Thursday, 11 August 2022

गीत गोबिंद जयदेव।

यदि आप महाभारत और हरिवंशपुराण पढ़ो, तो आपको पता चलेगा कि कृष्ण बहुत सुन्दर होने के साथ-साथ अत्यन्त चतुर थे, वेद-शास्त्रों के ज्ञाता और बुद्धिमान थे, दुष्टों को दण्ड देते थे और संतों का संरक्षण भी करते थे। 
       परन्तु इतने सारे गुणों के बाद भी उनके कुछ भक्तों को लगता था कि कृष्ण के बखान मे अभी भी कहीं कुछ तो कमी है?

फिर उन्हे समझ आया कि वेदव्यास ने सब कुछ लिखा, पर यह तो लिखा ही नही कि कृष्ण एक जबरा मर्द थे, जो कामकला मे पारंगत थे और ऐसा सम्भोग करते थे कि महिलायें पानी-पानी हो जाती थी।

वेदव्यास द्वारा की गयी इसी कमी का आभास उड़ीसा के एक बड़े कृष्ण भक्त जयदेव को चौदहवीं सदी के आरम्भ मे ही हो गया, और उन्होने इसकी पूर्ति करने के लिये "गीत-गोविन्द" नाम की एक किताब लिखी।

भारत के दूसरे राज्यों मे इस किताब को कम ही लोग जानते हैं, पर उड़ीसा मे इसके महत्व का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पुरी के जगन्नाथ धाम मे इसी के श्लोकों का पाठ होता है।

इस किताब का एक महत्व और भी है, राधा का वर्णन पहली बार इसी किताब मे किया गया है! उससे पहले महाभारत या हरिवंशपुराण मे राधा नाम के किसी भी पात्र का नामो-निशान तक नही है।

         पण्डित जयदेव ने कृष्ण के पुरुषार्थ को साबित करने के लिये पहले राधा नाम का एक पात्र गढ़ा और फिर उसे कृष्ण प्रेमिका बताकर ऐसी गन्ध मचायी कि बाद मे ब्रह्मवैवर्तपुराण ने भी इसी कथा को काफी हद तक कॉपी कर लिया।

कहते हैं कि भक्त और मूर्ख मे अधिक फर्क नही होता! जयदेव भी ऐसे ही भक्त थे, जो कृष्ण को मर्द साबित करने के चक्कर मे ऐसी अश्लीलता परोस बैठे कि यह किताब एक पोर्नबुक से भी अधिक कामुक हो गयी।

चलिये इसी किताब से कुछ प्रसंग हम आपको बताते हैं! इसके अतिरिक्त कुछ तस्वीरें भी दे रहें हैं, ताकि स्वयं भी पढ़कर आनन्द ले लो।

जयदेव इस किताब के तीसरे अध्याय के श्लोक-5 मे लिखते हैं- "राधा ने कृष्ण के साथ अपने रतिभोग के बारे मे अपनी सखी को बताया कि हे सखी! जब कृष्ण मेरे साथ रतिभोग कर रहे थे, तब मेरे मुँह से सी-सी की आवाज निकल रही थी, और मेरा जूड़ा भी ढ़ीला होकर बिखर गया था!"

इसके अगले श्लोक मे राधा ने कहा कि रतिभोग के झटकों से मेरे घुघरूँ बज रहे थे, और मेरी करधनी भी ढ़ीली हो गयी थी।

          आगे जयदेव अध्याय-12 श्लोक-3/4 मे लिखते हैं कि- "कृष्ण ने राधा के स्तनों पर पड़े कपड़े हटा दिये और राधा से कहा कि तुम अब कलश के सामान अपने स्तनों को मेरी छाती से चिपका दो, और रतिविलास का आनन्द लो।"

इसी अध्याय मे जयदेव आगे लिखते हैं कि "राधा ने लज्जावश अपने स्तनों को भुजाओं मे छिपा लिया था, श्रीकृष्ण ने राधा की भुजाओं को हटाकर उसके स्तनों को खूब मर्दन (मसला) किया। इसके बाद राधा की कमर पर थपकी दी और अधरों को जोर-जोर से चूसा, फिर अपना भार उसके ऊपर डाल दिया।"

जयदेव ने अपने भगवान की इस किताब मे इतनी खूबसूरती के साथ इज्जत उतारी है, जिसे मै अधिक लिख भी नही सकता।

खैर.. इच्छुक लोग अधिक जानने के लिये स्वयं पढ़े कि जयदेव ने किस तरह से राधा के स्तनों, अधरों और जंघाओं का इस किताब मे वर्णन किया है।

Monday, 29 March 2021

नियोग।

आप लोग यह तो जानते हो कि पाण्डु की पत्नि कुंती को संतान पैदा करने के लिये नियोग करना पड़ा था!

