Saturday, 27 March 2021

श्रीकृष्ण।

पुराणों मे जिस महापुरुष की सर्वाधिक इज्जत उतारी गयी है वह है "श्रीकृष्ण" 
श्रीकृष्ण से पौराणिक न जाने क्यों इतने चिढ़े थे कि उनके साथ-साथ उनके परिवार वालों पर भी आक्षेप लगाने से नही चूके...
पहले रासलीला की अश्लीलता से कृष्ण को बदनाम किया, फिर उनके पुत्र साम्ब से उनकी तमाम पत्नियों के सम्बन्ध बताकर उनके परिवार पर भी लांक्षन लगा दिया!

मत्स्यपुराण जहाँ स्पष्ट कहता है कि कृष्ण के पुत्र साम्ब के सम्बन्ध उनकी पत्नियों से थे, तो वही वराहपुराण अध्याय-120 मे लिखा है कि एक बार नारद कृष्ण के पास आये और बोले कि प्रभु मै आपको एकान्त मे कुछ बताना चाहता हूँ। आपके नवयुवक पुत्र साम्ब से आपकी पत्नियों को क्षोभ है, और वो उसको देखकर भी क्षुब्ध हो जाती है!
हे प्रभु! इस कारण सत्यलोक मे आपकी बड़ी निन्दा हो रही है!
नारद ने यह भी कहा कि आप अगर चाहो तो साम्ब और अपनी पत्नियों को बुलाकर इसका परीक्षण भी कर लो...
कृष्ण ने नारद की बात मान ली, और अपनी पत्नियों तथा साम्ब को अपने पास बुलाया! इसके बाद कृष्ण ने देखा कि उनकी पत्नियाँ उनके सामने ही साम्ब को देखकर मतवाली होने लगी!
फिर क्रोध मे आकर कृष्ण ने अपने ही पुत्र साम्ब को श्राप दिया कि तू अभी रूपहीन हो जाये, तुझे कुष्ठरोग हो जाये।

यही कथा जरा विस्तार से भविष्यपुराण (हिन्दी साहित्य प्रकाशन, प्रयाग) ब्रह्मपर्व, अध्याय-73 श्लोक-8-46 मे मिलती है!
एक दिन की बात है, नारद ने कृष्ण से कहा कि हे प्रभु! आपकी 16 पत्नियां आपके ही पुत्र साम्ब से प्रेम करती है।
कृष्ण ने सोचा कि नारद की बात तो झूठ नही हो सकती! वैसे भी स्त्रियों का मन चपल होता ही है, अतः मुझे इसका परीक्षण करना चाहिये। 

एक दिन श्रीकृष्ण अपनी तमाम पत्नियों के साथ सरोवर मे जलक्रीडा कर रहे थे! कृष्ण ने पहले खुद भी मदिरा पिया और बाद मे अपनी पत्नियों को भी मदिरा पिलाया! इसके बाद जब स्त्रियां मद्यपान से बेसुध हो गयी, तब नारद ने साम्ब से आकर कहा-
हे कुमार! तुम्हे श्रीकृष्ण बुला रहे हैं, तुम अभी सरोवर के पास जाओ।
साम्ब बिना कुछ सोचे सरोवर के पास पहुँच गया, जहाँ कृष्ण और उनकी पत्नियाँ मद्यपान करके क्रीड़ा कर रही थी।
साम्ब सरोवर पर पहुँचा, और रूपवान साम्ब को देखकर कृष्ण की पत्नियों की योनि तर (भीग) हो गयी, और जब वो खड़ी हुई तो उनका वीर्य (रज) स्खलित हो गया, तथा कुछ बूँदे पत्तों पर गिर पड़ी!
यह देखकर कृष्ण क्रोधित हो गये और उन्होने अपनी पत्नियों को श्राप दिया कि तुमने मुझे त्यागकर पर-पुरुष की कामना की! मै तुम सबको श्राप देता हूँ कि तुम्हे पतिलोक और स्वर्ग से भ्रष्ट होकर चोरों को अधीन रहना पड़ेगा, और वैश्यावृत्ति भी करनी पड़ेगी।
कृष्ण ने साम्ब को भी कुरूप होने और कुष्ठरोगी होने का श्राप दे दिया!
कृष्ण के श्राप के कारण ही जब श्रीकृष्ण स्वर्गवासी हुये, तब अर्जुन से चोरों ने लड़कर कृष्ण की पत्नियों का हरण कर लिया था!

अब जरा स्वयं विचार करें कि लिखने वाले ने इस पुराण मे किस तरह चुनकर अश्लील शब्दों का इस्तेमाल किया है!
कहानी यहीं नही खत्म होती है, आगे भी कृष्ण ने कहा है कि तुम लोग वैश्या बनकर जब प्रतिदिन अपने ग्राहक मे मेरा ही चिंतन करके उसे संतुष्ट करोगी, तब मरणोपरान्त तुम्हे स्वर्ग की प्राप्ति होगी!

