कितनी आसानी से लिख दिया गया है।
चलो.. एक बार मान लेते हैं कि तुलसीदास पर राम की बड़ी कृपा थी और वे पैदा होते ही राम-राम करने लगे, तो भाई...मरा-मरा करके वाल्मीकि ब्रह्मज्ञानी हो गये, और राम-राम करके तुलसीदास मूर्ख ही क्यों रहे?
उन्हे सांप और रस्सी के बीच का फर्क नही पता चलता था, और यही नही, वे जीवन भर इधर-उधर ठोकरे खाते रहे।
आपको इसी तरह से ये जो झूठी कहानियाँ गढ़कर राम नाम की घूँटी पिलाई जाती है, पण्डों को इसके बड़े दूरगामी परिणाम होते हैं।
आपके भीतर जो राम नाम का पदार्थ भरा है, पण्डे बड़ी होशियारी से उसका दोहन करते हैं। कभी वे पुरोहित बनकर आते है तो आपके धन पर डाका डालते हैं, तो कभी संघी/भाजपाई बनकर आते है और आपकी वोट पर डाका डालते हैं।
राम नाम की उसी घूँटी का ही असर है कि इतनी सारी मन्दी, बेरोजगारी और मँहगाई के बाद भी भाजपा की लोकप्रियता कम नही हो रही है, क्योंकि भाजपाई धार्मिक माफिया हैं, जो समय-समय पर राम नामी मादक पदार्थ हिन्दुओं को पिलाते रहते हैं।
राम या राम के नाम से न तो पहले हमारे पूर्वजों का भला हुआ और न ही आज हमारा कुछ भला होने वाला।
किसी ने सच ही कहा था-
"राम नाम जपना।
पराया माल अपना।।"
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