एक बात मेरी समझ से परे हैं कि आखिर देवराज इन्द्र मे ऐसा कौन सा गुण था जिसके चलते उन्हे स्वर्ग का राजा बनाया गया था?
उनसे कहीं अधिक गुणवान तो नर्क के राजा यमराज थे। इन्द्र तो वासनाग्रस्त और हवस के पुजारी तो थे ही, साथ ही कायर भी थे, जो लगभग तमाम युद्धों असुरों से हार जाते थे।
इन्द्र किस कदर वासना के अधीन थे इसका उदाहरण अहिल्या प्रकरण तो हैं ही, इसके अतिरिक्ति भी इन्द्र ने कई और बड़े काण्ड किये थे।
एक पौराणिक कथा के अनुसार अरूणदेव (सूर्यदेव के सारथी) ने एक बार स्त्री का रूप बनाकर (क्योंकि इन्द्र की सभा मे पुरुषों का आना निषेद्य था) इन्द्र की सभा मे अप्सराओं का नृत्य देखने गये। अचानक इन्द्र की नजर एक कोने मे स्त्री बनकर खड़े अरुणदेव पर पड़ी।
इन्द्र ने सोचा कि यह फुलझड़ी कौन है जो अब तक मेरे हाथ नही लगी?
इन्द्र अपने सिंहासन से उठकर अरुणदेव की तरफ लपके! अरूणदेव भी स्थिति को भांपकर भागे, पर इन्द्र ने उन्हे तेजी से झपटकर पकड़ लिया।
बेचारे अरुणदेव छटपटाते रहे, पर इन्द्र ने एक न सुनी और अरुणदेव की नथ उतार ही दिया! इस मधुर-मिलन का परिणाम यह हुआ कि स्त्री-रूपधारी अरुणदेव गर्भवती हो गये और कालान्तर मे उनके गर्भ से वानरराज बालि का जन्म हुआ।
इन्द्र के कामपिपासा की एक कथा श्रीनरसिंहपुराण अध्याय-63 मे भी मिलती है-
"कथानुसार एक बार इन्द्र ने सोचा कि मैने स्वर्ग का सुख बहुत भोग लिया, अब कहीं एकांत मे चलकर तप करके मोक्षप्राप्ति का साधन किया जाये।
ऐसा सोचकर कैलास-पर्वत के निकट आ गये और वहाँ उन्होने यक्षराज कुबेर की पत्नि चित्रसेना को देखा! चित्रसेना बहुत सुन्दर थी और उसकी सुन्दरता पर इन्द्र मुग्ध हो गये। इन्द्र ने सोचा कि कुछ भी करके मुझे यह सुन्दरी प्राप्त करनी ही है।
उस समय इन्द्र की हालत भी वही थी कि "निकले थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास"
बेचारे गये थे मोक्ष ढ़ूढ़ने पर फिर से सुन्दरता के जाल मे फँस गये। इन्द्र ने चित्रसेना को पाने के लिये कामदेव का आह्वान किया! जब कामदेव आये तो इन्द्र ने उन्हे सारी स्थिति बतायी और कहा कि तुम अपने कामबाणों से इस सुन्दरी की कामाग्नि भड़का दो, और मै तत्काल उसके सम्मुख जाकर मौके का फायदा उठा लूँगा।
कामदेव ने कहा, "देखो देवराज! एक बार मै इसी कैलास पर भस्म हो चुका हूँ, अब तुम दूसरी बार मुझे खतरा उठाने के लिये कह रहे हो"
कामदेव के बारम्बार समझाने पर भी इन्द्र न माने और मजबूरन कामदेव ने चित्रसेना पर कामबाण चला दिया।
जैसे ही चित्रसेना काममोहित हुई, इन्द्र ने उसी क्षण उसके पास जाकर प्रणय-प्रस्ताव रख दिया और उसे अपने रथ पर बैठाकर मन्दराचल की गुफाओं मे लेकर चले गये। इन्द्र ने कामवेदना से पीड़ित चित्रसेना संसर्ग करके स्वर्ग की अप्सराओं से भी अधिक सुख का अनुभव किया।"
इसके आगे काफी लम्बी कहानी है कि नाडीजङ्घा नामक एक राक्षसी की मदद से कुबेर ने अपनी पत्नि का पता लगाया!
बाद मे इन्द्र ने नाडीडङ्घा राक्षसी को मार डाला और क्रोध मे आकर तृणबिन्दु मुनि इन्द्र को श्राप देकर स्त्री बना देते हैं।
उक्त कथाऐं भी इन्द्र की विलासिता का अन्त नही है, पुराणों मे ऐसी कई कथाऐं हैं जो बताती हैं कि इन्द्र परस्त्री-हरण, परस्त्री-गमन का अपराध करते थे, फिर भी त्रिदेवों ने इन्द्र को हमेशा माफ भी किया और उन्हे कभी अपदस्थ भी नही किया।
दूसरी बात जब श्रीकृष्ण ने तीन मुट्ठी चावल के बदले स्वर्ग और धरती का सारा वैभव सुदामा को दे दिया था, तब भी यह ज्ञात नही होता कि सुदामा ने आखिर कितने दिनों स्वर्ग और धरती पर राज्य किया था?
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मै अक्सर ओशो को पढ़ता हूँ, ओशो बड़े कटु अन्दाज मे पौराणिक ऋषि-मुनियों की आलोचना करते थे! शायद यही वजह थी कि हिन्दू ओशो से बहुत घृणा करते थे...