पाँचो पांडव पाँच अलग-अलग पिता की संतान थे........
युधिष्ठिर यमराज के पुत्र थे!
भीम पवनदेव के पुत्र थे!
अर्जुन इन्द्र के पुत्र थे, तथा नकुल और सहदेव दोनो अश्विनी कुमारों के पुत्र थे!

      पर क्या आपको ये पता है कि अपने पति पाण्डु के जीते जी कुंती ने दूसरे पुरुषो से नियोग क्यो करना पड़ा?
मै बताता हूँ......

महाभारत काल मे एक ऋषि थे जिनका नाम किंदम था! एक बार राजा पाण्डु अपनी दोनो पत्नियों कुंती और माद्री के साथ वन मे समय व्यतीत करने गये थे, तब वो ऋषि किंदम के आश्रम के पास ही ठहरे थे!

हमारे ऋषि-मुनि कितने रंगीन मिजाज थे जरा देखो तो सही.....
किंदम ऋषि को ना जाने क्या चुल्ल मची थी कि वो अपनी पत्नि को हिरनी बना दिये और खुद हिरण बनकर एक झाड़ी मे सम्भोग कर रहे थे! उसी समय पाण्डु शिकार खेलने निकले, उन्होने सोचा कि हिरण और हिरनी का जोड़ा है.... वो नही जानते थे कि ये किंदम ऋषि है!
पाण्डु ने तीर मार दिया.....       बाण लगते ही किंदम ऋषि मनुष्य वेष मे आकर दर्द से कराहने लगे!

बेचारे पाण्डु ने पास जाकर क्षमायाचना की...  और कहा कि मै नही जानता था कि आप हो, मैने सोचा सचमुच का हिरन है!
किंदम ऋषि ने एक नही सुनी और पाण्डु को श्राप दिया कि तुमने मुझे सम्भोग करते समय मारा है, अब जब तुम भी अपनी पत्नि से सहवास करोगे तभी तुम्हारी मृत्यु हो जायेगी....

दुःखी पाण्डु ने यह बात कुंती को बतायी.....    और कहा कि अब हमारा वंश कैसे आगे बढ़ेगा, इसी वंश को बढ़ाने के लिये ही कुंती ने नियोग किया था!
परन्तु यह बात माद्री को पता नही थी, और उसने एक दिन पाण्डु को मैथुन के लिये विवश किया... जिससे पाण्डु की मृत्यु हो गयी।

             इस कहानी के बाद दो सवाल उठते है.......
पहला जब कुंती का कोई भी पुत्र पाण्डु ने पैदा नही किया था तो वो पाण्डव क्यो कहलाये!
दूसरा किंदम ऋषि जब हिरण के वेष मे मैथुन कर रहे थे तो अगर उसी समय उन पर शेर हमला करके मार देता तो वो क्या करते...
जब पाण्डु मनुष्य होकर उन्हे नही पहचान पाये तो जंगल का शेर भला क्या पहचान पाता.........

सूर्य और कुंती।

॥ सूर्य और कुंती ॥

कुंती और सूर्य के सम्बन्धो को लेकर बहुत सारे कायास लगाये जाते है.... पर आज मै एकदम प्रमाणिक सच आपको बता रहा हूँ!

महाभारत/वनपर्व के अनुसार कुंती ने अपने बचपन मे किसी ऋषि की सेवा की थी.. और ऋषि ने खुश होकर उसे वर दिया था कि वो जब चाहे पाँच देवताओं को बुला सकती है!
एक दिन कुंती एकांत मे बैठी थी, और उसने कौतुहलवश सूर्य वाला मंत्र पढ़ दिया.....  फिर क्या था, अचानक सूर्यदेव आ टपके! कुंती घबरा गयी और बोली कि "हे देव आप जहाँ से आये हो, वही लौट जाओ"

कुंती उस समय नवयुवती थी और बेहद खूबसूरत भी....... कुंती को देखकर सूर्य की लार टपकने लगी! सूर्य बोले कि हम देवता एक बार आने के बाद बिना कुछ दिये वापस नही जाते।
कुंती ने कहा कि मुझे आपसे कुछ नही चाहिऐ......

अब जरा देखो कि सूर्य किस तरह कुंती को सहवास करने के लिऐ फुसला रहे है!
सूर्य बोले "हे देवी मै अखण्ड तेजस्वी हूँ, मै तुम्हे अपने जैसा ही उत्तम पुत्र दूँगा.....बस तुम अपना शरीर मुझे सौंप दो"

कुंती ने कहा कि मै अविवाहित हूँ, मेरे शरीर पर अभी मेरे माता-पिता का अधिकार है, आप अनुचित बात मत करो और वापस चले जाओ!
सूर्य को लगा कि सुन्दरी हाथ से निकल जायेगी... फिर से सूर्य ने आखिरी प्रयास किया!
सूर्य ने कहा- "हे देवी मुझसे जन्मा पुत्र अतिबलशाली और सुन्दर होगा, मेरी माँ अदिति ने मुझे अमोघ कवच और कुंडल दिया है जो मै उस पुत्र को दे दूँगा, तुम लोक-लज्जा की चिन्ता त्यागकर मेरे साथ समागम करो"

आखिरकार कुंती झांसे मे आ ही गयी और बोली कि अगर आप कवच-कुंडल मेरे पुत्र को देने का वचन देते हो तो मै आपके साथ प्रेमपूर्वक सहवास करूँगी!