ऐसी ही न जाने कितनी अश्लील बातें इस पुराण मे लिखी है। लोग पुराणों का कितना आदर करते हैं यह तो मै नही जानता, पर मै पुराणों का सदैव खण्डन करता रहूँगा।
कम से कम मेरे प्रयास से किसी की चेतना जागे और इस पुराण-मण्डली को आग लगाना शुरू कर दे।

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आज से तकरीबन एक महीने पहले मैने अपनी दूसरी आईडी पर एकलव्य के बारे मे एक पोस्ट लिखा था! उस पोस्ट की कुछ लोगो ने फेसबुक पर रिपोर्टिंग की और मेरी पोस्ट हट गयी!

मुझे आश्चर्य होता है कि मै इतने प्रमाण के साथ पोस्ट करता हूँ, फिर भी लोग मेरी शिकायत करते हैं, और फेसबुक शिकायत मान भी लेता हैं!
मैन हमेशा वही लिखा जो पुराणों मे लिखा है, फिर भी लोग बुरा मान जाते हैं!

यह सत्य है कि लोगो को यह तो पता है कि द्रोणाचार्य ने एकलव्य का अगूँठा काट लिया था, पर यह नही पता है कि कृष्ण और बलराम ने एकलव्य को मारा था!
डायमण्ड प्रेम की हरिवंशपुराण के अनुसार कृष्ण ने एकलव्य को मार डाला था, जबकि गीताप्रेस ने थोड़ा रहम करते हुये लिखा है कि बलराम ने एकलव्य को मारकर द्वीपांतरण कर दिया था!

वैसे यहाँ तक तो ठीक था, क्योंकि एकलव्य ने कृष्ण के विरुद्ध पौंड्रक का साथ दिया और युद्ध किया था, पर एकलव्य के क्रोध मे कृष्ण और बलराम ने 88 हजार निषादों को केवल इसलिये मार दिया था क्योंकि एकलव्य उनका मुखिया था!

आखिर ये कैसा न्याय था श्रीकृष्ण का?
मै अभी भी यही कहता हूँ कि एकलव्य के कारण कृष्ण और बलराम ने निर्दोष निषादों की हत्या की थी, जो उन्हे कम से कम मेरी नजर मे "अपूज्य" बनाने के लिये काफी है!

अब जिसे इस पोस्ट से भी शिकायत हो, वो इसे भी हटवा दें, पर उससे पहले हरिवंशपुराण का अध्याय-98 से 103 तक जरूर पढ़ लें।

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पिछले दिनों मैने पुराणों मे लिखी श्रीकृष्ण की अश्लीलता पर एक पोस्ट किया था, जिसका बहुत विरोध हुआ!
आज भी मै श्रीकृष्ण के बारें मे ही बात करूँगा, पर पुराणो के संदर्भ से नही बल्कि सामाजिक स्तर से.....

आप सब ने एक गीत जरूर सुना होगा- " मोहे पनघट पे नन्दलाल छेड़ गयो रे " 
अब आखिर किसी महिला को पनघट पर नन्दलाल क्यों छेड़ रहे हैं, और अगर उन्होने नही छेड़ा है, तो इतने सारे हिन्दु संगठन है.... किसी ने इस गीत का विरोध क्यों नही किया!
विरोध करना तो दूर इसी गाने पर ये लोग नाचते भी है, इन्हे क्या खबर नही पड़ती कि गीत के बोल क्या है......

आखिर कृष्ण के साथ ही ऐसा गीत क्यों बना! 
दूसरे भगवानों के साथ तो नही है कि- "मोहे पनघट पे रामचन्द्र छेड़ गयो रे...., या मोहे पनघट पे गणपति छेड़ गयो रे "

यह कोई एक मात्र गीत नही है, कई और है... जैसे-
बड़ी देर भई नन्दलाला, तेरी राह तके बृजबाला।
गोविन्दा आला रे, जरा मटकी सभांल ब्रजबाला।
राधिका गोरी से, बिरज की छोरी से।
मधुबन मे जो कन्हैया किसी गोपी से मिले, कभी मुस्काये, कभी छेड़े, कभी बात करे।

ये तो पहले के गीत है, अभी और भी ऐसे गीत बनेगे...
खैर पुराणो से जो रही-सही कसर थी उसे सूरदास ने पूरा किया है...
सूरदास लिखतें हैं- " मानहु सूर काढ़ि डारी है, वारि मध्य ते मीन "
अर्थात- कृष्ण के वियोग मे गोपियाँ ऐसे तड़प रही हैं, जैसे जल बिन मछली!

सूरदास की कुछ चौपाइयाँ और है..... जैसे- " बुझत स्याम कौन तू गोरी। कहां रहति काकी है बेटी देखी नहीं कहूँ ब्रज खोरी "

ऐसे बहुत से उदाहरण दे सकता हूँ मै.....
अतः यही कहूँगा कि मेरा विरोध करने से अच्छा है कि पुराणों को जला दो! अन्यथा एक पवन का मुँह बन्द करोगे तो और कई पवन आयेगे, क्यों ना इस अश्लीलता की जड़ पुराणों को ही नष्ट कर दो!

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गीत गोबिंद जयदेव।

यदि आप महाभारत और हरिवंशपुराण पढ़ो, तो आपको पता चलेगा कि कृष्ण बहुत सुन्दर होने के साथ-साथ अत्यन्त चतुर थे, वेद-शास्त्रों के ज्ञाता और बुद्धि...