Monday, 29 March 2021

नियोग।

आप लोग यह तो जानते हो कि पाण्डु की पत्नि कुंती को संतान पैदा करने के लिये नियोग करना पड़ा था!

पाँचो पांडव पाँच अलग-अलग पिता की संतान थे........
युधिष्ठिर यमराज के पुत्र थे!
भीम पवनदेव के पुत्र थे!
अर्जुन इन्द्र के पुत्र थे, तथा नकुल और सहदेव दोनो अश्विनी कुमारों के पुत्र थे!

      पर क्या आपको ये पता है कि अपने पति पाण्डु के जीते जी कुंती ने दूसरे पुरुषो से नियोग क्यो करना पड़ा?
मै बताता हूँ......

महाभारत काल मे एक ऋषि थे जिनका नाम किंदम था! एक बार राजा पाण्डु अपनी दोनो पत्नियों कुंती और माद्री के साथ वन मे समय व्यतीत करने गये थे, तब वो ऋषि किंदम के आश्रम के पास ही ठहरे थे!

हमारे ऋषि-मुनि कितने रंगीन मिजाज थे जरा देखो तो सही.....
किंदम ऋषि को ना जाने क्या चुल्ल मची थी कि वो अपनी पत्नि को हिरनी बना दिये और खुद हिरण बनकर एक झाड़ी मे सम्भोग कर रहे थे! उसी समय पाण्डु शिकार खेलने निकले, उन्होने सोचा कि हिरण और हिरनी का जोड़ा है.... वो नही जानते थे कि ये किंदम ऋषि है!
पाण्डु ने तीर मार दिया.....       बाण लगते ही किंदम ऋषि मनुष्य वेष मे आकर दर्द से कराहने लगे!

बेचारे पाण्डु ने पास जाकर क्षमायाचना की...  और कहा कि मै नही जानता था कि आप हो, मैने सोचा सचमुच का हिरन है!
किंदम ऋषि ने एक नही सुनी और पाण्डु को श्राप दिया कि तुमने मुझे सम्भोग करते समय मारा है, अब जब तुम भी अपनी पत्नि से सहवास करोगे तभी तुम्हारी मृत्यु हो जायेगी....

दुःखी पाण्डु ने यह बात कुंती को बतायी.....    और कहा कि अब हमारा वंश कैसे आगे बढ़ेगा, इसी वंश को बढ़ाने के लिये ही कुंती ने नियोग किया था!
परन्तु यह बात माद्री को पता नही थी, और उसने एक दिन पाण्डु को मैथुन के लिये विवश किया... जिससे पाण्डु की मृत्यु हो गयी।

             इस कहानी के बाद दो सवाल उठते है.......
पहला जब कुंती का कोई भी पुत्र पाण्डु ने पैदा नही किया था तो वो पाण्डव क्यो कहलाये!
दूसरा किंदम ऋषि जब हिरण के वेष मे मैथुन कर रहे थे तो अगर उसी समय उन पर शेर हमला करके मार देता तो वो क्या करते...
जब पाण्डु मनुष्य होकर उन्हे नही पहचान पाये तो जंगल का शेर भला क्या पहचान पाता.........

सूर्य और कुंती।

॥ सूर्य और कुंती ॥

कुंती और सूर्य के सम्बन्धो को लेकर बहुत सारे कायास लगाये जाते है.... पर आज मै एकदम प्रमाणिक सच आपको बता रहा हूँ!

महाभारत/वनपर्व के अनुसार कुंती ने अपने बचपन मे किसी ऋषि की सेवा की थी.. और ऋषि ने खुश होकर उसे वर दिया था कि वो जब चाहे पाँच देवताओं को बुला सकती है!
एक दिन कुंती एकांत मे बैठी थी, और उसने कौतुहलवश सूर्य वाला मंत्र पढ़ दिया.....  फिर क्या था, अचानक सूर्यदेव आ टपके! कुंती घबरा गयी और बोली कि "हे देव आप जहाँ से आये हो, वही लौट जाओ"

कुंती उस समय नवयुवती थी और बेहद खूबसूरत भी....... कुंती को देखकर सूर्य की लार टपकने लगी! सूर्य बोले कि हम देवता एक बार आने के बाद बिना कुछ दिये वापस नही जाते।
कुंती ने कहा कि मुझे आपसे कुछ नही चाहिऐ......

अब जरा देखो कि सूर्य किस तरह कुंती को सहवास करने के लिऐ फुसला रहे है!
सूर्य बोले "हे देवी मै अखण्ड तेजस्वी हूँ, मै तुम्हे अपने जैसा ही उत्तम पुत्र दूँगा.....बस तुम अपना शरीर मुझे सौंप दो"

कुंती ने कहा कि मै अविवाहित हूँ, मेरे शरीर पर अभी मेरे माता-पिता का अधिकार है, आप अनुचित बात मत करो और वापस चले जाओ!
सूर्य को लगा कि सुन्दरी हाथ से निकल जायेगी... फिर से सूर्य ने आखिरी प्रयास किया!
सूर्य ने कहा- "हे देवी मुझसे जन्मा पुत्र अतिबलशाली और सुन्दर होगा, मेरी माँ अदिति ने मुझे अमोघ कवच और कुंडल दिया है जो मै उस पुत्र को दे दूँगा, तुम लोक-लज्जा की चिन्ता त्यागकर मेरे साथ समागम करो"

आखिरकार कुंती झांसे मे आ ही गयी और बोली कि अगर आप कवच-कुंडल मेरे पुत्र को देने का वचन देते हो तो मै आपके साथ प्रेमपूर्वक सहवास करूँगी!

इस वृत्तांत को पढ़ने के बाद कहीं से भी सूर्य पूज्यनीय या देवतुल्य लग रहे है, जो काम पिपाशा को शान्त करने के लिऐ एक कुवाँरी और नासमझ लड़की को सम्भोग करने के लिऐ बरगला रहे है! इन्होने उसे कुवाँरी माँ बनाकर छोड़ दिया, और बेचारा कर्ण पूरी जिन्दगी इन्ही की वजह से अपमानित होता रहा!

आज भी बहुत सारी औरते सूर्य को जल चढ़ाती है और अर्ध्य देती हैं, अगर ये फिर किसी के ऊपर खुश होकर प्रकट हुऐ तो बिना कुछ दिऐ वापस नही जाते!
हाँ मै सूर्यनमस्कार भी नही करता..............

आत्मा और नर्क, वेद, प्रश्न।

#क्या_शरीर_मे_आत्मा_होती_है......

                                           (पोस्ट बड़ा है, अतः ध्यान से पढ़े)

आध्यात्मिक लोग कहते है कि मानव शरीर के अन्दर एक आत्मा होती है जो शरीर को संचालित करती है! इनका यह भी कहना है कि आत्मा अजर-अमर होती है और उसके निकलते ही मानव मर जाता है......
अब सवाल यह है कि आखिर आत्मा के निकलने से मानव मर जाता है तो आत्मा निकलती ही क्यो है?
हमारा शरीर वृद्ध होता है या चोट लगने पर घायल होता है... आत्मा ना तो घायल होती है और ना ही वृद्ध होती है, तो फिर आत्मा क्यो निकलती है!
हमारे शरीर मे आत्मा जैसा कुछ भी नही है.... हमारा पूरा शरीर हृदय और मस्तिष्क से चलता है, जब कभी आपको कही चोट लगती है तो दिमाग तुरन्त यह बात हृदय को बताता है और फिर हम उस पर ध्यान देते है! जब दिमाग और हृदय काम करना बन्द कर देते हैं तो शरीर मे रक्त संचार रुक जाता है और ग्लूकोज की सप्लाई भी बन्द हो जाती है.... जिससे मांस सड़ने लगता है, बस यही मृत्यु है!

अगर आत्मा के निकलने से मौत होती है तो मृत्यु के बाद भी आँख लगभग छः घण्टे जीवित रहती है, क्या उसके लिये अलग आत्मा होती है....
अगर हमारा हाथ-पैर कट जाता है तो आत्मा नही निकलती पर गला कटने पर क्यों निकल जाती है.........  हमारे शरीर मे करोड़ो जिवाणु भी होते है तो क्या हमारे शरीर मे करोड़ो आत्माऐं है...
 आध्यात्मिक कहते हैं कि आत्मा गर्भावस्था के दौरान शरीर में प्रवेश कर जाती हैं और मृत्यु के साथ शरीर से निकल जाती है! फिर दुबारा से जन्म,परमात्मा से मिलन या प्रलय के दिन होने वाले फैसले का इंतजार करती है! ( आपके धार्मिक विश्वासों के अनुसार )…

 मै कहता हूँ कि कोई आत्मा गर्भ  मे नही प्रवेश करती.... गर्भधारण अण्डाणु को शुक्राण द्वारा निषेचन का परिणाम है।
स्त्री अपने अण्डाशयों में चालीस हजार से भी अधिक अण्डाणुओं को एक साथ जन्म देती है, निश्चित तौर पर इतनी  "सुप्त आत्मायें" नारी शरीर में पहले से मौजूद नहीं हो सकती।
रही बात पुरूष की....  तो वीर्य में स्पर्म काउंट की संख्या लगभग 80 से 120 मिलियन प्रति क्यूबिक मिली० है, (एक मिली० में एक हजार क्यूबिक मिली० होते है) और पुरूष के एक बार के वीर्यपात की मात्रा लगभग 3 से 5 मिली० होती है...अब जरा  कैल्क्यूलेटर निकालिये और हिसाब लगाइये…...
निश्चित तौर पर इतने सारे शुक्राणुओं में भी "सुप्त आत्माऐं" नही होती होगी!

असल मे आत्मा की अवधारणा बड़ी चतुराई से बनायी गयी, आत्मा होने का दूसरा पहलू यह भी है कि "परमात्मा" भी है! गरुणपुराण के अनुसार मृतात्मा को कर्मानुसार तरह-तरह के कष्ट झेलने पड़ते है, कभी नर्क पकोड़े की तरह उबाला जाता है तो कभी आरी से काटा जाता है, इस पुराण मे नर्क के कष्ट का पूरा "मेन्यूकार्ड" है......
अब इस कष्ट से बचने का उपाय भी इसी पुराण मे है.. अगर आप ब्राह्मण को गौदान करोगे तो आपके परिजन की आत्मा "वैतरणी" नदी पार कर जायेगी, अगर आप ब्राह्मण को भोजन और दान-दक्षिणा से तृप्त करोगे तो मृतक की आत्मा को यमदूत कष्ट नही देगे... अर्थात मृत्यु पश्चात भी करोबार चलता रहे इसके लिऐ आत्मा बनायी गयी....

गरुणपुराण मे पाँच प्रकार के नर्को का वर्णन है..
रौरव नर्क!
महारौरव नर्क!
कण्टकावन नर्क!
अग्निकुण्ड नर्क!
पंचकष्ट नर्क!

अब इन कष्टदायी नर्कीय यातना से बचने के लिऐ तमाम प्रकार के दान-दक्षिणा वाले उपाय भी है....  असल मे आत्मा का अस्तित्व बनाया ही इसीलिऐ गया कि अपने पित्रो की आत्मा को नर्क से बचाने के लिये परिजन तमाम कर्मकाण्ड और दान-दक्षिणा आसानी से करेगे, बस यही आत्मा का सच है...
गीता मे श्रीकृष्ण कहते है कि आत्मा कभी नही मरती... अरे माधव मरेगी तो तब जब वो होगी ना!

इस ब्राह्माण्ड मे आत्मा और परमात्मा का कोई अस्तित्व नही है!

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भागवत जी जो कह रहे है कि वेद विज्ञान से ऊपर है वो बात एकदम सही है,  पर तुम सरस सलिल पढ़ने वाले लोग वेदो की सत्ता क्या जानो....
अरे ऋगवेद मे विराटपुरुष के मुँह और पैर से बच्चे का जन्म ही "जीव विज्ञान" है, यम-यमी संवाद ही "सामाजिक विज्ञान" है और इन्द्र का शराब पीना ही "रसायन विज्ञान" है!

आज लोग विज्ञान के नशे मे इतना चूर है कि वेदों के महत्व को समझते ही नही....  एक अरब 96 करोड़ साल पहले ब्रह्माजी ने "अल्फाल्फा" घास की कुटाई करके कागज बनाया और वेद लिखना शुरू किया...  और ऐ बकलोल वैज्ञानिक कहते है कि कागज की खोज 105 ई० मे चीन मे हुई!

वेदो की ऋचाओं मे बड़ी चमत्कारी शक्ति है, दो ऋचा पढ़कर शंकर जी कैलाश पर्वत पर बर्फ के बीच नंग-धड़ंग बैठे है, पर कभी उन्हे सर्दी नही हुई, चार ऋचा विष्णु जी ने पढ़ी और सब सात जन्म ही लेते है पर विष्णु जी नौ जन्म ले चुके है, अभी दसवें की तैयारी है.....

पहले के पशु-पक्षी भी वेद पढ़कर शुद्ध शाकाहारी थे, अन्यथा शंकर जी का सांप गणेश का चूहा खा जाता और कार्तिकेय जी का मोर शंकर जी के सांप को खा जाता..,..     पर सब वेदो के ज्ञाता थे, अतः पास ही रहकर भी कभी झगड़े नही!

पहले ऋषि-मुनि वेद पढ़कर श्राप देते थे और वो सही हो जाता था.... रामजी ने थोड़ा वेद कम पढ़ा था नही तो वो भी रावण को श्राप देकर भस्म कर देते, जरूरत ही ना पड़ती वानरों को ले जाकर लंका मे कबड्डी खेलने की........