इस वृत्तांत को पढ़ने के बाद कहीं से भी सूर्य पूज्यनीय या देवतुल्य लग रहे है, जो काम पिपाशा को शान्त करने के लिऐ एक कुवाँरी और नासमझ लड़की को सम्भोग करने के लिऐ बरगला रहे है! इन्होने उसे कुवाँरी माँ बनाकर छोड़ दिया, और बेचारा कर्ण पूरी जिन्दगी इन्ही की वजह से अपमानित होता रहा!

आज भी बहुत सारी औरते सूर्य को जल चढ़ाती है और अर्ध्य देती हैं, अगर ये फिर किसी के ऊपर खुश होकर प्रकट हुऐ तो बिना कुछ दिऐ वापस नही जाते!
हाँ मै सूर्यनमस्कार भी नही करता..............

आत्मा और नर्क, वेद, प्रश्न।

#क्या_शरीर_मे_आत्मा_होती_है......

                                           (पोस्ट बड़ा है, अतः ध्यान से पढ़े)

आध्यात्मिक लोग कहते है कि मानव शरीर के अन्दर एक आत्मा होती है जो शरीर को संचालित करती है! इनका यह भी कहना है कि आत्मा अजर-अमर होती है और उसके निकलते ही मानव मर जाता है......
अब सवाल यह है कि आखिर आत्मा के निकलने से मानव मर जाता है तो आत्मा निकलती ही क्यो है?
हमारा शरीर वृद्ध होता है या चोट लगने पर घायल होता है... आत्मा ना तो घायल होती है और ना ही वृद्ध होती है, तो फिर आत्मा क्यो निकलती है!
हमारे शरीर मे आत्मा जैसा कुछ भी नही है.... हमारा पूरा शरीर हृदय और मस्तिष्क से चलता है, जब कभी आपको कही चोट लगती है तो दिमाग तुरन्त यह बात हृदय को बताता है और फिर हम उस पर ध्यान देते है! जब दिमाग और हृदय काम करना बन्द कर देते हैं तो शरीर मे रक्त संचार रुक जाता है और ग्लूकोज की सप्लाई भी बन्द हो जाती है.... जिससे मांस सड़ने लगता है, बस यही मृत्यु है!

अगर आत्मा के निकलने से मौत होती है तो मृत्यु के बाद भी आँख लगभग छः घण्टे जीवित रहती है, क्या उसके लिये अलग आत्मा होती है....
अगर हमारा हाथ-पैर कट जाता है तो आत्मा नही निकलती पर गला कटने पर क्यों निकल जाती है.........  हमारे शरीर मे करोड़ो जिवाणु भी होते है तो क्या हमारे शरीर मे करोड़ो आत्माऐं है...
 आध्यात्मिक कहते हैं कि आत्मा गर्भावस्था के दौरान शरीर में प्रवेश कर जाती हैं और मृत्यु के साथ शरीर से निकल जाती है! फिर दुबारा से जन्म,परमात्मा से मिलन या प्रलय के दिन होने वाले फैसले का इंतजार करती है! ( आपके धार्मिक विश्वासों के अनुसार )…

 मै कहता हूँ कि कोई आत्मा गर्भ  मे नही प्रवेश करती.... गर्भधारण अण्डाणु को शुक्राण द्वारा निषेचन का परिणाम है।
स्त्री अपने अण्डाशयों में चालीस हजार से भी अधिक अण्डाणुओं को एक साथ जन्म देती है, निश्चित तौर पर इतनी  "सुप्त आत्मायें" नारी शरीर में पहले से मौजूद नहीं हो सकती।
रही बात पुरूष की....  तो वीर्य में स्पर्म काउंट की संख्या लगभग 80 से 120 मिलियन प्रति क्यूबिक मिली० है, (एक मिली० में एक हजार क्यूबिक मिली० होते है) और पुरूष के एक बार के वीर्यपात की मात्रा लगभग 3 से 5 मिली० होती है...अब जरा  कैल्क्यूलेटर निकालिये और हिसाब लगाइये…...
निश्चित तौर पर इतने सारे शुक्राणुओं में भी "सुप्त आत्माऐं" नही होती होगी!