पर ओशो ने कभी किसी की झूठी आलोचना नही की, उनकी बातों मे तर्क और तथ्य दोनो होता था!
ओशो का मानना था कि पौराणिक ऋषियों को भी सुन्दर स्त्रियों की लालसा थी, कई बार इनकी स्त्रियाँ इनसे उम्र मे काफी छोटी होती थी!
एक बात ध्यान रखना कि काम को सामान्यतः कोई जीत नही पाया, न तो ऋषि-मुनि और न ही इनकी पत्नियाँ!
यह तो सबको पता ही है कि देवगुरू वृहस्पति की पत्नि तारा और चन्द्रदेव (चन्द्रमा) के बीच अनैतिक सम्बन्ध थे, और इन दुराचार से 'बुध' नाम का एक पुत्र भी पैदा हुआ था!
ऐसी ही एक और ऋषिपत्नि थी "अहिल्या"
अहिल्या ऋषि गौतम की पत्नि थी, जो बहुत सुन्दर थी!
अहिल्या की सुन्दरता पर स्वयं देवराज इन्द्र भी फिदा थे! कहते हैं कि एक बार इन्द्र और चन्द्र ने मिलकर गौतम ऋषि को बेवकूफ बनाया!
गौतम ऋषि प्रतिदिन सुबह मुर्गे की बांग सुनकर नहाने जाते थे, और इसी का लाभ लेकर चन्द्र ने एक दिन समय से पहले ही मुर्गा बनकर बांग दे दी!
गौतम ऋषि धोखे मे आकर नहाने चले गये, मौका पाकर इन्द्र गौतम का वेष बनाकर अहिल्या के पास आये ट्वेन्टी-ट्वेन्टी खेलकर भाग निकले...
जिससे क्रोधित होकर गौतम ऋषि ने अहिल्या को श्राप देकर पत्थर बना दिया, क्योंकि उसने अपने पति के रूप मे आये इन्द्र को पहचानने मे भूल की!
हांलाकि यह कहानी सच नही है, सच तो यह है कि अहिल्या ने स्वयं इन्द्र के साथ संसर्ग किया था!
यह सच है कि चन्द्र मुर्गा बनकर बोले थे, पर इन्द्र ने अहिल्या से छल नही किया था!
बाल्मीकि रामायण/बालकाण्ड सर्ग-48/17-21 मे साफ लिखा है कि जैसे ही गौतम ऋषि स्नान करने अपनी कुटिया से निकले, देवराज इन्द्र अन्दर आ गये!
इन्द्र ने अहिल्या से कहा- हे देवी! मे देवराज इन्द्र हूँ, मैने तीनों लोकों मे तुमसे सुन्दर स्त्री नही देखी! तुम अद्वितीय रूपवती हो, मै तुमसे रतिक्रिया (सम्भोग) करना चाहता हूँ!
इन्द्र चालाक थे, उन्हे मालूम था कि महिलाऐं अपनी प्रशंसा सुनना बहुत पसन्द करती है....
इन्द्र के मुँह से अपने रूप की प्रशंसा सुनते ही अहिल्या के पाँव जमीन पर नही रहे, वो सोचने लगी कि "हाय,, मै इतनी सुन्दर हूँ कि स्वयं देवराज मुझसे प्रणय के लिये विनती कर रहे है, मेरे अहो भाग्य!"
और फिर अहिल्या तैयार हो गयी!
जब इन्द्र ने गौतम ऋषि की कुटिया मे भरपूर 'बरसात' कर ली, तब अहिल्या से बोले कि- 'हे देवी! मुझे बहुत आनन्द आया, मै अब संतुष्ट हुआ'
अहिल्या ने कहा कि मै भी आपसे तृप्त हुई, पर इससे पहले की मेरे पति आ जाये, आप यहाँ से चले जाओ।
कहते हैं कि हाथी पालना तो आसान होता है, पर उसका चारा देना मुश्किल है!
ऋषि-मुनि अधेड़ अवस्था मे भी सुन्दर कन्याओं से शादी कर लेते थे, पर क्या वो अपनी पत्नियों को खुश रख पाते थे, यह बड़ा प्रश्न था! और अहिल्या की घटना भी यही बताती है।
चलो अगर एक बार मान भी लें कि इन्द्र ने अहिल्या से छल किया, और अहिल्या इन्द्र को पहचान ही नही पायी तो फिर क्यों गौतम ऋषि ने अहिल्या को श्राप दिया?
फिर तो उस दिन केवल अहिल्या ही नही, गौतम ऋषि भी छले गये थे!
गौतम ऋषि ब्रह्मज्ञानी थे, और इतना तपोबल था कि किसी को श्राप देकर पत्थर बना सकते थे, पर उस समय इनका तपोबल कहाँ चला गया था, जब ये चन्द्रमा की नकली बांग को असली मुर्गे की आवाज समझ बैठे!
अगर गौमत जैसे दिव्यऋषि को यह ज्ञान नही हो पाया कि चन्द्रमा उन्हे छल रहा है, तो अहिल्या कैसे जान पायेगी कि इन्द्र मेरे पति के रूप मे आये हैं!
गौतम ऋषि का अहिल्या को श्राप देना सर्वथा अनुचित था!
अहिल्या इन्हे भी तो श्राप दे सकती थी, कि तुम धोखे मे आकर आधी रात को नहाने क्यों गये। और अगर महर्षि बाल्मीकि की बात सत्य है तब भी गौतम ऋषि ही दोषी है, अगर वो अहिल्या को संतुष्ट रखते तो शायद वो इन्द्र के प्रस्ताव को न स्वीकार करती!
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