खुद मोहन भागवत भी वेदो से प्राप्त शक्ति से ही देश के प्रधानमंत्री को अपने इशारे पर घुमाते है....
तो अब विज्ञान छोड़ो और वेद पढ़कर...  "ब्राह्मणो_मुखमासीद********पद्भ्याम_शूद्रो_अजायते" करो...

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नास्तिक बिना कुछ समझे ईश्वर को मानने से इंकार करते हैं....
ईश्वर ने हम मनुष्यों के लिये कितने कष्ट उठायें हैं इन्हे क्या मालूम.....   मै बताता हूँ!

भगवान ने दो अरब साल पहले ब्रह्माण्ड की रचना की, फिर पृथ्वी को बनाया! पृथ्वी लुढ़क ना  जाये इसलिये उसे शेषनाग के फन पर रख दिया.... 

तुम्हे पता है कि जब शेषनाग जरा सा हिलते हैं तो भुकम्प आ जाता है, फूँक मारते हैं तो धरती पर आँधी आती है....
और जब गांजा पीकर धुआँ छोड़ते है तो धरती पर कुहरा छा जाता है......

भगवान ने पृथ्वी बनाने के बाद आक्सीजन लाने के लिये पेड़-पौधों के बीज धरती पर बोए....   हर महीने ईश्वर इफको यूरिया का छिड़काव करते थे, और जब आक्सीजन आ गयी तब ईश्वर ने मनु/सतरूपा को धरती पर मनुष्य पैदा करने के लिये भेजा....

प्रथम मानव मनु ने सतरूपा को अपना आँसू पिलाया और इंसान पैदा हुऐ!

विज्ञान झूठा है जो कहता है कि मानवों का DNA अलग-अलग है.,.,
हम सब एक ही पिता की संतान है...   जिस दिन सतरूपा ने जामुन खाकर मनु के आंसू पियेे, तो बच्चे काले पैदा हुऐ और अफ्रीका के नीग्रो बने, जिस दिन पपीता खाकर आंसू पिया तो बच्चे पीले रंग के चीन के लोग हुऐ!
जिस दिन दूध पीकर पैदा किया तो बच्चे यूरोप के गोरे हुऐ और हम आर्यो को खरबूज खाकर पैदा किया था माता सतरूपा ने...
हम सब मनु-सतरूपा की औलाद है!

इतना कष्ट उठाया है हमारे लिये भगवान ने..   अगर हम अब भी उनको नही पूजेंगे तो वो पृथ्वी को समुद्र मे ढ़केल देंगे....
और इसके जिम्मेदार तुम नास्तिक होगे!

नास्तिक मूर्खो की तरह कहते हैं कि मन्दिर मे बालात्कार होता है तो भगवान क्या करता है....      अरे भाई हम सनातनी धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष मे विश्वास करते हैं, अब धर्म और अर्थ मन्दिर मे करते है तो काम करने कोठे पर जाये.....    वो भी मन्दिर मे ही निपटा लेते हैं!

चुपचाप बिना तर्क किऐ बस भक्ति करो...   क्योकि भगवान तर्क से परे हैं!
भक्ति की वजह से द्रोपदी पाँच पतियों के होने के बाद भी सती मानी गयी,
भक्ति की वजह से अन्धे धृतराष्ट्र ने भी सौ पुत्र पैदा किए.....
भक्ति की वजह से श्रवणकुमार के माँ-बाप अन्धे होकर भी चारधाम दर्शन करते थे, और मीरा जहर पीकर भी मरी नही जबकि दयानन्द सरस्वती टपक गये....
भक्ति की शक्ति से हनुमान ने पूरी लंका फूँक दी और उनकी पूँछ का एक बाल भी नही जला..  

अरे हम आस्तिकों को तो पत्थर मे भी भगवान दिखते हैं, तभी तो हम सनी लियोन को भी मन्दिर मे जाने से नही रोकते...   हाँ अभी तक दलितों के अन्दर ईश्वर नही दिखे, जिस दिन दिख जायेगे.........  हम उन्हे भी मन्दिर मे प्रवेश करने देगे...........

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॥ विज्ञान और ईश्वर ॥

              यह अकाट्य सत्य है कि विज्ञानवाद के सामने ईश्वरवाद हमेशा औंधे मुँह गिरा है! विज्ञान के आने के बाद मानव जीवन मे क्रान्तिकारी बदलाव आये!- 

      विज्ञान के आने के बाद मंत्र मारने, खीर पीने और फल खाने से बच्चे पैदा होना बन्द हो गये!
       विज्ञान के आने के बाद असुरो और शैतानो ने लोगो को सताना बन्द कर दिया!
      विज्ञान के आने के बाद कभी किसी सूर्य को नही निगला।
       विज्ञान के आने से मर्दो के मुँह, नाक, कान और पैर से बच्चे पैदा होना बन्द हो गये!
      विज्ञान के आने के बाद जो बन्दर,भालू और गिद्ध धाराप्रवाह संस्कृत बोलते थे, वो चींचीं और चूँचूँ करने लगे!
  और तो और विज्ञान के आने से श्राप देकर सांप-बिच्छू बनाना भी बन्द हो गया! 
जरा सोचो विज्ञान ने आपके जीवन मे कितने बदलाव लाये!!

तो अब जय भगवान नही, जय विज्ञान बोलो!!!!

सती।

#सती_प्रथा_का_सच.....

सती प्रथा का मतलब होता है ऐसी प्रथा (परम्परा) जो 'सती' द्वारा चलायी गयी!
शिवपुराण मे एक कथा आती है कि शिव की पत्नी सती के पिता "दक्ष" ने अपने ही दामाद शिव का अपमान किया था! देवी सती अपने पति का अपमान सहन ना कर सकी और हवनकुण्ड मे कूदकर खुद को आग की लपटों से भस्म कर दिया!

पति के सम्मान के लिये सती का यह बलिदान एक परम्परा बन गयी, पुरातनकाल मे जब कोई महिला विधवा होती थी, तब वह अपने पति के साथ ही चिता पर बैठकर जल जाती थी, और पंडे ऐसी महिला का दर्जा देवी 'सती' के बराबर मानते थे!
महाभारत मे पाण्डु की पत्नि माद्री भी पाण्डु के साथ सती हुई थी, और यही से यह क्रूर प्रथा प्रबल हो गयी।

सोचने की बात तो यह है कि दशरथ की पत्नियाँ कौशिल्या, कैकेयी और सुमित्रा दशरथ के साथ सती नही हुई थी! 
तो क्या वो 'पतिव्रता' नही थी?

यह प्रथा हिन्दू समाज मे निर्विरोध रूप से सन् 1829 तक चलती रही, इसके बाद अंग्रेजों ने इस पर रोक लगा दी और यह परम्परा लगभग बन्द हो गयी!
इस प्रथा के विरोध मे राजा राममोहन राय और लार्ड विलियम बैटिंक ने बहुत लड़ाई लड़ी!

यह रिवाज निश्चित रूप मे हिन्दू समाज पर कलंक था, पर अब कुछ हिन्दू धर्माधिकारी कहते हैं कि यह प्रथा कभी भी धार्मिक प्रावधान नही थी! 
लेकिन गरुणपुराण उन पंडो के झूठ को उजागर कर रहा है!

गरुणपुराण/अध्याय-10 श्लोक-35 से 56 तक मे लिखा है-
"पति की मृत्यु के बाद पतिव्रता नारी को पति के साथ ही परलोकगमन करना चाहिये, महिला लज्जा और मोह त्यागकर श्मशान भूमि मे जाये, चिता की परिक्रमा करके महिला चिता पर चढ़े और अपने पति को गोद मे लिटाये, तथा अग्नि को गंगाजल समान मानकर खुद को पति के साथ भस्म कर ले"

       यह सब कितनी बेशर्मी और निर्दयिता के साथ लिखा गया है, जैसे महिला जीवन का कोई महत्व ही नही है!
इस पुराण मे यह कहीं नही लिखा है कि यदि पत्नि पहले मर जाये तो पति उसके साथ चिता पर लेटे, पर पत्नियों के लिये ऐसी बेरहम बातें लिखी है!

अब सवाल यह है कि यदि महिला गर्भवती हो तो भी क्या उसे 'सती' होना चाहिये?
इस पर इसी अध्याय के 41 वें श्लोक मे लिखा है कि महिला पहले प्रसव करके पुत्र पैदा कर दे, उसके बाद उसे 'सती' हो जाना चाहिये!

इसी पुराण 54वें श्लोक मे महिला को डराया भी गया है कि "यदि वह क्षणमात्र होने वाली पीड़ा के कारण सती होने का सुख नही भोगती है तो वो महिला जन्म-जन्मातर तक विरहाग्नि मे जलती रहती है, और जो महिला सती हो जाती है वह 14 इन्द्रों के कार्यकाल तक स्वर्ग मे पति के साथ रमण करती है!
              अग्नि केवल महिला के शरीर को जलाती है, पर आत्मा को पीड़ा नही होती! नारी अमृत समान अग्नि मे जलकर पवित्र हो जाती है, और उसके सारे पाप भी नष्ट हो जाते है! यदि महिला ऐसा नही करती तो वह नारी ऋण मे उत्तीर्ण नही होती!"

इस पुराण से यह स्पष्ट हो जाता है कि पंडे महिला को सती होने पर स्वर्ग का लालच देते थे, और इनकार करने पर नर्क की अग्नि का डर दिखाकर उसकी निर्मम हत्या करते थे!
पंडे महिला से कहते थे कि सती होने से तुम्हारे कुल का गौरव बढ़ेगा और अगले जन्म मे शीघ्र ही अपने पति से तुम्हारा मिलन होगा!
बस ऐसी ही बातों से विधवा नारी को सम्मोहित किया जाता था!

सती प्रथा पंडो की क्रूरता का और छोटा सा उदाहरण मात्र है, पंडे पूर्वकाल मे ऐसे दर्जनों जघन्य अपराध धर्म की आड़ मे करते थे!

सती प्रथा का उल्लेख "नारदपुराण अध्याय-7" मे भी है, पर वहाँ जरा सा रहम किया गया है!
नारदपुराण अध्याय-7/52 के श्लोक मे लिखा है-
"बालापत्याश्च गर्भिण्यो ह्यदृष्टऋतवस्तथा।
रजस्वला राजसुते नारोहन्ति चिंता शुभे।।"

अर्थात- जिस महिला की संतान बहुत छोटी हो, जिसकी उम्र इतनी कम हो कि उसे अभी तक माहवारी ना शुरू हुई हो, जो गर्भवती हो, और जिसे माहवारी आ रही हो, उसे पति के साथ चिता पर नही चढ़ना चाहिये।

नारदपुराण ने तो जरा सा दयाभाव भी दिखा दिया है, पर गरुणपुराण तो विधवा को जलाने पर ही उतारू है....

पूर्वजन्म के पापी।

पूर्वांचल मे एक लोककथा कही जाती है-
कहते हैं कि एक बार एक दोनो पैरों से लंगड़ा इंसान नदी किनारे चिल्ला रहा था कि कोई धर्मात्मा मुझे नदी पार करवा दो!
एक महापुरुष आये और दयाभाव से वो उस लंगड़े को अपने कंधे पर उठाकर नदी पार कराने लगे, नदी मे पानी कमर तक ही था, पर जैसे ही वो धर्मात्मा बीच नदी मे पहुँचे, वैसे ही पानी ऊपर उठने लगा!
अब नदी का पानी उन महापुरुष के मुँह तक आ गया और वो डूबने लगे! फिर उन्होने भगवान से प्रार्थना करते हुये कहा कि- "हे प्रभु! मैने कभी कोई अपराध नही किया, और आज भी धर्मार्थ कार्य ही कर रहा हूँ, फिर मै क्यो डूब रहा हूँ"

अचानक सामने से आवाज आयी... "रे मूर्ख! तू क्या समझता है कि मै इस मानव को पैर नही दे सकता था, पर ये पूर्वजन्म का पापी था, अतः इसे दण्ड देने के लिये मैने लंगड़ा बनाया!
अब तुमने इसकी मदद करके मेरे विधान को चुनौती दी है, अब तू भी दण्ड भुगत, और इसके साथ ही डूब जा"

खैर ये कहानी थी, पर हमारे धर्मग्रंथ भी यह कहते हैं कि जो आज दिव्यांग है, वो पूर्वजन्म के पापी थे, और ईश्वर ने उन्हे दण्ड दिया है!
फिर आखिर किस आधार पर यही ईश्वरवादी ये कहते है कि लंगड़े-लूले अपंगो की मदद करो!
क्या ऐसा करके वो ईश्वर को नाराज नही कर रहे है?
क्या वो ईश्वर के दण्डविधान मे हस्तक्षेप नही कर रहे हैं?
आखिर अपराधी का साथ देने वाला अपराधी ही होता है, तो क्या ईश्वर इनसे रुष्ठ नही होगा?

मै एक नास्तिक हूँ, और ईश्वर तथा उसके विधान को ताख पर रखता हूँ... अतः हम अगर उसके नियम तोड़े तो लाजिमी है, पर आस्तिक क्यों ईश्वर के दण्डविधान का खुला मजाक उड़ाते हैं!

गरुणपुराण कहता है कि जो लोग आज जन्म से ही शारीरिक अपंग है, वो पूर्वजन्म मे महापापी थे, फिर धार्मिक इन पापियों से क्यों सहानुभूति रखते हैं!

गरुणपुराण अध्याय-5 श्लोक 1 से 57 तक मे तमाम पूर्वजन्म के पापियों का वर्णन है!
मै बताता हूँ कि पूर्वजन्म का पापी किस कमी के साथ जन्म लेता है!