असल मे आत्मा की अवधारणा बड़ी चतुराई से बनायी गयी, आत्मा होने का दूसरा पहलू यह भी है कि "परमात्मा" भी है! गरुणपुराण के अनुसार मृतात्मा को कर्मानुसार तरह-तरह के कष्ट झेलने पड़ते है, कभी नर्क पकोड़े की तरह उबाला जाता है तो कभी आरी से काटा जाता है, इस पुराण मे नर्क के कष्ट का पूरा "मेन्यूकार्ड" है......
अब इस कष्ट से बचने का उपाय भी इसी पुराण मे है.. अगर आप ब्राह्मण को गौदान करोगे तो आपके परिजन की आत्मा "वैतरणी" नदी पार कर जायेगी, अगर आप ब्राह्मण को भोजन और दान-दक्षिणा से तृप्त करोगे तो मृतक की आत्मा को यमदूत कष्ट नही देगे... अर्थात मृत्यु पश्चात भी करोबार चलता रहे इसके लिऐ आत्मा बनायी गयी....

गरुणपुराण मे पाँच प्रकार के नर्को का वर्णन है..
रौरव नर्क!
महारौरव नर्क!
कण्टकावन नर्क!
अग्निकुण्ड नर्क!
पंचकष्ट नर्क!

अब इन कष्टदायी नर्कीय यातना से बचने के लिऐ तमाम प्रकार के दान-दक्षिणा वाले उपाय भी है....  असल मे आत्मा का अस्तित्व बनाया ही इसीलिऐ गया कि अपने पित्रो की आत्मा को नर्क से बचाने के लिये परिजन तमाम कर्मकाण्ड और दान-दक्षिणा आसानी से करेगे, बस यही आत्मा का सच है...
गीता मे श्रीकृष्ण कहते है कि आत्मा कभी नही मरती... अरे माधव मरेगी तो तब जब वो होगी ना!

इस ब्राह्माण्ड मे आत्मा और परमात्मा का कोई अस्तित्व नही है!

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भागवत जी जो कह रहे है कि वेद विज्ञान से ऊपर है वो बात एकदम सही है,  पर तुम सरस सलिल पढ़ने वाले लोग वेदो की सत्ता क्या जानो....
अरे ऋगवेद मे विराटपुरुष के मुँह और पैर से बच्चे का जन्म ही "जीव विज्ञान" है, यम-यमी संवाद ही "सामाजिक विज्ञान" है और इन्द्र का शराब पीना ही "रसायन विज्ञान" है!

आज लोग विज्ञान के नशे मे इतना चूर है कि वेदों के महत्व को समझते ही नही....  एक अरब 96 करोड़ साल पहले ब्रह्माजी ने "अल्फाल्फा" घास की कुटाई करके कागज बनाया और वेद लिखना शुरू किया...  और ऐ बकलोल वैज्ञानिक कहते है कि कागज की खोज 105 ई० मे चीन मे हुई!

वेदो की ऋचाओं मे बड़ी चमत्कारी शक्ति है, दो ऋचा पढ़कर शंकर जी कैलाश पर्वत पर बर्फ के बीच नंग-धड़ंग बैठे है, पर कभी उन्हे सर्दी नही हुई, चार ऋचा विष्णु जी ने पढ़ी और सब सात जन्म ही लेते है पर विष्णु जी नौ जन्म ले चुके है, अभी दसवें की तैयारी है.....

पहले के पशु-पक्षी भी वेद पढ़कर शुद्ध शाकाहारी थे, अन्यथा शंकर जी का सांप गणेश का चूहा खा जाता और कार्तिकेय जी का मोर शंकर जी के सांप को खा जाता..,..     पर सब वेदो के ज्ञाता थे, अतः पास ही रहकर भी कभी झगड़े नही!

पहले ऋषि-मुनि वेद पढ़कर श्राप देते थे और वो सही हो जाता था.... रामजी ने थोड़ा वेद कम पढ़ा था नही तो वो भी रावण को श्राप देकर भस्म कर देते, जरूरत ही ना पड़ती वानरों को ले जाकर लंका मे कबड्डी खेलने की........

खुद मोहन भागवत भी वेदो से प्राप्त शक्ति से ही देश के प्रधानमंत्री को अपने इशारे पर घुमाते है....
तो अब विज्ञान छोड़ो और वेद पढ़कर...  "ब्राह्मणो_मुखमासीद********पद्भ्याम_शूद्रो_अजायते" करो...

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नास्तिक बिना कुछ समझे ईश्वर को मानने से इंकार करते हैं....
ईश्वर ने हम मनुष्यों के लिये कितने कष्ट उठायें हैं इन्हे क्या मालूम.....   मै बताता हूँ!

भगवान ने दो अरब साल पहले ब्रह्माण्ड की रचना की, फिर पृथ्वी को बनाया! पृथ्वी लुढ़क ना  जाये इसलिये उसे शेषनाग के फन पर रख दिया.... 

तुम्हे पता है कि जब शेषनाग जरा सा हिलते हैं तो भुकम्प आ जाता है, फूँक मारते हैं तो धरती पर आँधी आती है....
और जब गांजा पीकर धुआँ छोड़ते है तो धरती पर कुहरा छा जाता है......

भगवान ने पृथ्वी बनाने के बाद आक्सीजन लाने के लिये पेड़-पौधों के बीज धरती पर बोए....   हर महीने ईश्वर इफको यूरिया का छिड़काव करते थे, और जब आक्सीजन आ गयी तब ईश्वर ने मनु/सतरूपा को धरती पर मनुष्य पैदा करने के लिये भेजा....

प्रथम मानव मनु ने सतरूपा को अपना आँसू पिलाया और इंसान पैदा हुऐ!

विज्ञान झूठा है जो कहता है कि मानवों का DNA अलग-अलग है.,.,
हम सब एक ही पिता की संतान है...   जिस दिन सतरूपा ने जामुन खाकर मनु के आंसू पियेे, तो बच्चे काले पैदा हुऐ और अफ्रीका के नीग्रो बने, जिस दिन पपीता खाकर आंसू पिया तो बच्चे पीले रंग के चीन के लोग हुऐ!
जिस दिन दूध पीकर पैदा किया तो बच्चे यूरोप के गोरे हुऐ और हम आर्यो को खरबूज खाकर पैदा किया था माता सतरूपा ने...
हम सब मनु-सतरूपा की औलाद है!

इतना कष्ट उठाया है हमारे लिये भगवान ने..   अगर हम अब भी उनको नही पूजेंगे तो वो पृथ्वी को समुद्र मे ढ़केल देंगे....
और इसके जिम्मेदार तुम नास्तिक होगे!

नास्तिक मूर्खो की तरह कहते हैं कि मन्दिर मे बालात्कार होता है तो भगवान क्या करता है....      अरे भाई हम सनातनी धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष मे विश्वास करते हैं, अब धर्म और अर्थ मन्दिर मे करते है तो काम करने कोठे पर जाये.....    वो भी मन्दिर मे ही निपटा लेते हैं!

चुपचाप बिना तर्क किऐ बस भक्ति करो...   क्योकि भगवान तर्क से परे हैं!
भक्ति की वजह से द्रोपदी पाँच पतियों के होने के बाद भी सती मानी गयी,
भक्ति की वजह से अन्धे धृतराष्ट्र ने भी सौ पुत्र पैदा किए.....
भक्ति की वजह से श्रवणकुमार के माँ-बाप अन्धे होकर भी चारधाम दर्शन करते थे, और मीरा जहर पीकर भी मरी नही जबकि दयानन्द सरस्वती टपक गये....
भक्ति की शक्ति से हनुमान ने पूरी लंका फूँक दी और उनकी पूँछ का एक बाल भी नही जला..  

अरे हम आस्तिकों को तो पत्थर मे भी भगवान दिखते हैं, तभी तो हम सनी लियोन को भी मन्दिर मे जाने से नही रोकते...   हाँ अभी तक दलितों के अन्दर ईश्वर नही दिखे, जिस दिन दिख जायेगे.........  हम उन्हे भी मन्दिर मे प्रवेश करने देगे...........

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॥ विज्ञान और ईश्वर ॥

              यह अकाट्य सत्य है कि विज्ञानवाद के सामने ईश्वरवाद हमेशा औंधे मुँह गिरा है! विज्ञान के आने के बाद मानव जीवन मे क्रान्तिकारी बदलाव आये!- 

      विज्ञान के आने के बाद मंत्र मारने, खीर पीने और फल खाने से बच्चे पैदा होना बन्द हो गये!
       विज्ञान के आने के बाद असुरो और शैतानो ने लोगो को सताना बन्द कर दिया!
      विज्ञान के आने के बाद कभी किसी सूर्य को नही निगला।
       विज्ञान के आने से मर्दो के मुँह, नाक, कान और पैर से बच्चे पैदा होना बन्द हो गये!
      विज्ञान के आने के बाद जो बन्दर,भालू और गिद्ध धाराप्रवाह संस्कृत बोलते थे, वो चींचीं और चूँचूँ करने लगे!
  और तो और विज्ञान के आने से श्राप देकर सांप-बिच्छू बनाना भी बन्द हो गया! 
जरा सोचो विज्ञान ने आपके जीवन मे कितने बदलाव लाये!!

तो अब जय भगवान नही, जय विज्ञान बोलो!!!!

सती।

#सती_प्रथा_का_सच.....

सती प्रथा का मतलब होता है ऐसी प्रथा (परम्परा) जो 'सती' द्वारा चलायी गयी!
शिवपुराण मे एक कथा आती है कि शिव की पत्नी सती के पिता "दक्ष" ने अपने ही दामाद शिव का अपमान किया था! देवी सती अपने पति का अपमान सहन ना कर सकी और हवनकुण्ड मे कूदकर खुद को आग की लपटों से भस्म कर दिया!