ब्रह्महत्यारा क्षयरोगी होता है!
गौहत्यारा कुबड़ा! 
कन्या हत्यारा कोढ़ी! 
परस्त्री गमनकर्ता नपुंसक! 
गुरूपत्नि व्यभिचारी चर्मरोगी!
गुरू का निन्दक मिरगी रोगी!
झूठी गवाही देने वाला गूँगा!
पक्षपात करने वाला काना!
पुस्तक चुराने वाला अन्धा!
ब्राह्मणों को पैर से मारने वाला लंगड़ा-लूला!
झूठ सुनने वाला बहरा!
आग लगाने वाला गंजा!
अन्न चुराने वाला चूहा!
धान चुराने वाला टिड्डी!
विष देने वाला बिच्छू!
सुगन्धित वस्तु चुराने वाला छछुन्दर!
मांस चुराने वाला गीध!
नमक चुराने वाला चींटी!
फल चोरी करने वाला बन्दर!
जूता चुराने वाला भेड़!
मार्ग मे यात्रियोंको लूटने वाला बकरा!
विषपान करने वाला काला नाग!
गायत्रीपाठ न करने वाला ब्राह्मण बगुला!
अयोग्य के घर यज्ञ कराने वाला ब्राह्मण सुअर!
बिना निमंत्रण भोजन करने वाला कौआ!
गर्भपात कराने वाला भिल्ल रोगी!
कम तौलने वाला उल्लू!
सास-ससुर का अपमान करने वाली स्त्री जोंक!
पति का अपमान करने वाली नारी जूँ!
परपुरुष से सम्बन्ध बनाने वाली नारी छिपकली!
स्त्रीलम्पट पुरुष घोड़ा होता है!
ब्राह्मण का धन लेना वाला ब्रह्मराक्षस!
अपने गोत्र की स्त्री से सेक्स करने वाला लकड़बग्घा!
शराब पीने वाला सियार!

इसके अतिरिक्त और भी कई पाप और पापयोनि लिखी है!

अब आप लोग जरा सोचों कि आपने इनमे से कौन सा पाप किये है, और आप अगले जन्म किस रूप मे पैदा होंगे!

मुझे यह पढ़कर भी आनन्द आया कि जितने सुअर है, ये सब पूर्वजन्म मे ब्राह्मण थे, और अयोग्य के घर यज्ञ करवा कर बेचारे सुअर बन गये!

इसलिये जितने भी धर्मात्मा हो, आप सब लूले-लंगड़ो की मदद मत करो, अन्यथा आप अन्जाने मे अपने ईश्वर को नाराज कर रहे हो!

#नोट- मेरे इस पोस्ट का आशय किसी दिव्यांग मित्र का मजाक बनाना नही है, मै जानता हूँ कि यह सब प्राकृतिक है, और उनके साथ मेरी पूरी सहानुभूति है...
मै केवल धार्मिकों और पंडो को ईश्वरी विधान बता रहा हूँ!

मानव आयु।

वाल्मीकि रामायण युद्धकाण्ड सर्ग-128/106 मे लिखा हैं कि श्रीराम ने राजा बनने के बाद अपने भाइयों सहित अयोध्या मे 11 हजार साल तक राज्य किया....

यह बात तो ऐसी है कि जिसे सुनकर दांतो तले अगुँली दबा ले!
क्या कोई मनुष्य 11 हजार वर्ष तक जीवित रह सकता है?
क्या मनुष्यों की आयु कभी इतना होती थी?

वेदों के बाद मनुस्मृति ही सनातनियों की सबसे विश्वसनीय और मान्य धर्मग्रंथ है, अगर इसे प्राचीन संविधान कहें तो अतिशयोक्ति नही होगी!
मनुस्मृति की प्रशंसा देवगुरू वृहस्पति ने भी अपनी पुस्तक वृहस्पति स्मृति संस्कारखण्ड-13/14 मे किया है, उन्होने लिखा है--
"मनुस्मृति विरुद्धा या सा स्मृतिर्न प्रशस्यते।
वेदार्थोपनिबद्धत्वात् प्राधान्यं हि मनोः स्मृतेः।।"
अर्थात- जो स्मृति मनुस्मृति के विरुद्ध है, वह प्रशंसा के योग्य नहीं है। वेदार्थों के अनुसार वर्णन होने के कारण मनुस्मृति ही सब में प्रधान एवं प्रशंसनीय है।

यह तो मनुस्मृति का गुणगान हुआ, अब जरा देखो कि मनुस्मृति मे मनुष्यों की कितनी आयु बताई गयी है!

मनुस्मृति-1/83 मे मनु ने कहा है--
"आरोगाः सर्वसिध्दार्थाश्चतुर्वर्षशतायुषः।
कृते त्रेतादिषु ह्योषामायुर्ह्रसति पादशः।।"
अर्थात- कृतयुग (सतयुग) मे मनुष्य धर्माचरण पूर्वक सब मनोरथ सिद्ध करते हुये निरोग होकर चार सौ वर्ष पर्यन्त जीवित रहते हैं! त्रेता, द्वापर और कलियुग मे धर्म का लोप होने से क्रमशः सौ-सौ वर्ष आयु कम हो जाती है।

मनु ने इस श्लोक मे साफ बताया है कि त्रेतायुग मे मनुष्यों की आयु तीन सौ साल होती थी!
अब इसी त्रेतायुग मे राम थे, फिर भला राम 11 हजार साल कैसे जी गये?

इस पोस्ट पर मै किसी पर कोई आरोप नही लगाऊँगा, बस इतना ही कहूँगा कि वाल्मीकि और मनु मे से कोई एक तो झूठ बोल रहा है, और मेरी साधारण बुद्धि को वाल्मीकि ही झूठे नजर आ रहे हैं!
खैर फेंकना तो हमारे सनातनियों की आदत ही रही है!

अश्लीलता।

वेदों मे दो देवताओं का वर्णन मिलता है जिन्हे 'अश्विनीकुमार' कहा जाता है!
यह वही अश्विनीकुमार है जिन्होने पाण्डु की दूसरी पत्नि माद्री से 'नियोग' करके "नकुल और सहदेव" को पैदा किया था! ये अश्विनीकुमार पुराणों मे सूर्य के पुत्र माने गये हैं, पर इनके जन्म की कथा भी बड़ी रोचक है!

"ब्रह्मपुराण" हिन्दूधर्म का प्रथम पुराण है, जो सबसे पहले लिखा गया और जिसे सारे पुराणों से अधिक प्रमाणिक माना जा सकता है! इसी ब्रह्मपुराण के "गारुड़तीर्थ और गोवर्धनतीर्थ की महिमा" अध्याय मे एक कथा आती है....
सूर्यदेव की पत्नि का नाम ऊषा था, ऊषा बहुत सुन्दर और पतिव्रता थी तथा सूर्य से उसने दो पुत्र मनु और यम को जन्म दिया था, इसके अलावा उनकी एक पुत्री यमुना भी थी!
ऊषा यूँ तो सूर्यदेव से बहुत प्रेम करती थी, पर कई बार उससे सूर्य का तीव्र ताप सहन नही होता था! वह चाहती थी कि कुछ दिनों के लिये सूर्य से दूर कही शीतल जगह पर विश्राम करने चली जाये, पर उसे यह भी मालुम था कि सूर्य उसके बिना रह नही पायेगे, और व्याकुल होकर खोजने लगेगे!
एक दिन ऊषा ने एक उपाय निकाला, उसने अपने ही जैसी एक दूसरी महिला "छाया" को अपनी माया से बनाया और उसे समझाया कि तुम मेरी जगह सूर्य की प्रेयसी बनकर रहो, तथा मेरी आज्ञा से मेरे पति (सूर्य) की सेवा और मेरे बच्चों का पालन करो, और हाँ... यह भेद किसी से प्रकट मत करना! 
छाया को ऐसा आदेश देकर, उसे अपने ही कक्ष मे छोड़कर ऊषा सूर्य से दूर चली गयी! उसने सोचा कि सूर्य छाया को देखकर उसे ही समझेगे और ढ़ूढ़ेगे नही!

शाम को जब सूर्यदेव भ्रमण से वापस आये तो वो न जाने कैसे छाया को देखकर यह पहचान लिया कि यह मेरी पत्नि ऊषा नही है, अतः वो व्यग्र होकर ऊषा को खोजने लगे!

इधर ऊषा उत्तरकुरू नामक स्थान पर आयी और "घोड़ी" का रूप बनाकर तप करने लगी! सूर्यदेव ऊषा को खोजते हुये उसी स्थान पर पहुँचे, और घोड़ी बनी ऊषा को देखकर पहचान गये तथा खुद भी घोड़ा बनकर उसके पास गये! ऊषा घोड़े को देखकर उसकी नियत भांप गयी, और पर-पुरुष की आशंका से वह भागकर गौतमी नदी के तट पर आ गयी! सूर्यदेव घोड़ा बनकर उसका पीछा करते हुये वहाँ भी पहुँच गये, और तब उन्होने घोड़ीरूपी ऊषा को बताया कि मै तुम्हारा पति सूर्य हूँ!
इसके बाद घोड़ीरूपी ऊषा ने घोड़ारूपी सूर्य से समागम किया तथा उसी के परिणाम-स्वरूप दोनो अश्विनीकुमारों का जन्म हुआ!

अब जरा सोचना कि घोड़ी बनी ऊषा मनुष्य जैसे पुत्रों को जन्म कैसे दे सकती है?
दूसरी बात क्या जानवर-योनि मे देवों को सहवास करने मे अधिक आनन्द आता था, जो वो ऐसा प्रयोग करते थे?
तीसरी बात यदि वो ऐसा करते ही थे तो पौराणिक-लेखकों को क्या जरूरत थी इसे लिखने की?

हाँ.... चौथी बात मेरी तरफ से, पढ़ो और आनन्द लो, क्योंकि इसे पढ़ने के बाद पोर्न-मूवी देखने की भी इच्छा नही होगी!

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#अप्राकृतिक_मैथुन

पुराणों मे कई जगह ऐसा उल्लेख मिलता है कि पुरातनकाल मे ऋषि-मुनि आप्राकृतिक तरीके से अपना वीर्य स्खलन करते थे!

सवाल यह होता है कि क्या पुरातन भारत मे लोग आप्राकृतिक मैथुन करते थे, जैसे हस्तमैथुन या जानवर से मैथुन आदि!

रामायणकाल मे एक ऋषि (विभण्डक) की कथा मिलती है! एक बार विभण्डक ऋषि ने जंगल मे उर्वशी को देखा, और उन्होने कामाशक्त होकर जल मे ही वीर्यपात कर दिया, इनके वीर्य को एक हिरनी ने पी लिया और वह गर्भवती हो गयी!
वीर्य पीने से हिरनी का गर्भवती होना नामुमिकन है, हाँ अगर दूसरे तरीके से हिरनी के गर्भ मे वीर्य ना पहुचाया गया हो!
यह तो प्रक्षेपण कहानी थी, जबकि सच यह होगा कि विभण्डक की कामाग्नि जब बर्दाश्त के बाहर हो गयी तो उन्हे साममे खड़ी हिरनी भी उर्वशी नजर आने लगी होगी!

महाभारत के आदिपर्व मे भी ऐसी ही दो घटनाऐं है....
एक बार भारद्वाज ऋषि स्नान करने जा रहे थे, कि अचानक उन्हे घृताची अप्सरा दिखी... 
अप्सरा को देखते ही ऋषि का वीर्य गिर पड़ा और उसी से द्रोणाचार्य पैदा हुये!
दूसरी घटना विश्वामित्र की है..... जब विश्वामित्र ने मेनका को देखकर अपनी तपस्या भंग की और उसी का परिणाम शकुन्तला का जन्म हुआ!

इन कथाओं के बारें मे आचार्य रजनीश (ओशो) भी कहते थे कि अप्सराओं को क्या जरूरत थी ऋषि-मुनियों के सामने नग्न होकर नाचने की, जबकि ना जाने कितने लोग उनके लिये अपना सर्वत्र लूटाने को तैयार थे!
ओशो का कहना था कि ये अप्सराऐं मानसिक थी, ये उन ऋषियों के मन मे दबी हुई वासनाये थी! 
ऋषियों ने अपनी वासनाओं को इतनी बुरी तरह से दबाया था कि वो दबते-दबते इतनी प्रगाढ़ हो गयी कि खुली आँख अप्सराओं के सपने देखने लगे!
ये कुछ और नही बल्कि उनकी कल्पना (संभ्रम) मात्र था!

यह बात भी सच है कि जिस तरह कई दिनों से प्यासे मनुष्य को चमकीली रेत भी पानी सी प्रतीत होती है, उसी तरह कई वर्षों तक वासनाऐं दबाने से उसका वीभत्स रूप सामने आने लगता है, जिसे आप अप्राकृतिक मैथुन भी कह सकते हो!

हमारे ऋषि-मुनि ईश्वर की तलाश मे जंगलों मे तो चले जाते थे, और उस समय उन्हे यह बड़ा सहज लगता था कि हम अध्यात्म से काम (Sex) को वश मे कर लेंगे, पर ऐसा होता नही था! फिर जब काम उन पर हावी होता था तो उनका हाथ बर्बस उनके शिश्न तक चला जाता था, और उसी को पुराणों मे वीर्य स्खलन लिखा गया है! 
जो कभी घड़े मे... 
कभी दोने मे....
कभी जल मे....
तो कभी-कभी पशुओं (जैसे हिरनी आदि) मे....

खजुराहों मे भी पशुमैथुन की एक मूर्ति है! यह मूर्ति भी मूर्तिकार की कल्पनामात्र नही है, बल्कि उस दौर की विकृति को दर्शाती है!