पति के सम्मान के लिये सती का यह बलिदान एक परम्परा बन गयी, पुरातनकाल मे जब कोई महिला विधवा होती थी, तब वह अपने पति के साथ ही चिता पर बैठकर जल जाती थी, और पंडे ऐसी महिला का दर्जा देवी 'सती' के बराबर मानते थे!
महाभारत मे पाण्डु की पत्नि माद्री भी पाण्डु के साथ सती हुई थी, और यही से यह क्रूर प्रथा प्रबल हो गयी।

सोचने की बात तो यह है कि दशरथ की पत्नियाँ कौशिल्या, कैकेयी और सुमित्रा दशरथ के साथ सती नही हुई थी! 
तो क्या वो 'पतिव्रता' नही थी?

यह प्रथा हिन्दू समाज मे निर्विरोध रूप से सन् 1829 तक चलती रही, इसके बाद अंग्रेजों ने इस पर रोक लगा दी और यह परम्परा लगभग बन्द हो गयी!
इस प्रथा के विरोध मे राजा राममोहन राय और लार्ड विलियम बैटिंक ने बहुत लड़ाई लड़ी!

यह रिवाज निश्चित रूप मे हिन्दू समाज पर कलंक था, पर अब कुछ हिन्दू धर्माधिकारी कहते हैं कि यह प्रथा कभी भी धार्मिक प्रावधान नही थी! 
लेकिन गरुणपुराण उन पंडो के झूठ को उजागर कर रहा है!

गरुणपुराण/अध्याय-10 श्लोक-35 से 56 तक मे लिखा है-
"पति की मृत्यु के बाद पतिव्रता नारी को पति के साथ ही परलोकगमन करना चाहिये, महिला लज्जा और मोह त्यागकर श्मशान भूमि मे जाये, चिता की परिक्रमा करके महिला चिता पर चढ़े और अपने पति को गोद मे लिटाये, तथा अग्नि को गंगाजल समान मानकर खुद को पति के साथ भस्म कर ले"

       यह सब कितनी बेशर्मी और निर्दयिता के साथ लिखा गया है, जैसे महिला जीवन का कोई महत्व ही नही है!
इस पुराण मे यह कहीं नही लिखा है कि यदि पत्नि पहले मर जाये तो पति उसके साथ चिता पर लेटे, पर पत्नियों के लिये ऐसी बेरहम बातें लिखी है!

अब सवाल यह है कि यदि महिला गर्भवती हो तो भी क्या उसे 'सती' होना चाहिये?
इस पर इसी अध्याय के 41 वें श्लोक मे लिखा है कि महिला पहले प्रसव करके पुत्र पैदा कर दे, उसके बाद उसे 'सती' हो जाना चाहिये!

इसी पुराण 54वें श्लोक मे महिला को डराया भी गया है कि "यदि वह क्षणमात्र होने वाली पीड़ा के कारण सती होने का सुख नही भोगती है तो वो महिला जन्म-जन्मातर तक विरहाग्नि मे जलती रहती है, और जो महिला सती हो जाती है वह 14 इन्द्रों के कार्यकाल तक स्वर्ग मे पति के साथ रमण करती है!
              अग्नि केवल महिला के शरीर को जलाती है, पर आत्मा को पीड़ा नही होती! नारी अमृत समान अग्नि मे जलकर पवित्र हो जाती है, और उसके सारे पाप भी नष्ट हो जाते है! यदि महिला ऐसा नही करती तो वह नारी ऋण मे उत्तीर्ण नही होती!"

इस पुराण से यह स्पष्ट हो जाता है कि पंडे महिला को सती होने पर स्वर्ग का लालच देते थे, और इनकार करने पर नर्क की अग्नि का डर दिखाकर उसकी निर्मम हत्या करते थे!
पंडे महिला से कहते थे कि सती होने से तुम्हारे कुल का गौरव बढ़ेगा और अगले जन्म मे शीघ्र ही अपने पति से तुम्हारा मिलन होगा!
बस ऐसी ही बातों से विधवा नारी को सम्मोहित किया जाता था!

सती प्रथा पंडो की क्रूरता का और छोटा सा उदाहरण मात्र है, पंडे पूर्वकाल मे ऐसे दर्जनों जघन्य अपराध धर्म की आड़ मे करते थे!

सती प्रथा का उल्लेख "नारदपुराण अध्याय-7" मे भी है, पर वहाँ जरा सा रहम किया गया है!
नारदपुराण अध्याय-7/52 के श्लोक मे लिखा है-
"बालापत्याश्च गर्भिण्यो ह्यदृष्टऋतवस्तथा।
रजस्वला राजसुते नारोहन्ति चिंता शुभे।।"

अर्थात- जिस महिला की संतान बहुत छोटी हो, जिसकी उम्र इतनी कम हो कि उसे अभी तक माहवारी ना शुरू हुई हो, जो गर्भवती हो, और जिसे माहवारी आ रही हो, उसे पति के साथ चिता पर नही चढ़ना चाहिये।

नारदपुराण ने तो जरा सा दयाभाव भी दिखा दिया है, पर गरुणपुराण तो विधवा को जलाने पर ही उतारू है....

पूर्वजन्म के पापी।

पूर्वांचल मे एक लोककथा कही जाती है-
कहते हैं कि एक बार एक दोनो पैरों से लंगड़ा इंसान नदी किनारे चिल्ला रहा था कि कोई धर्मात्मा मुझे नदी पार करवा दो!
एक महापुरुष आये और दयाभाव से वो उस लंगड़े को अपने कंधे पर उठाकर नदी पार कराने लगे, नदी मे पानी कमर तक ही था, पर जैसे ही वो धर्मात्मा बीच नदी मे पहुँचे, वैसे ही पानी ऊपर उठने लगा!
अब नदी का पानी उन महापुरुष के मुँह तक आ गया और वो डूबने लगे! फिर उन्होने भगवान से प्रार्थना करते हुये कहा कि- "हे प्रभु! मैने कभी कोई अपराध नही किया, और आज भी धर्मार्थ कार्य ही कर रहा हूँ, फिर मै क्यो डूब रहा हूँ"

अचानक सामने से आवाज आयी... "रे मूर्ख! तू क्या समझता है कि मै इस मानव को पैर नही दे सकता था, पर ये पूर्वजन्म का पापी था, अतः इसे दण्ड देने के लिये मैने लंगड़ा बनाया!
अब तुमने इसकी मदद करके मेरे विधान को चुनौती दी है, अब तू भी दण्ड भुगत, और इसके साथ ही डूब जा"

खैर ये कहानी थी, पर हमारे धर्मग्रंथ भी यह कहते हैं कि जो आज दिव्यांग है, वो पूर्वजन्म के पापी थे, और ईश्वर ने उन्हे दण्ड दिया है!
फिर आखिर किस आधार पर यही ईश्वरवादी ये कहते है कि लंगड़े-लूले अपंगो की मदद करो!
क्या ऐसा करके वो ईश्वर को नाराज नही कर रहे है?
क्या वो ईश्वर के दण्डविधान मे हस्तक्षेप नही कर रहे हैं?
आखिर अपराधी का साथ देने वाला अपराधी ही होता है, तो क्या ईश्वर इनसे रुष्ठ नही होगा?

मै एक नास्तिक हूँ, और ईश्वर तथा उसके विधान को ताख पर रखता हूँ... अतः हम अगर उसके नियम तोड़े तो लाजिमी है, पर आस्तिक क्यों ईश्वर के दण्डविधान का खुला मजाक उड़ाते हैं!

गरुणपुराण कहता है कि जो लोग आज जन्म से ही शारीरिक अपंग है, वो पूर्वजन्म मे महापापी थे, फिर धार्मिक इन पापियों से क्यों सहानुभूति रखते हैं!

गरुणपुराण अध्याय-5 श्लोक 1 से 57 तक मे तमाम पूर्वजन्म के पापियों का वर्णन है!
मै बताता हूँ कि पूर्वजन्म का पापी किस कमी के साथ जन्म लेता है!

ब्रह्महत्यारा क्षयरोगी होता है!
गौहत्यारा कुबड़ा! 
कन्या हत्यारा कोढ़ी! 
परस्त्री गमनकर्ता नपुंसक! 
गुरूपत्नि व्यभिचारी चर्मरोगी!
गुरू का निन्दक मिरगी रोगी!
झूठी गवाही देने वाला गूँगा!
पक्षपात करने वाला काना!
पुस्तक चुराने वाला अन्धा!
ब्राह्मणों को पैर से मारने वाला लंगड़ा-लूला!
झूठ सुनने वाला बहरा!
आग लगाने वाला गंजा!
अन्न चुराने वाला चूहा!
धान चुराने वाला टिड्डी!
विष देने वाला बिच्छू!
सुगन्धित वस्तु चुराने वाला छछुन्दर!
मांस चुराने वाला गीध!
नमक चुराने वाला चींटी!
फल चोरी करने वाला बन्दर!
जूता चुराने वाला भेड़!
मार्ग मे यात्रियोंको लूटने वाला बकरा!
विषपान करने वाला काला नाग!
गायत्रीपाठ न करने वाला ब्राह्मण बगुला!
अयोग्य के घर यज्ञ कराने वाला ब्राह्मण सुअर!
बिना निमंत्रण भोजन करने वाला कौआ!
गर्भपात कराने वाला भिल्ल रोगी!
कम तौलने वाला उल्लू!
सास-ससुर का अपमान करने वाली स्त्री जोंक!
पति का अपमान करने वाली नारी जूँ!
परपुरुष से सम्बन्ध बनाने वाली नारी छिपकली!
स्त्रीलम्पट पुरुष घोड़ा होता है!
ब्राह्मण का धन लेना वाला ब्रह्मराक्षस!
अपने गोत्र की स्त्री से सेक्स करने वाला लकड़बग्घा!
शराब पीने वाला सियार!