रही बात उर्वशी और रम्भा की तो उन्हे ऋषियों के पास आने की क्या जरूरत थी! उनकी जैसी सुन्दरियों के साथ समागम करने के लिये बड़े-बड़े राजा-महाराजा अपना सब कुछ हथेली पर लेकर कतार मे खड़े रहते थे, तो फिर भला उर्वशी-रम्भा इन नंगे-फकीर ऋषियों के पास वीरान जंगलों मे क्या करने जाती!

पुराणों मे लिखा है कि इन्द्र ऋषियों की तपस्या भंग करने के लिये उर्वशी,रम्भा और मेनका जैसी अप्सराओं को इनके पास भेजता था!
पर ओशों कहते थे कि न तो इन्द्र किसी को भेजता था और ना ही कोई उर्वशी आती थी! इन्द्र तो खुद ऋषि-मुनियों की पत्नियों के पीछे पड़ा रहता था! वो क्यों अपनी अप्सराओं को इनके पास भेजेगा!

ओशो का यह भी कहना था कि धर्मग्रंथों मे जो चीजें वर्जित की गयी है, वो उस समय मे बहुतायत होती थी, फिर उसे रोकने के लिये धर्मग्रंथों मे उसे पाप बताया गया, ताकि नर्क मे जाने के डर से लोग उसे करना छोड़ दे!

पुरातन भारत मे आप्राकृतिक मैथुन निश्चित ही होता होगा, तभी तो मनु ने मनुस्मृति मे इसे पाप बताया है!

मनुस्मृति -11/173 मे मनु ने लिखा है-
"मानुषीषु पुरुष उदक्यायामयोनिषु।
रेतः सिक्त्वा जले चैव कृच्र्छं सान्तपनं चरेत् ।।"

अर्थात- जो मनुष्य अमानुषीय (मनुष्य से भिन्न योनि मे, जैसे जानवर आदि) रजस्वला स्त्री से, अथवा योनि से भिन्न स्थान मे (जैसे गुदामैथुन) और जल मे वीर्यपात करता है, वह कृच्र्छसान्तपन करने से शुद्ध होता है।

यह श्लोक उस दौर की सच्चाई से अवगत करा रहा है!

कुल मिलाकर सच यही है कि किसी भी ऋषि-मुनि के पास जंगल मे अप्सराऐं नही आती थी, बल्कि उनके अन्दर वर्षों से दबी वासनाऐं ही उनके सामने अप्सरा बनकर नग्न नृत्य करती थी! अब चूकिः ये ऋषि जंगल मे तप करने जाते थे तो वहाँ कोई स्त्री नही मिलती थी, फिर ये आप्राकृतिक तरीके से अपनी हवस को शांत करते थे!

नोट- इस लेख के कुछ अंश ओशो के प्रवचन का हिस्सा है!


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आज आधुनिक समय मे विज्ञान ने भले ही इतनी तरक्की कर ली है, फिर भी मानव के अण्डकोष (Testis) का प्रत्यार्पण शायद ही कभी हुआ हो!

अण्डकोष जन्म के समय से ही पुरुष शरीर का महत्वपूर्ण अंग होता है!
यह पुरुषत्व का प्रमाण होता है, और शरीर मे उत्तेजना हेतु द्रव का निर्माण करता है! यह चमड़े की एक सिकुड़ी थैली जैसी होती है, जिसमे दो स्क्रोटम होते है!

यह स्क्रोटम दो भागो मे बटा होता है, जो लिंग (Penis) के अगल-बगल नीचे की और होता है!
पुरुष का बायाँ अण्डकोष दायें से थोड़ा अधिक लटका रहता है, और ये स्क्रोटम ठंड मे सिकुड़ जाते हैं, जबकि उत्तेजना के समय ऊपर की और आ जाते है!

जब मनुष्य प्रजनन करता है तो उसके दो अंग बहुत महत्वपूर्ण होते है!
पहला अण्डकोष, और दूसरा लिंग!

अण्डकोष का काम होता है कि वह पहले पुरुष को उत्तेजित करने के लिये हारमोन्स तैयार करता है, और बाद मे शुक्राणु (Sperm) बनाता है!
लिंग इन्ही शुक्राणुओं को स्त्री के योनिमार्ग से गर्भाशय तक पहुँचा देता है, और स्त्री गर्भवती हो जाती है!

अब आप सोच रहे होंगे कि मै ये सब क्यों बता रहा हूँ, तो इससे ही जुड़ा मेरे पास एक धार्मिक प्रश्न है!

रामायण के अनुसार जब देवराज इन्द्र ने गौतम ऋषि का वेष बनाकर उनकी पत्नि अहिल्या से दुष्कर्म किया, तब ऋषि गौतम ने उन्हे श्राप दिया था कि- "हे इन्द्र! मै तुम्हे श्राप देता हूँ कि तुम्हारा अण्डकोष कटकर भूमि पर गिर जाऐं"

ऋषि के श्राप से इन्द्र अण्डकोष विहीन हो गये, देवताओं के लिये यह बड़ी शर्म की बात थी कि उनके राजा के पास अण्डकोष ही नही था!
सारे देवताओं ने एक उपाय खोजा और देवराज को एक भेड़े (Sheep) का अण्डकोष लगा दिया!

यह वैदिककाल की पहली सफल अण्डकोष सर्जरी थी, जिसमे एक मनुष्य को एक जानवर का अण्डकोष प्रत्यार्पण किया गया!

अब सवाल यह है कि इन्द्र और उनकी पत्नि शचि की दो संतान थी, पुत्र जयन्त और पुत्री जयन्ती!
अब अगर इन्द्र ने भेड़ वाले अण्डकोष से प्रजनन किया तो उनकी संतान भेड़ जैसी पैदा होनी चाहिये थी, क्योकि भेड़ का अण्डकोष भेड़ के ही DNA वाले शुक्राणु (Sperm) पैदा करेगा!

दूसरा सवाल देवता इतने शक्तिशाली थे कि संसार मे कोई भी कार्य उनके लिये असम्भव नही था, फिर देवराज को क्या जरूरत थी कि वो भेड़े का अण्डकोष इस्तेमाल करें...

मेरा आशय देवी-देवताओं का मजाक बनाना नही है, मै केवल यह बताना चाहता हूँ कि धर्मग्रंथों मे लिखी बातें 80% झूठी है, इस पर विश्वास करने का कोई ठोस प्रमाण नही है!

यह सारा वृतान्त बाल्मीकि रामायण/बालकाण्ड, सर्ग-49 पृष्ठ सं०-123 पर लिखा गया है!

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एक बार विष्णु जी ने किसी बात पर नाराज होकर लक्ष्मीजी को घोड़ी बनने का श्राप दे दिया..... फिर क्या था पलक झपकते ही लक्ष्मी घोड़ी बन गयी!
विष्णु ने निवारण के लिये कहा कि जब तुम एक पुत्र को जन्म दोगी तो फिर से अपने वास्तविक स्वरूप मे आ जाओगी!

लक्ष्मी जी घोड़ी बनकर सुपर्णाक्ष नामक स्थान पर आ गयी, और सोचने लगी कि मै जब तक पुत्र को जन्म नही दूँगी तब तक श्रापमुक्ति नही मिलेगी, पर पुत्र होगा कैसे?

यही विचार करके उन्होनेे शिवजी को ध्यान लगाया.....

भगवान शिव समझ गये कि जब तक पुत्र नही होगा ये बेचारी घोड़ी ही बनी रहेगी.......
पर पुत्र होगा कैसे?

ये यहाँ है, और विष्णु वैकुण्ठ मे.....  लक्ष्मी किसी दूसरे घोड़े के साथ मुँह काला करना नही चाहती थी....

यही सोचकर शिव ने विष्णु को फटकार लगायी, शिव की बात मानकर विष्णु शीघ्र घोड़ा बनकर लक्ष्मी के पास पहुँचे और फिर दोनो के संसर्ग से लक्ष्मी ने एक पुत्र को जन्म दिया!
इस पुत्र का नाम "एकवीर" रखा और यही आगे चलकर क्षत्रियों के हैहयवंश जन्मदाता बना।

अब सवाल यह है कि क्या यह कहानी सच है? अगर सच है तो विष्णु कैसे भगवान है जो खुद की पत्नि और समृद्धि की देवी लक्ष्मी को घोड़ी बना देते है!
क्या खुद को गौरवशाली समझने वाले हैहयवंशी क्षत्रिय घोड़ी से पैदा हुऐ?
क्या हिन्दुओं के सर्वमान्य परमेश्वर विष्णु इतने निर्लज्ज थे कि घोड़ा/घोड़ी बनकर पुत्र पैदा करते थे?

ये कथा कई प्रश्न पैदा कर रही है, जिस पर आप भी विचार कर सकते हो! वैसे पुराणों मे लिखी हर कथा को महंत और कथावाचक लोग नाच-गाकर बताते हैं, पर इस कथा को पंडे-पुरोहित दबाकर ही रखते हैं! मै चाहता हूँ कि इस कथा के माध्यम से आप सब धर्माधिकारियों से सवाल करो कि विष्णु कैसे भगवान थे जो खुद की पत्नि को घोड़ी बनाते थे और दूसरे (जलंधर) की पत्नि (वृन्दा "तुलसी" ) से छल करते थे!

श्रोत:- देवीपुराण/छठा स्कन्ध (अध्याय-18, पृष्ठ संख्या- 442)


आत्मरक्षा, न्याय के लिए हिंसा।

तथागत बुद्ध हमेशा हिंसा के विरुद्ध थे, लेकिन सदा ही न्याय के पक्ष मे थे! पर जहाँ न्याय के लिये हिंसा जरूरी हो, वहाँ क्या किया जाये, यह बड़ा सवाल उनके सामने भी आता था?

एक बार वैशाली के मुख्य सेनापति ने आकर बुद्ध से पूँछा-
भगवन्! आप अहिंसा का उपदेश देते हो। आपके अनुसार क्या एक अपराधी को दण्ड से मुक्त रखा जाये?
भगवन्! क्या हम अपने बीवी, बच्चे और धन की रक्षा के लिये युद्ध न करें?
क्या हम सभी प्रकार के युद्ध से विरत होकर अहिंसा के नाम पर अपराधियों द्वारा सताये जायें?

तब बुद्ध ने उत्तर दिया-
हे सेनापति! आपने मेरे उपदेशों का गलत अर्थ लिया है। एक निर्दोष व्यक्ति की रक्षा होनी चाहिये पर अपराधी को सजा अवश्य मिलनी चाहिये। अपराधी को सजा देने से दण्डाधिकारी को दोष नही होता, क्योंकि सजा का कारण तो अपराधी का स्वयं का कृत्य है। कोई व्यक्ति जो न्याय के लिये लड़ता है वह अहिंसा का दोषी नही होता, इसी तरह अपराधी को सजा देने से दण्डाधिकारी दोषी नही माना जायेगा। यदि शांति स्थापित करने के सारे प्रयास विफल हो जाये तो हिंसा का उत्तरदायित्व युद्ध प्रारम्भ करने वाले पर होता है। शांति स्थापित करने के लिये युद्ध हो सकता है, पर युद्ध कभी स्वार्थ-सिद्धि के लिये नही होना चाहिये।

तथागत बुद्ध ने इन बातों से बहुत कुछ साफ कर दिया था। वे हिंसा के विरोध मे जरूर थे, पर न्याय की रक्षा के लिये हथियार उठाने को हिंसा नही मानते थे।

लगभग यही बातें सारे महापुरुषों के जीवनकाल मे घटी है, पैगम्बर मोहम्मद ने कई युद्ध ऐसे किये जो प्रतिरक्षा मे थे, लेकिन कई बार वो धर्म का विस्तार करने के लिये छोटे-छोटे कबीलों पर हमले करते थे, जो शायद अनुचित-कृत्य था!

श्रीकृष्ण ने भी अपने जीवन मे कभी किसी पर हमला नही किया, बल्कि दूसरों ने उन पर आक्रमण किया और वो आत्मरक्षा के लिये युद्ध करते रहे। पर एक बार इन्होने भी यह अनुचित-कृत्य किया है!
दरअसल इनकी पत्नि सत्यभामा ने एक बार इनसे कहा कि- "हे सइयां! हमको पारिजात का फूल चाहिये"
फिर क्या था... इन्होने कहा "हे गोरी! फूल क्या, हम तुम्हे पूरा पारिजात का पेड़ ही लाकर देंगे"
इसके बाद कृष्ण मे अमरावती पर हमला कर दिया!
समझ नही आता कि कृष्ण को इतना बड़ा जोरू का गुलाम बनने की क्या जरूरत थी?

तथागत बुद्ध की बात सही थी, अगर शांति-स्थापना के लिये तलवार उठाना पड़े तो जरूर उठाये, पर स्वार्थ-निहित हिंसा कभी नही करनी चाहिये।

बाइबल (न्यू टेस्टामेंट) Luke-22/36 मे जीसस ने भी कहा है कि "जिसके पास तलवार नही है, उसे अपना अंगरखा (वस्त्र) बेंचकर भी तलवार लेनी चाहिये"
शायद जीसस भी आत्मरक्षा के लिये ही तलवार खरीदने की सलाह दे रहे थे। अब तलवार से कोई सब्जी तो काटेगा नही...

कुल मिलाकर यही सच है कि आत्मरक्षा के लिये यदि हिंसा होती है तो कोई बात नही, पर कभी धर्म-विस्तार के लिये, या अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिये हिंसा का मार्ग उचित नही हो सकता।

इंद्र।

एक बात मेरी समझ से परे हैं कि आखिर देवराज इन्द्र मे ऐसा कौन सा गुण था जिसके चलते उन्हे स्वर्ग का राजा बनाया गया था?
उनसे कहीं अधिक गुणवान तो नर्क के राजा यमराज थे। इन्द्र तो वासनाग्रस्त और हवस के पुजारी तो थे ही, साथ ही कायर भी थे, जो लगभग तमाम युद्धों असुरों से हार जाते थे।

इन्द्र किस कदर वासना के अधीन थे इसका उदाहरण अहिल्या प्रकरण तो हैं ही, इसके अतिरिक्ति भी इन्द्र ने कई और बड़े काण्ड किये थे।
एक पौराणिक कथा के अनुसार अरूणदेव (सूर्यदेव के सारथी) ने एक बार स्त्री का रूप बनाकर (क्योंकि इन्द्र की सभा मे पुरुषों का आना निषेद्य था) इन्द्र की सभा मे अप्सराओं का नृत्य देखने गये। अचानक इन्द्र की नजर एक कोने मे स्त्री बनकर खड़े अरुणदेव पर पड़ी।
इन्द्र ने सोचा कि यह फुलझड़ी कौन है जो अब तक मेरे हाथ नही लगी?

इन्द्र अपने सिंहासन से उठकर अरुणदेव की तरफ लपके! अरूणदेव भी स्थिति को भांपकर भागे, पर इन्द्र ने उन्हे तेजी से झपटकर पकड़ लिया।
बेचारे अरुणदेव छटपटाते रहे, पर इन्द्र ने एक न सुनी और अरुणदेव की नथ उतार ही दिया! इस मधुर-मिलन का परिणाम यह हुआ कि स्त्री-रूपधारी अरुणदेव गर्भवती हो गये और कालान्तर मे उनके गर्भ से वानरराज बालि का जन्म हुआ।

इन्द्र के कामपिपासा की एक कथा श्रीनरसिंहपुराण अध्याय-63 मे भी मिलती है- 
"कथानुसार एक बार इन्द्र ने सोचा कि मैने स्वर्ग का सुख बहुत भोग लिया, अब कहीं एकांत मे चलकर तप करके मोक्षप्राप्ति का साधन किया जाये।
ऐसा सोचकर कैलास-पर्वत के निकट आ गये और वहाँ उन्होने यक्षराज कुबेर की पत्नि चित्रसेना को देखा! चित्रसेना बहुत सुन्दर थी और उसकी सुन्दरता पर इन्द्र मुग्ध हो गये। इन्द्र ने सोचा कि कुछ भी करके मुझे यह सुन्दरी प्राप्त करनी ही है।
उस समय इन्द्र की हालत भी वही थी कि "निकले थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास"
बेचारे गये थे मोक्ष ढ़ूढ़ने पर फिर से सुन्दरता के जाल मे फँस गये। इन्द्र ने चित्रसेना को पाने के लिये कामदेव का आह्वान किया! जब कामदेव आये तो इन्द्र ने उन्हे सारी स्थिति बतायी और कहा कि तुम अपने कामबाणों से इस सुन्दरी की कामाग्नि भड़का दो, और मै तत्काल उसके सम्मुख जाकर मौके का फायदा उठा लूँगा।

कामदेव ने कहा, "देखो देवराज! एक बार मै इसी कैलास पर भस्म हो चुका हूँ, अब तुम दूसरी बार मुझे खतरा उठाने के लिये कह रहे हो"
कामदेव के बारम्बार समझाने पर भी इन्द्र न माने और मजबूरन कामदेव ने चित्रसेना पर कामबाण चला दिया।
जैसे ही चित्रसेना काममोहित हुई, इन्द्र ने उसी क्षण उसके पास जाकर प्रणय-प्रस्ताव रख दिया और उसे अपने रथ पर बैठाकर मन्दराचल की गुफाओं मे लेकर चले गये। इन्द्र ने कामवेदना से पीड़ित चित्रसेना संसर्ग करके स्वर्ग की अप्सराओं से भी अधिक सुख का अनुभव किया।"

इसके आगे काफी लम्बी कहानी है कि नाडीजङ्घा नामक एक राक्षसी की मदद से कुबेर ने अपनी पत्नि का पता लगाया!
बाद मे इन्द्र ने नाडीडङ्घा राक्षसी को मार डाला और क्रोध मे आकर तृणबिन्दु मुनि इन्द्र को श्राप देकर स्त्री बना देते हैं।

उक्त कथाऐं भी इन्द्र की विलासिता का अन्त नही है, पुराणों मे ऐसी कई कथाऐं हैं जो बताती हैं कि इन्द्र परस्त्री-हरण, परस्त्री-गमन का अपराध करते थे, फिर भी त्रिदेवों ने इन्द्र को हमेशा माफ भी किया और उन्हे कभी अपदस्थ भी नही किया।

दूसरी बात जब श्रीकृष्ण ने तीन मुट्ठी चावल के बदले स्वर्ग और धरती का सारा वैभव सुदामा को दे दिया था, तब भी यह ज्ञात नही होता कि सुदामा ने आखिर कितने दिनों स्वर्ग और धरती पर राज्य किया था?

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मै अक्सर ओशो को पढ़ता हूँ, ओशो बड़े कटु अन्दाज मे पौराणिक ऋषि-मुनियों की आलोचना करते थे! शायद यही वजह थी कि हिन्दू ओशो से बहुत घृणा करते थे...
पर ओशो ने कभी किसी की झूठी आलोचना नही की, उनकी बातों मे तर्क और तथ्य दोनो होता था!

ओशो का मानना था कि पौराणिक ऋषियों को भी सुन्दर स्त्रियों की लालसा थी, कई बार इनकी स्त्रियाँ इनसे उम्र मे काफी छोटी होती थी!

एक बात ध्यान रखना कि काम को सामान्यतः कोई जीत नही पाया, न तो ऋषि-मुनि और न ही इनकी पत्नियाँ!
यह तो सबको पता ही है कि देवगुरू वृहस्पति की पत्नि तारा और चन्द्रदेव (चन्द्रमा) के बीच अनैतिक सम्बन्ध थे, और इन दुराचार से 'बुध' नाम का एक पुत्र भी पैदा हुआ था!

ऐसी ही एक और ऋषिपत्नि थी "अहिल्या" 
अहिल्या ऋषि गौतम की पत्नि थी, जो बहुत सुन्दर थी!
अहिल्या की सुन्दरता पर स्वयं देवराज इन्द्र भी फिदा थे! कहते हैं कि एक बार इन्द्र और चन्द्र ने मिलकर गौतम ऋषि को बेवकूफ बनाया!
गौतम ऋषि प्रतिदिन सुबह मुर्गे की बांग सुनकर नहाने जाते थे, और इसी का लाभ लेकर चन्द्र ने एक दिन समय से पहले ही मुर्गा बनकर बांग दे दी!
गौतम ऋषि धोखे मे आकर नहाने चले गये, मौका पाकर इन्द्र गौतम का वेष बनाकर अहिल्या के पास आये ट्वेन्टी-ट्वेन्टी खेलकर भाग निकले... 
जिससे क्रोधित होकर गौतम ऋषि ने अहिल्या को श्राप देकर पत्थर बना दिया, क्योंकि उसने अपने पति के रूप मे आये इन्द्र को पहचानने मे भूल की!

हांलाकि यह कहानी सच नही है, सच तो यह है कि अहिल्या ने स्वयं इन्द्र के साथ संसर्ग किया था!

यह सच है कि चन्द्र मुर्गा बनकर बोले थे, पर इन्द्र ने अहिल्या से छल नही किया था!

बाल्मीकि रामायण/बालकाण्ड सर्ग-48/17-21 मे साफ लिखा है कि जैसे ही गौतम ऋषि स्नान करने अपनी कुटिया से निकले, देवराज इन्द्र अन्दर आ गये!
इन्द्र ने अहिल्या से कहा- हे देवी! मे देवराज इन्द्र हूँ, मैने तीनों लोकों मे तुमसे सुन्दर स्त्री नही देखी! तुम अद्वितीय रूपवती हो, मै तुमसे रतिक्रिया (सम्भोग) करना चाहता हूँ!
इन्द्र चालाक थे, उन्हे मालूम था कि महिलाऐं अपनी प्रशंसा सुनना बहुत पसन्द करती है....

                इन्द्र के मुँह से अपने रूप की प्रशंसा सुनते ही अहिल्या के पाँव जमीन पर नही रहे, वो सोचने लगी कि "हाय,, मै इतनी सुन्दर हूँ कि स्वयं देवराज मुझसे प्रणय के लिये विनती कर रहे है, मेरे अहो भाग्य!"
और फिर अहिल्या तैयार हो गयी!
जब इन्द्र ने गौतम ऋषि की कुटिया मे भरपूर 'बरसात' कर ली, तब अहिल्या से बोले कि- 'हे देवी! मुझे बहुत आनन्द आया, मै अब संतुष्ट हुआ'
अहिल्या ने कहा कि मै भी आपसे तृप्त हुई, पर इससे पहले की मेरे पति आ जाये, आप यहाँ से चले जाओ।

                कहते हैं कि हाथी पालना तो आसान होता है, पर उसका चारा देना मुश्किल है!
ऋषि-मुनि अधेड़ अवस्था मे भी सुन्दर कन्याओं से शादी कर लेते थे, पर क्या वो अपनी पत्नियों को खुश रख पाते थे, यह बड़ा प्रश्न था! और अहिल्या की घटना भी यही बताती है।

चलो अगर एक बार मान भी लें कि इन्द्र ने अहिल्या से छल किया, और अहिल्या इन्द्र को पहचान ही नही पायी तो फिर क्यों गौतम ऋषि ने अहिल्या को श्राप दिया?

फिर तो उस दिन केवल अहिल्या ही नही, गौतम ऋषि भी छले गये थे!
गौतम ऋषि ब्रह्मज्ञानी थे, और इतना तपोबल था कि किसी को श्राप देकर पत्थर बना सकते थे, पर उस समय इनका तपोबल कहाँ चला गया था, जब ये चन्द्रमा की नकली बांग को असली मुर्गे की आवाज समझ बैठे!

अगर गौमत जैसे दिव्यऋषि को यह ज्ञान नही हो पाया कि चन्द्रमा उन्हे छल रहा है, तो अहिल्या कैसे जान पायेगी कि इन्द्र मेरे पति के रूप मे आये हैं!

गौतम ऋषि का अहिल्या को श्राप देना सर्वथा अनुचित था!
अहिल्या इन्हे भी तो श्राप दे सकती थी, कि तुम धोखे मे आकर आधी रात को नहाने क्यों गये। और अगर महर्षि बाल्मीकि की बात सत्य है तब भी गौतम ऋषि ही दोषी है, अगर वो अहिल्या को संतुष्ट रखते तो शायद वो इन्द्र के प्रस्ताव को न स्वीकार करती!

Sunday, 28 March 2021

मांस।

पुराणों मे कई जगह ऐसा लिखा है कि पौराणिक-काल मे ऋषि-मुनि इतने सामर्थ्यवान होते थे कि अपने तपोबल से कोई भी असाध्य-कार्य क्षणमात्र मे कर डालते थे।
पुराण कहते हैं कि प्राचीन ऋषियों ने संकल्पमात्र से ऐसे-ऐसे कार्य कर दिये जो सम्भव ही नही थे। जैसे कि माण्डव ऋषि का सशरीर यमलोक जाना और अगस्त्य ऋषि पूरा समुद्र पी जाना, इत्यादि!

             वैसे इन कथाओं को सुनने के बाद साधारण-बुद्धि से भी यही लगता है कि ये बातें झूठी हैं। अब मै आपको मनुस्मृति से कुछ ऐसे श्लोक दे रहा हूँ जो यह प्रमाणित कर देंगी कि ऋषि-मुनि कोई भी चमत्कार करने मे समर्थ नही थे।

                मनुस्मृति काफी प्राचीन ग्रंथ है इसमे कोई शक नही है। मनुस्मृति मे कहीं भी शिव और विष्णु तक का उल्लेख नही है। मतलब यह ग्रंथ इतना तो प्राचीन है ही कि शिव और विष्णु वाली कथाऐं इस ग्रंथ के बाद हिन्दू समाज आयी। इसी मनुस्मृति के दसवें अध्याय मे मनु ने यह बताने का प्रयास किया है कि मांस खाना विषम परिस्थिति मे पापाचार नही है। 

          मनु ने लिखा है कि यदि आप भूख से व्याकुल हो, और आपके पास खाने की कोई दूसरी सामाग्री नही है तो आप मांस खा सकते हो, इससे तनिक भी पाप नही लगेगा! अपनी इसी बात को प्रमाणित करने के लिये मनु ने कुछ उदाहरण भी दिये हैं, जिसमे उन्होने बताया है कि प्राचीनकाल मे किस तरह बड़े-बड़े ऋषि भी भूख से व्याकुल होने के बाद कुत्ते तक का मांस खाने के लिये विवश हो गये थे, लेकिन फिर भी उन्हे पाप नही लगा।

इसी कड़ी मे मनु ने मनुस्मृति-10/105-108 (चित्र देखें) मे लिखा है कि पूर्वकाल मे ऋषि विश्वामित्र और वामदेव ने भूख से अपने प्राणों की रक्षा करने के लिये कुत्ते के भांस का भक्षण किया, फिर भी वे पापरहित बने रहे।

            अब मेरा सवाल यह है कि यदि ऋषि-मुनि अपने तपोबल से कुछ भी करने मे समर्थ थे तो क्या इसी तपोबल से वे अपने लिये स्वादिष्ट भोजन या फल की व्यवस्था नही कर पाये? तब उनका तपोबल कहाँ चला गया था जब वे प्राणरक्षा हेतु कुत्ते जैसे जीव का मांसाहार करने को विवश हुये?