इसके अतिरिक्त और भी कई पाप और पापयोनि लिखी है!

अब आप लोग जरा सोचों कि आपने इनमे से कौन सा पाप किये है, और आप अगले जन्म किस रूप मे पैदा होंगे!

मुझे यह पढ़कर भी आनन्द आया कि जितने सुअर है, ये सब पूर्वजन्म मे ब्राह्मण थे, और अयोग्य के घर यज्ञ करवा कर बेचारे सुअर बन गये!

इसलिये जितने भी धर्मात्मा हो, आप सब लूले-लंगड़ो की मदद मत करो, अन्यथा आप अन्जाने मे अपने ईश्वर को नाराज कर रहे हो!

#नोट- मेरे इस पोस्ट का आशय किसी दिव्यांग मित्र का मजाक बनाना नही है, मै जानता हूँ कि यह सब प्राकृतिक है, और उनके साथ मेरी पूरी सहानुभूति है...
मै केवल धार्मिकों और पंडो को ईश्वरी विधान बता रहा हूँ!

मानव आयु।

वाल्मीकि रामायण युद्धकाण्ड सर्ग-128/106 मे लिखा हैं कि श्रीराम ने राजा बनने के बाद अपने भाइयों सहित अयोध्या मे 11 हजार साल तक राज्य किया....

यह बात तो ऐसी है कि जिसे सुनकर दांतो तले अगुँली दबा ले!
क्या कोई मनुष्य 11 हजार वर्ष तक जीवित रह सकता है?
क्या मनुष्यों की आयु कभी इतना होती थी?

वेदों के बाद मनुस्मृति ही सनातनियों की सबसे विश्वसनीय और मान्य धर्मग्रंथ है, अगर इसे प्राचीन संविधान कहें तो अतिशयोक्ति नही होगी!
मनुस्मृति की प्रशंसा देवगुरू वृहस्पति ने भी अपनी पुस्तक वृहस्पति स्मृति संस्कारखण्ड-13/14 मे किया है, उन्होने लिखा है--
"मनुस्मृति विरुद्धा या सा स्मृतिर्न प्रशस्यते।
वेदार्थोपनिबद्धत्वात् प्राधान्यं हि मनोः स्मृतेः।।"
अर्थात- जो स्मृति मनुस्मृति के विरुद्ध है, वह प्रशंसा के योग्य नहीं है। वेदार्थों के अनुसार वर्णन होने के कारण मनुस्मृति ही सब में प्रधान एवं प्रशंसनीय है।

यह तो मनुस्मृति का गुणगान हुआ, अब जरा देखो कि मनुस्मृति मे मनुष्यों की कितनी आयु बताई गयी है!

मनुस्मृति-1/83 मे मनु ने कहा है--
"आरोगाः सर्वसिध्दार्थाश्चतुर्वर्षशतायुषः।
कृते त्रेतादिषु ह्योषामायुर्ह्रसति पादशः।।"
अर्थात- कृतयुग (सतयुग) मे मनुष्य धर्माचरण पूर्वक सब मनोरथ सिद्ध करते हुये निरोग होकर चार सौ वर्ष पर्यन्त जीवित रहते हैं! त्रेता, द्वापर और कलियुग मे धर्म का लोप होने से क्रमशः सौ-सौ वर्ष आयु कम हो जाती है।

मनु ने इस श्लोक मे साफ बताया है कि त्रेतायुग मे मनुष्यों की आयु तीन सौ साल होती थी!
अब इसी त्रेतायुग मे राम थे, फिर भला राम 11 हजार साल कैसे जी गये?

इस पोस्ट पर मै किसी पर कोई आरोप नही लगाऊँगा, बस इतना ही कहूँगा कि वाल्मीकि और मनु मे से कोई एक तो झूठ बोल रहा है, और मेरी साधारण बुद्धि को वाल्मीकि ही झूठे नजर आ रहे हैं!
खैर फेंकना तो हमारे सनातनियों की आदत ही रही है!

गीत गोबिंद जयदेव।

यदि आप महाभारत और हरिवंशपुराण पढ़ो, तो आपको पता चलेगा कि कृष्ण बहुत सुन्दर होने के साथ-साथ अत्यन्त चतुर थे, वेद-शास्त्रों के ज्ञाता और बुद्धि...