वामदेव के चमत्कारों को तो सभी जानते हैं, ये दशरथ के पूज्य भी थे। विश्वामित्र के बारे मे जितना कहा जाये कम ही होगा, इन्होने तो अपने पतोबल से राजा त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया था। ऐसे महातपस्वी भी अपने लिये न तो भोजन एकत्र कर पाये और न ही अपने तप से अपनी भूख को नियंत्रित कर पाये।

बात स्पष्ट है, ये तपोबल वाली सारी कहाँनिया भोले-भाले लोगों को बेवकूफ बनाने के लिये गढ़ी गयी हैं, अन्यथा वेद-वेदान्त के ज्ञाता और इतने बड़े तपस्वी ऋषियों ने कुत्ते का मांस खाना क्यों स्वीकार किया?

शिव कामुकता।

पिछले कुछ दिनों से इस बात पर बहस छिड़ी है कि क्या धर्मग्रंथों मे विज्ञान है?
भाजपा नेता डा० हर्षवर्धन और सत्यपाल सिंह ने तो यहाँ तक कह दिया कि वेद विज्ञान से भी बड़े है...

वैसे वेदों मे विज्ञान है या नही, ये तो बाद की बात है, पर भागवतपुराण मे विज्ञान जरूर है!

सोना-चाँदी की उत्पत्ति के बारे मे वैज्ञानिक बताते हैं कि करीब 20 करोड़ साल पहले पृथ्वी पर धूमकेतुओं की वर्षा हुई थी, और उससे पिघले खनिज ही आज सोना और चाँदी के रूप मे मौजूद है!
पर वैज्ञानिक क्या जाने सच क्या है, सच तो हमारे धर्मग्रंथों मे लिखा है।

भागवतपुराण द्वितीयखण्ड मे सोना-चाँदी की उत्पत्ति के बारें मे पूरी कहानी बतायी गयी है--
एक बार शिवजी विष्णु से मिलने गये, और उन्होने विष्णु से निवेदन किया कि आप मुझे वही मोहिनी वाला रूप दिखा दो, जिसे देखकर असुरों ने आपको अमृत का घड़ा दे दिया था!
विष्णु ने कहा कि उचित समय पर आपको वह रूप जरूर दिखा दूँगा!

कुछ समय बाद एक दिन शिवजी पार्वती के साथ कहीं जा रहे थे, अचानक उन्होने एक सुन्दर स्त्री को देखा! वह स्त्री एक गेंद को उछालकर खेल रही थी, और जब वह गेंद को ऊपर उछालती तो उसके स्तन जालीदार कपड़ों से बाहर झांकने लगते थे... 
उसे देखते ही शिवजी मदहोश और कामातुर हो गये, शिवजी ने इतनी सुन्दर स्त्री कभी नही देखी थी! वह स्त्री कोई और नही, बल्कि मोहिनी रूप मे विष्णु ही थे।

शिवजी मोहिनी को पकड़ने के लिये उसकी तरफ दौड़े, वे कामपिपासा से इस तरह व्यग्र थे कि यह भी भूल गये कि उनके साथ पार्वती भी है!

शिवजी को अपनी तरफ आता देखकर मोहिनी भी उनसे दूर जाने लगी...
अब तो शिवजी अपना त्रिशूल फेंककर उसकी तरफ ऐसे झपटे जैसा किसी गाय के पीछे मतवाला सांड़ भागता हो!

मोहिनी रूपधारी विष्णु भी समझ गये कि मैने 'मोहिनी' बनकर आफत मोल ले लिया है, अब अगर इस भंगेड़ी के हाथ लग गये तो मेरी सजी-सजाई हवेली खण्डहर बन जायेगी...
फिर क्या था, अपनी जान बचाकर मोहिनी भी भागी!
शिवजी मोहिनी के अद्भुत सौन्दर्य को देखकर कामाग्नि मे जल रहे थे, उन्होने मोहिनी को पूरी ताकत झोककर खदेड़ लिया कि 'कहाँ तक भागकर जाओगी छम्मक-छल्लो'

शिवजी किसी कामुक घोड़े की तरह मोहिनी को पकड़ने के लिये दौड़ रहे थे, वे इतने कामातुर हो गये थे कि यूँ समझ लो कि भुसावली केला छिलके के बाहर आ गया, और शिवजी का वीर्य टपकने लगा...

शिवजी का वीर्य जहाँ-जहाँ टपका, वहाँ सोने की खादाने हुई, अर्थात भागवतपुराण के अनुसार सोना और चाँदी शिवजी के वीर्य से बने हैं! अतः ऐसे ही सोना-चाँदी की उत्पत्ति हुई.....

वैसे शिवजी के बारह ज्योतिर्लिंगों की पूजा हम भारतीय करते है, और ये वीर्य टपकाने दक्षिण अफ्रीका चले गये!
भला ये कैसा न्याय हुआ महादेव।

और जो लोग कहते हैं कि धर्म मे विज्ञान नही है, वो जान लें कि हमारे धर्मग्रंथों मे करोड़ो साल पहले ही यह वैज्ञानिकी बातें लिखी थी!

वैसे इस कथा से जुड़ी कुछ लोककथाऐं भी है, केरल के हिन्दुओं का मानना है कि मोहिनी ने शिव के एक पुत्र को जन्म दिया था, जिसका नाम "अयप्पा" था!
केरल के हिन्दू सबसे अधिक अयप्पा की ही पूजा करते है, और वहाँ अयप्पा के कई मन्दिर हैं...
जबकि भागवतपुराण की माने तो मोहिनी शिव के हाथ से निकलकर भाग गयी थी!
इस कथा को लिखने से मेरा अभिप्राय शिव का अपमान करना नही है, पर जरा खुद विचार करो कि इस कथा के माध्यम से भागवतपुराण ने शिवजी पर 'Attempt to rape' का दोष तो लगा ही दिया है।

महाभारत।

महाभारत के युद्ध मे एक बात सोचने वाली है कि अगर दुर्योधन के कहने पर सात महारथियों ने अभिमन्यु को घेर कर मार डाला था, तो वह बड़ा अधर्म था! फिर जब घायल कर्ण, जिसके रथ का पहिया जमीन मे धंस गया था, और वह धनुष उठाने के स्थिति मे नही था, फिर भी अर्जुन ने उसका वध किया.. क्या यह धर्म था?

चोरी का बदला चोरी कभी धर्म हो सकता है?
कपट का बदला कपट कभी धर्म हो सकता है?

अगर कौरव अधर्मी थे, तो पाण्डव कैसे धर्मी हो गये यह बात सोचने वाली है!
हद तो तब है कि ये सारे अधर्म श्रीकृष्ण के ईशारे पर किये गये!

महाभारत के कर्णपर्व मे लिखा है कि कर्ण ने अर्जुन से निवेदन किया था कि ' हे अर्जुन! जो युद्ध से भागा हो, जिसके अस्त्र-शस्त्र गिर गये हो और जो घायल हो क्षत्रिय उस पर बाण नही चलाते, अतः तुम रूको... मै रथ का पहिया निकालकर तुमसे युद्ध करता हूँ '

ऐसी स्थित मे अर्जुन तो मान गया, पर कृष्ण ने उसे उकसाकर कर्ण का वध करवाया!
कोई बतायेगा कि कृष्ण कौन से धर्म का पालन कर रहे थे?
जब स्वयं इतने बड़े महापुरुष अधर्म करने के लिये अर्जुन से कह रहें थे, तो फिर कृष्ण धर्मनिष्ठ कैसे हुये!

कृष्ण तो वेदों, उपनिषदों और शास्त्रों के ज्ञाता थे! मनुस्मृति-7/93 मे मनु ने लिखा है-
"नायुधव्यसनप्राप्तं नार्तं नातिपरिक्षतम् ।
न भीतं न परावृत्तं सतां धर्ममनुस्मरन् ।।"
अर्थात- जिसका आयुध टूट गया हो, शोकाकुल हो, अत्यन्त घायल हो, जो भयभीत हो, युद्ध से भागा हो, ऐसे शत्रु को शिष्ट क्षत्रिय का धर्म स्मरण कर न मारें।

क्या मनु का विधान भी कृष्ण भूल गये थे! मै सदैव कहता हूँ कि महाभारत कृष्ण की स्तुति और पाण्डवों के साथ सहानुभूति रखकर लिखी गयी पुस्तक है, अन्यथा पाण्डव तो कौरवों से भी अधिक अधर्मी थे!

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महाभारत को यदि आप सूक्ष्मतापूर्वक पढ़ो तो उसमे कई जगह औरतों पर या तो सवाल दागे गये हैं, या उन्हे अकारण ही कठघरे मे खड़ा किया गया है।

        आमतौर पर लोगों मे एक धारणा है कि महिलाऐं कोई भी बात छुपाकर नही रख पाती। मतलब यदि आप उन्हे कोई गोपनीय बात बता दो तो वे उसका ढ़िंढ़ोरा पीट देती हैं। कई पुरुष तो इसी धारणावश अपनी पत्नि से भी कई बातें नही बताते।

क्या आप सबको पता है कि ऐसी धारणा समाज मे कहाँ से आयी?
जी हाँ.., इसके लिये भी महाभारत ही जिम्मेदार है। यह वही महाभारत है जिसमे औरतों के लिये "त्रिया चरित्र" नामक अपमानजनक श्लोक भी लिखा गया है।

खैर, आज मै बताता हूँ कि महिलाओं को चुगलखोर वाली यह धारणा महाभारत से कैसे आयी।
दरअसल जब अर्जुन ने कर्ण का वध किया तो थोड़े ही दिन बाद पाण्डवों को पता चल गया कि कर्ण उनका ही बड़ा भाई था।
युधिष्ठिर को यह जानकर बहुत दुःख हुआ, और क्रोध मे आकर उन्होने अपनी माता कुन्ती को श्राप दिया कि "तुमने इतनी बड़ी बात हमसे छुपायी, जिसकी वजह से हमारे ही हाथों हमारे अग्रज मारे गये। इसलिये आज मै समस्त स्त्रियों को यह श्राप दे रहा हूँ कि आज के बाद से वे कोई भी बात गोपनीय नही रख पायेंगी"
        महाभारत मे यह कथा शान्तिपर्व अध्याय-92 मे लिखी है।

        इसके बाद एक धारणा सी बन गयी कि महिलाऐं कोई भी बात अपने पेट मे पचा नही पाती! और इसी धारणा ने महिलाओं को अविश्वसनीय बना दिया।

वैसे यहाँ पर तथाकथित धर्मराज युधिष्ठिर पर एक सवाल और उठता है कि वे किस तरह के धर्मराज थे जो अपनी माँ की गलती के लिये समस्त नारियों को श्राप दे बैठे?
क्या यही धर्म का मानक है कि एक की गलती की वजह से सभी को दण्डित करो। हांलाकि यह काम उनसे पहले परशुराम भी कर चुके थे, जो सहस्त्रार्जुन की गलती की वजह से सारे क्षत्रियों को मार रहे थे।

मनु, मनुस्मृति।

 मनु भी 1/100 मे लिखते हैं कि ब्राह्मण सबसे श्रेष्ठ है, अतः सारी पृथ्वी उसी की है!

मनुस्मृति-9/2 मे लिखते हैं- "अस्वतन्त्रः स्त्रियः कार्याः पुरुषैः स्वैर्दिवानिशम्।"
अर्थात- पुरुष द्वारा अपने स्त्रियों को कभी स्वतंत्रता नही देनी चाहिये।

मनु कहते हैं-
"एकोऽलुब्धस्तु साक्षी स्याद् बह्वच्य शुच्योऽपि न स्त्रियः।
स्त्रीबुद्धेरस्थिरत्वात्तु दोषैश्चान्येऽपि ये वृताः"
                                             मनुस्मृति-8/77
अर्थात- एक निर्लोभी पुरुष भी साक्षी हो सकता है, परन्तु अनेक स्त्रियां पवित्र होने पर भी साक्षी नही हो सकती, क्योंकि स्त्रियों की बुद्धि चंचल होती है! और अन्य मनुष्य भी जो दोषों से घिरें हैं, साक्षी होने के योग्य नही होते।

मनुस्मृति-9/33 मे लिखा है-
"क्षेत्रभूता स्मृता नारी बीजभूतः स्मृत पुमान।
क्षेत्रबीजसमायोगात् सम्भवः सर्वदेहिनाम् ।।"
अर्थात- स्त्री को खेत (क्षेत्र) और पुरुष को बीज (अनाज) रूप माना गया है, खेत और बीज के मिलन से जीवों की उत्पत्ति होती है।

बल्कि मनु ने 9/41 मे कहा है कि पराये खेत मे पुरुष को अपना बीज नही बोना चाहिये, और 9/49 मे कहते हैं-
"येऽक्षेत्रिणो बीजवन्तः परक्षेत्रप्रवापिणः।
ते वै सस्यस्य जातस्य न लभन्ते फलं क्वचित् ।।"
अर्थात- जिसके पास खेत (स्त्री) नही है, वह दूसरे के खेत मे बीज बोता है तो उसमे उत्पन्न धान्य (बालक) को वह पाने का अधिकारी नही है।

अगर स्त्री व्यभिचार कर ले तो मनु ने उसकी शुद्धि का मंत्र भी बताया है!
मनु ने 9/20 मे लिखा है-
अगर कोई स्त्री की पर-पुरुष से व्यभिचार कर लेती है तो उसकी शुद्धि के लिये मनु ने एक मंत्र भी बताया है, जो निम्न है-
"यन्मे माता प्रलुलुभे विचरन्त्यपतिव्रता।
तन्मे रेतः पिता वृक्तामित्यस्यैतन्निदर्शनम् ।।"
इस मंत्र का अर्थ है - 'मेरी माता ने अपवित्रता पूर्वक घूमते हुये पराये घर मे जाकर पर पुरुष की इच्छा की, अतः उसके दूषित रज को मेरे पिता शुद्ध करें'
मनु का यह भी दावा है कि यह वेदमंत्र है। 

मनु का मानना था कि विधवा का पुनः विवाह नही होना चाहिये! मनु ने बाकयदा 9/65 मे इसे लिखा भी है-
"नोद्वाहिकेषु मन्त्रेषु नियोगः कीर्त्यते क्वचित् ।
न विवाहविधावुक्तं विधवावेदनं पुनः।।"
अर्थात- विवाह के वेदमंत्रों मे नियोग का कही उल्लेख नही है, और न ही विवाह विषयक शास्त्रों मे विधवा विवाह का उल्लेख है।

मनु ने भी 4/81 मे लिखा है-
"यो ह्यस्य धर्ममाचष्टे यश्चैवादिशति व्रतम् ।
सोऽसंवृतं नाम तमः सह तेनैव मज्जति।।"
अर्थात- दूसरे धर्म का उपदेश और व्रत का जो पालन करता है, वह उस शूद्र सहित असंवृत नामक अंधकारमय नरक मे जा गिरता है!

अब कुछ लोग सोचेगें कि क्या मनु के समय मे दूसरा धर्म भी था, तो मै बता दूँ कि उस काल मे दस्युधर्म था, जो रक्ष संस्कृति को मानते थे और मनुस्मृति मे इसका व्याख्यान भी है!
मनु ने तो 5/89 मे यह भी कहा है कि जिन्होने अपना धर्म त्याग दिया हो, उन्हे जलाञ्जलि भी नही देनी चाहिये।

मनु ने भी एक से अधिक विवाह को उचित माना है!
मनु के अनुसार पहली पत्नि की इच्छा के विपरीत भी पुरुष को दूसरा विवाह करना चाहिये, और अगर पत्नि विरोध करे तो उसे त्याग देना चाहिये!
मनु का यह श्लोक देखें...
"अधिविन्ना तु या नारी निर्गच्छेद्रुषिता गृहात् ।
सा सद्यः संनिरोध्दव्या त्याज्या वा कुलसन्निधौ।।"
                                          मनुस्मृति-9/83
अर्थात- दूसरा व्याह करने पर यदि पहली स्त्री रुष्ठ होकर घर से भागे तो उसे पकड़कर घर मे बन्द कर देना चाहिये, या उसे उसके मायके पहुँचा देना चाहिये।

यही नही मनु तो  बालविवाह को भी जायज मानते थे! मनु ने 9/88 मे लिखा है-
"उत्कृष्ठायाभिरूपाय वराय सदृशाय च।
अप्राप्तामपि तां तस्मै कन्यां दद्याद्यथाविधिः।।
अर्थात- उत्तम कुल और सुन्दर वर मिल जाये तो कन्या के विवाह योग्य न होने पर भी ऐसे वर से उसका विवाह विधिवत कर देना चाहिये।

मनु 7/96 मे कहते हैं कि जो सैनिक दासी को युद्ध मे जीतकर लाता है, उस पर उसी का अधिकार है!

आगे मनु 7/194 मे लिखते हैं कि शत्रु के अन्दर खौफ पैदा करने के लिये उसके अन्न, जलायश जला दो और राज्य मे घेरा डालो, यह ठीक उसी तरह है जिस तरह अल्लाह आदेश देते हैं कि मूर्तिपूजकों की घात मे बैठो, और काफिरों के अन्दर धाक पैदा कर दो!

और भी बहुत सारी समानताऐं हैं मनुस्मृति तथा कुरान मे, जिसे लिखने पर पोस्ट बहुत बड़ा हो जायेगा।



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#विरोधाभासी_मनु

मनुस्मृति कितनी पुरानी पुस्तक है यह तो मै शायद नही बता सकता, पर इतना जरूर कह सकता हूँ कि यह ग्रंथ रामायण और महाभारत से प्राचीन है!
मनुस्मृति मे कहीं भी राम और कृष्ण का कोई उल्लेख नही है, परन्तु रामायण के किष्किंधाकाण्ड मे राम ने स्वयं मनुस्मृति की प्रशंसा की है, तो महाभारत के शान्तिपर्व और अनुशासन पर्व मे भीष्म पितामह ने इस ग्रंथ का गुणगान किया है!

मनुस्मृति निश्चित ही किसी काल मे सनातन धर्म की सबसे मान्य पुस्तक थी, लेकिन इस किताब मे मनु ने कई श्लोक ऐसे लिखे हैं, जो उन्ही के अन्य श्लोकों का ठीक उलट है!
आइऐ, कुछ ऐसे ही श्लोकों पर नजर डालते हैं-
मनुस्मृति-3/56 मे मनु ने नारियों के सम्मान मे यह बड़ी बात कही है-
"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।।"
अर्थात- जहाँ नारियों की पूजा होती है, वहाँ देवताओं का वास होता है, और जहाँ नारियाँ कष्ट पाती है, वहाँ समृद्धि नही होती!
यहाँ तो मनु ने बड़ी उत्तम बात लिखी, पर नौवां अध्याय शुरू होते ही मनु कहते हैं कि नारियों को स्वतंत्रता मत दो, नारियां कामुक होती है!
यही नही मनु ने अध्याय-8/371 मे लिखा है-
"भर्तारं लङ्घयेद्या स्त्री ज्ञाति गुणदर्पिता।
तां श्वाभिः खादयेद्राजा संस्थाने बहुसंस्थिते।।"
अर्थात- अपनी सुन्दरता और बाप-दादा के धन पर यदि स्त्री घमण्ड करे तो उसे सबके सामने कुत्ते से नोचवा डालें।

जरा सोचो कि पहले नारियों को पूजने की बात करने वाले मनु अब कुत्ते से नोचवाने की सलाह दे रहे है!

मनु का दूसरा विरोधाभास यह है कि उन्होने अध्याय-9/104 मे कहा है कि-
"ऊर्ध्वं पितुश्च मातुश्च समेत्य भ्रातरः समम् ।
भजेरन्पैतृकं रिक्थमनीशास्ते हि जीवतोः।।"
अर्थात- माता-पिता की मृत्यु के बाद सभी भाई धन-सम्पत्ति को बराबर-बराबर बांट लें, माता-पिता के जीते जी उन्हे धन बांटने का कोई अधिकार नही। 
इस श्लोक मे मनु पैतृक सम्पत्ति मे सभी भाइयों को बराबर को अधिकार बता रहे हैं, पर इसका ठीक अगला ही श्लोक उन्होने गांजे के नशे मे लिखा और मनु अध्याय-9/105 मे लिखते हैं-
"ज्येष्ठ एव तु गृह्णीयान्पित्र्यं धनमशेषतः।
शेषास्तमुपजीवेयुर्यथैव पितरं तथा।।"
अर्थात- भाइयों मे जो सबसे श्रेष्ठ हो, वो पिता की सम्पूर्ण धन-सम्पत्ति को ग्रहण करे, शेष भाई उसे पितातुल्य मानकर उसके अधीन रहें! 

अब ये पागलपन देखो.... पहले तो उन्होने सम्पत्ति मे सभी भाइयों का बराबर अधिकार बताया, पर अगले ही श्लोक मे कहा कि सारी सम्पत्ति बड़े भाई की है!

आगे मनु  ने मनुस्मृति-8/123-124 मे लिखा है कि राजा केवल क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र को दण्ड दे, क्योंकि स्वायम्भायु मनु ने जो दण्ड विधान बताया है, वह केवल इन्ही तीन वर्णों के लिये है, ब्राह्मण के लिये नही।
लेकिन कुछ आगे बढ़ते ही मनु की अक्ल फिर ठिकाने आयी और इसी आठवें अध्याय के श्लोक-337/338 मे मनु लिखते हैं कि यदि शूद्र चोरी करे तो उससे आठ गुना, वैश्य करे तो सोलह गुना, क्षत्रिय करे तो बत्तीस गुना और ब्राह्मण करे तो उसे चौंसठ गुना या एक सौ अट्ठाइस गुना दण्ड दें!

मनु केवल इतने ही विरोधाभासी नही थे! मनु के अनुसार मांस नही खाना चाहिये, अतः मांस खाने से रोकने के लिये मनु ने लोगों को डराया है और मनुस्मृति-5/55 मे लिखा है-
"मांस भक्षयिताऽमुत्र यस्य मांसमिहाद्म्यहम् ।
एतन्मांसस्य मांसत्व प्रवदन्ति मनीषिणः।।"
अर्थात- जो मनुष्य इस लोक मे जिसका मांस खाता है, परलोक मे वह उसका भी मांस खाता है, यही मांस का मांसत्व है।
लेकिन इसी अध्याय मे उन्होने मांस खाना अनिवार्य भी कहा है!
इसी अध्याय के श्लोक-5/35 मे मनु कहते हैं-
"नियुक्तस्तु यथान्यायं यो मांसं नात्ति मानवः।
स प्रेत्य पशुतां याति संभावनेकविंशशतिम् ।।"
अर्थात- जो विधि नियुक्त होने पर भी मांस नही खाता, वह मरने के बाद इक्कीस जन्म तक पशु होता है!

सोचों! कि मनु कैसे आदमी थे, पहले कह रहे हैं कि मांस नही खाओगे तो पशुयोनि मे जाओगे, और बाद बता रहे हैं कि तुम जिसका मांस खाओगे, वो तुम्हारा भी मांस खायेगा!

मनु ने इतनी ही नही, और भी कई विरोधाभासी बातें कही हैं, जैसे-
मनु ने मनुस्मृति-10/65 मे लिखा है-
"शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम।"
अर्थात- अपने कर्मो से ब्राह्मण शूद्र और शूद्र ब्राह्मणत्व को प्राप्त होता है!
पर इसी अध्याय के श्लोक 10/73 मे मनु लिखते हैं कि ब्राह्मण और शूद्र कभी समान नही हो सकते, अर्थात यहाँ उन्होने वर्ण-परिवर्तन को नकार दिया है।

मनु के ऐसा लिखने के पीछे केवल दो ही कारण हो सकते है-
पहला तो यह कि वो बहुत घटिया किस्म गांजा पीते थे!
दूसरा कि वो बड़े भुलक्कड़ थे, पीछे क्या लिखा है, उसे भूलकर आगे ठीक उसका विपरीत लिख देते थे!

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जब मै धार्मिक पाखण्डों पर लेख लिखता हूँ तो कई धार्मिक मुझसे कहते हैं कि- "तुम नास्तिक हो, और अगर ईश्वर को नही मानते तो यह बताओ कि दुनिया मे पहले मुर्गी आयी, या पहले अण्डा आया"

वैसे तो विज्ञान इस मूर्खतापूर्ण सवाल का जवाब दे चुका है, पर मै धार्मिकों को धार्मिकस्तर का ही जवाब देता हूँ!

मनुस्मृति मे लिखा है कि ब्रह्मा का जन्म एक अण्डे से हुआ!
वर्षों तक ब्रह्माजी अण्डे मे रहे, फिर अण्डे को फोड़कर बाहर आये...
यह सब वैसा ही है, जैसे आज मुर्गी का चूजा अण्डे को निकलता है!

मनुस्मृति का यह श्लोक देखो-
"यत्तत्कारणमव्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम् ।
तद्विसृष्टः स पुरुषो लोके ब्रह्मेति कथ्यते।।
तस्मिन्नण्डे स भगवानुषित्वा परिवत्सरम् ।
स्वयमेवाऽऽत्मनो ध्यानात्तदण्डमकरोद् द्विधा।।"
                                        (मनुस्मृति-1/11-13)

अर्थात- सम्पूर्ण सृष्टि के कारण, अव्यक्त, नित्य, सत्-असत् स्वरूप से जो पुरुष उत्पन्न हुआ, उसे संसार 'ब्रह्मा' कहता है! अपने से वर्षो पर्यन्त उस अण्डे मे रहकर, ब्रह्मा ने स्वयं अपने ही ध्यान से उस अण्डे का दो खण्ड कर दिया।

अब जरा धार्मिक लोग मुझे यह बताऐं कि ब्रह्मा जिस अण्डे से पैदा हुये, उस अण्डे को किसने दिया?
शिव अथवा विष्णु ने...
क्योंकि लगभग तमाम पुराण यही कहते हैं कि ब्रह्मा से पहले सृष्टि मे केवल शिव और विष्णु ही थे! इसका जवाब जो धार्मिक महापुरुष देगा, वही मुझसे "पहले मुर्गी या पहले अण्डे" सवाल पूँछे।


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पुराणों मे ऐसे कई प्रकरण मिल जायेंगे जब किसी राजा या अन्य को संतान न होने पर ऋषियों से यज्ञ-हवन करवाने या आशिर्वाद प्राप्त करने से संतानोत्पत्ति हो जाती थी।
रामायण काल मे देखा जाये तो राम और उनके चारों भाइयों का जन्म भी ऐसी ही पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाने से हुआ था।
महाभारत काल मे तो कर्ण, पाँचों पाण्डव, पाण्डु, धृतराष्ट्र और विदुर समेत कई महापुरुष देवताओं या ऋषियों के आशिर्वाद से ही पैदा हुये हैं।

               अब हम संतानोत्पत्ति के दूसरे पहलु पर आते हैं। प्राचीनकाल मे सनातनियों मे नियोग प्रथा आम बात थी। पूर्वकाल मे जब किसी महिला को अपने पति से संतान नही पैदा होता था तो वह किसी ऋषि या देवता से नियोग करके संतान पैदा करती थी। आगे चलकर इसी प्रथा को मनु ने धार्मिक नियम बना दिया था। मनु ने मनुस्मृति-9/59 (चित्र-1) मे लिखा है-
"देवराद्वा सपिण्डाद्वा स्त्रिया सम्यङ् नियुक्तया।
  प्रजेप्सिताधिगन्तव्या    सन्तानस्य  परिक्षये।।"
               अर्थात- अपने पति और गुरूजनों की आज्ञा से संतान न होने पर स्त्री देवर या सपिण्ड से अभीष्ट (नियोग करके) संतान पैदा करे!

              अब यह सोचकर ही घृणा होती है कि पूर्वकाल मे संतान के लिये बड़े-बड़े राजा भी अपनी पत्नियों को किसी दूसरे पुरुष को सौंप देते थे।
       वास्तव मे नियोग प्रथा एक घृणित व्यवस्था थी.. नियोग प्रथा का वर्णन मनुस्मृति मे ही मिलता है, पर मनु भी इसे "पशु-धर्म" ही मानते थे।
मनु ने मनुस्मृति-9/65-66 (चित्र-2/3) मे लिखा है-
       "विवाह के वेदोक्त मंत्रों मे नियोग और विधवा विवाह का कही वर्णन नही है। यह पशुधर्म है और विद्वान ब्राह्मणों ने इसकी निन्दा की है। मानव समाज मे बेन राजा के समय मे यह पशु-धर्म प्रचलित हुआ।"

मतलब साफ है कि मनु भी इसे पशुवत्-कृत्य ही मानते थे, और उन्होने यह भी साफ कर दिया कि इसे मैने नही बनाया, बल्कि यह प्रथा तो मुझसे पहले (बेन राजा के समय) से चली आ रही है।

खैर.. अब मै मुख्य-विषय पर आता हूँ। यहाँ सवाल यह उठता है कि जब पूर्वकाल मे ब्राह्मण इतने तपस्वी होते थे कि यज्ञ करने से या आर्शिवाद देने से पुत्र पैदा करने मे सक्षम थे तो मनु ने नियोग जैसी बकवास प्रथा को क्यों आगे बढ़ाया?
मनु के मनुस्मृति मे लिखना चाहिये था कि- "जब किसी स्त्री को संतान न हो तो वह ऋषियों से पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाये अथवा मंत्रोच्चारित फल या खीर खाकर पुत्र पैदा करे। लेकिन इसके बदले मे मनु से किसी पर-पुरुष से सम्भोग करने की सलाह क्यों दी?

बात साफ है कि युग कोई भी रहा हो, बिना स्त्री-पुरुष के समागम से संतान कभी भी पैदा नही होती थी। यह बात मनु भी जानते थे, इसलिये उन्होने न चाहते हुये भी इस निन्दनीय-कृत्य को करने की विधि बनायी, ताकि आगे वंशवृद्धि हो सके। मनु जानते थे कि यदि कोई महिला अपने पति से गर्भवती न होने पर किसी अन्य पुरुष से गर्भधारण करेगी तो समाज उसे कलंकित मानेगा। इसीलिये उन्होने नियोग को धार्मिक प्रावधान बना दिया, ताकि न तो समाज महिला की निन्दा कर सके, और महिला भी आत्मग्लानि से बची रहे।

वास्तव मे सच्चाई यही है कि पुराणों और रामायण/महाभारत मे जितने भी महापुरुष मंत्रोच्चारित फल अथवा खीर पीने से, या देवताओं अथवा ऋषियों (ब्राह्मणों) के आशिर्वाद से पैदा हुये हैं, वे सब नियोग द्वारा ही जन्मे हैं। लेकिन ग्रंथों को लिखने वालों ने इस बात को छुपा दिया है। यदि पूर्वकाल मे सचमुच ऐसे चमत्कृत ढ़ंग से संतान पैदा करने की कोई भी विधि होती तो मनु कभी भी "नियोग-प्रथा" को धार्मिक प्रावधान न बनाते।

Saturday, 27 March 2021

कालेखां।

मेरी पिछली पोस्ट पर काफी हो-हल्ला मचा, क्योंकि लोगो को लगता था कि मै जातीय विद्वेष फैला रहा हूँ, और ब्राह्मणों को बदनाम कर रहा हूँ!
हाँलाकि मेरा ऐसा कोई इरादा नही था, पर अब मै एक ऐसी कहानी बताने जा रहा हूँ, जिसके पूरे प्रमाण भी है...

संतराम बी.ए. एक आर्यसमाजी विद्वान थे, उन्होने एक पुस्तक लिखी है- "हिन्दुत्व जो हिन्दुओं को ही ले डूबा"
यह पुस्तक 'सम्यक प्रकाशन' मे छपी है और इसी मे ढ़ाका (वर्तमान बांग्लादेश) की एक सच्ची घटना लिखी गयी है!

            बंगाल (ढ़ाका) मे एक नवाब की कोठी थी, और उस कोठी के बगल से सकरा सा रास्ता ब्रह्मपुत्र नदी की तरफ जाता था!
उसी रास्ते से एक ब्राह्मण का किशोर पुत्र (कालचन्द्र राय) जो गोरा और लम्बा था, तथा देखने मे अत्यन्त सुन्दर लगता था, वह रोज सुबह नहाने जाता था, तथा पुनः उसी रास्ते से नहाकर वापस लौटता था!
उस नवाब की एक नवयुवती बेटी थी, जो उस ब्राह्मणपुत्र को प्रतिदिन अपनी खिड़की मे खड़ी होकर आते-जाते देखती थी, उस लड़की को ब्राह्मणपुत्र से प्रेम हो गया!
लड़की ने यह बात अपनी माँ को बतायी, और उसकी माँ ने नवाब को बताया! नवाब अपनी पुत्री को बहुत प्रेम करता था, अतः उसकी खुशी के लिये वह ब्राह्मणपुत्र से अपनी बेटी की शादी के लिये मान गया!

अगले दिन नवाब ने ब्राह्मणपुत्र को बुलाकर कहा कि तुम मेरी पुत्री से विवाह कर लो!
ब्राह्मणपुत्र ने कहा कि मै ऐसा नही कर सकता, क्योंकि आपकी पुत्री ब्राह्मण नही है!
नवाब ने कहा कोई बात नही, तुम इसका धर्म-परिवर्तन करवा देना!
लेकिन ब्राह्मणपुत्र ने कहा कि यह भी सम्भव नही है, हमारा समाज नही मानेगा! दूसरी बात उस समय के पुरोहितों ने भी किसी मुसलमान का सनातनधर्म मे प्रवेश शास्त्र-विरुद्ध बताकर मना कर दिया।
फिर नवाब ने कहा कि दूसरा रास्ता यही है कि तुम इस्लाम अपना लो!
इस बार भी ब्राह्मणपुत्र ने झट से इनकार कर दिया!

नवाब कई दिन तक ब्राह्मणपुत्र और उसके परिवार वालों को समझाता रहा, पर बात बनी नही!
इधर नवाब की बेटी पूरा दिन रोती रहती, और खाना भी खाने से मना करती थी!
अन्त मे नवाब के कुछ मंत्रियों ने उसे सलाह दिया कि उस लड़के को मरवा दो, क्योंकि जब तक वह जीवित रहेगा, शहजादी उसे देखकर रोती ही रहेंगी!

नवाब मान गया, और सैनिकों को भेजकर उस लड़के को पकड़वाकर लाया, तथा उसका गला काट देने का आदेश दिया! 
ब्राह्मणपुत्र वध-स्थल पर सिर झुकाये खड़ा था और जल्लाद उसका गला काटने की तैयारी कर रहा था! पर किसी तरह यह खबर नवाब की पुत्री को पता चल गयी थी, और वह भागी-भागी उस जगह आ पहुँची जहाँ ब्राह्मणपुत्र का गला काटने की तैयारी हो रही थी!
लड़की रोती-बिलखती जल्लाद के कदमों मे गिर गयी और बोली कि मेरे महबूब को छोड़ दो, इनसे मोहब्बत करने का गुनाह मैने किया है, ये तो बेगुनाह है... आप मेरा ही गला काट दो, मै इनके कदमों मे अपने प्राणों की बलि दूँगी। अगर इन्हे कुछ हो गया तो मै वैसे भी मर जाऊँगी, अतः मेरे लिये यही अच्छा होगा कि मै अपने महबूब के सामने ही मर जाऊँ।

जल्लाद हक्का-बक्का खड़ा था, पर ब्राह्मणपुत्र का दिल पिघल गया!
उसने देखा कि इस लड़की और एक सनातनी लड़की के संस्कारों मे कोई अन्तर नही है!
ब्राह्मणपुत्र ने उठकर नवाब की बेटी को गले से लगा लिया, और कहा कि मै तुमसे ही शादी करूँगा!

ब्राह्मणपुत्र नवाब की बेटी को लेकर अपने घर आया, और सारी बात बताकर अपने पिता से बोला कि हे पिताजी! आप हमारा विवाह करवा दो।
लेकिन उसके घरवालों ने उसकी एक न सुनी और उसे धक्के मारकर घर से बाहर निकाल दिया!

इसके बाद वह नवाबपुत्री से शादी करने के लिये उसे लेकर पुरी गया!
वहाँ के पुजारी ने ब्राह्मणपुत्र और उस लड़की का गोत्र पूँछा!
ब्राह्मणपुत्र ने अपना गोत्र तो बता दिया, पर जैसे ही पुजारी को बताया कि यह लड़की मुसलमान है, पुजारी भड़क गया और बोला कि तू एक म्लेच्छ-कन्या को मन्दिर तक कैसे ले आया?
पुरी के पुजारियों ने भी उसे धक्के मारकर भगा दिया! अब ब्राह्मणपुत्र के भीतर प्रतिशोध की आग भड़क गयी और अन्ततः उस ब्राह्मणपुत्र ने इस्लाम कबूल करके उस लड़की से ब्याह किया और कालेखाँ के नाम से प्रसिद्ध हुआ!

ब्राह्मणपुत्र के अन्दर हिन्दुत्व के लिये घोर घृणा थी, और कुछ वर्षों बाद जब वह बंगाल का नवाब बना तो उसने पूरे बंगाल के इस्लामीकरण का बीड़ा उठा लिया! और जिसके परिणाम-स्वरूप उसने बंगाल मे हिन्दुओं का धर्मपरिवर्तन करवाना शुरू कर दिया! 
कालेखाँ की निशानियाँ आज भी बांग्लादेश मे है!

यह कोई काल्पनिक कहानी नही बल्कि सत्य घटना है, जिसे यकीन न हो पुस्तक मंगवाकर पढ़ सकता है, अन्यथा गूगल पर भी सर्च करके पता कर सकता है।

दूसरी बात जरा मुझे कोई बताये कि दयानन्द सरस्वती से पहले क्या यह सुविधा थी कि कोई दूसरे धर्म का व्यक्ति हिन्दूधर्म अपना सके?
बिल्कुल नही! पौराणिक पंडों ने न तो किसी अन्य धर्मवालों के लिये दरवाजे खोले थे, और न ही अपने धर्म के अछूतों से मानवीय व्यवहार किया!
अगर किसी अछूत की परछाई भी पंडों को छू जाती थी, तो वह जाकर स्नान करते थे, और उस अछूत का जीना दूभर कर देते थे!
अरे साधारण मानव तो दूर, इनके ताण्डव से छत्रपति शिवाजी के वंशज छत्रपति शाहूजी महाराज भी नही बचे!

पेशवा बाजीराव की दूसरी पत्नि मस्तानी मुसलमान थी, पर मस्तानी ने अपने बेटे का नाम कृष्णा रखा था, और वह हिन्दू बनना चाहता था! लेकिन पंडों ने उसे हिन्दू नही बनने दिया, और उसे विवश किया गया कि वह मुसलमान बन जाये।
आज ब्राह्मण चाहे जितना छाती पीटें कि मुसलमानों की जनसंख्या बढ़ रही है, पर भारत मे अधिकांश दलित-अछूतों ने इनके शोषण की वजह से ही इस्लाम कबूला था!

स्वामी दयानन्द सरस्वती एक मात्र ऐसे महापुरुष थे जिन्होने इस्लाम कबूल लिये लोगों का भी शुद्धिकरण करके उन्हे पुनः सनातन धर्म मे वापसी करायी, अन्यथा उनसे पहले यह सुविधा भी नही थी!
सच तो यह है कि जब दयानन्द सरस्वती मुसलमानों को हिन्दूधर्म मे वापसी करवा रहे थे तब भी ये पौराणिक ब्राह्मण उनका विरोध करते थे!

हाँ मै इन कुकृत्यों को करने वाले लोगों को ब्राह्मण नही कहूँगा! वो ब्राह्मण नही, पंडे-पुरोहित थे!
अगर वो ब्राह्मण होते और उनके अन्दर ब्राह्मणत्व होता, तो वो ऐसा कभी न करते!
ब्राह्मण एक योग्यता का शब्द है, जिसे प्राप्त करने के लिये कठिन परिश्रम करना पड़ता है, पर जो लोग ब्राह्मण के घर मे पैदा होकर उस समय ये घिनौने कृत्य कर रहे थे वो पंडे-पुरोहित ही थे, ब्राह्मण तो बिल्कुल नही!

गीत गोबिंद जयदेव।

यदि आप महाभारत और हरिवंशपुराण पढ़ो, तो आपको पता चलेगा कि कृष्ण बहुत सुन्दर होने के साथ-साथ अत्यन्त चतुर थे, वेद-शास्त्रों के ज्ञाता और बुद्धि...